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बामदेव पर्वत : चट्टानों की टकराहट से निकलता है मधुर संगीत

बामदेव पर्वत : चट्टानों की टकराहट से निकलता है मधुर संगीत
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बांदा।आपने रेडियो, टीवी, डीजे और मोबाइल पर गीत संगीत की धुने सुनी है डीजे पर तो अक्सर आप थिरकते होंगे।अगर यही धुने आपको विशालकाय पर्वत के पत्थरों से सुनाई पड़े तो निश्चित ही आप आश्चर्यचकित हो जाएंगे पर यह सच्चाई है। यह अद्भुत करिश्मा बांदा जनपद के बामदेवेश्वर पर्वत पर देखने और सुनने को मिल जाएगा। इस पत्थर पर पत्थर से चोट करें तो मधुर संगीत सुनाई पड़ता है जैसे कोई आधुनिक वाद्य यंत्र बजा रहा हो।


पर्वत के शिखर पर मौजूद इन पत्थरों की संख्या गिनती के हैं इसे जो भी पत्थरों से बजाता है और इसकी मधुर संगीत सुनता है तो हैरान हो जाता है। वही, वैज्ञानिक भी इस पर अपने अपने तर्क देते हैं, पर सैलानियों के लिए यह अद्भुत है इसीलिए यहां अगर कोई बामदेवेश्वर मंदिर आता है तो संगीत बिखेरने वाले इन पत्थरों पर भी पत्थर से चोट कर संगीत निकालने की कोशिश करता है।इसी पत्थर के पास हनुमान जी का मंदिर है जिसे सिद्धन कहते हैं। लोग मंदिर में दर्शन कर पत्थरों से संगीत निकालने की कोशिश करते हैं।

पर्वत से जुड़ी मान्यता-

मंदिर के पुजारी पुत्तन महाराज बताते हैं कि बांदा ऋषि वामदेव की तपस्थली रही है। इसी पर्वत पर ऋषि वामदेव तपस्या किया करते थे। मान्यता कि त्रेतायुग में भगवान राम जब माता जानकी और भाई लक्ष्मन के साथ चित्रकूट आए, तब उन्हें पता चला कि बांदा में वामदेव तपस्या कर रहे हैं। ये जानकर भगवान राम उनसे मिलने इसी पर्वत पर आए। कहते हैं कि भगवान राम के आने की खबर सुनकर पत्थर भी इतने आनंदित हो गए कि जहां-जहां उनके चरण पड़े, उस पत्थर से संगीत की धुन निकल पड़ी थी। त्रेतायुग से कलयुग यानि आज तक ये धुन उसी तरह निकल रही है।

ऋषि बामदेव से मिली बांदा को पहचान -

ऋषि बाम देव गौतम ऋषि के पुत्र थे इसलिए उन्हें गौतम भी कहते हैं। वेदों के अनुसार सप्तऋषियों में ऋषि बामदेव का नाम भी आता है और उन्होंने संगीत की रचना की थी। रामायण काल में इस बामदेवेश्वर पर्वत पर वह निवास करते थे।इसी पर्वत पर स्थित भगवान शिव का मंदिर उन्होंने स्थापित किया था और बांदा नाम भी उन्हीं के नाम पर पड़ा है।

इसी मंदिर में भगवान राम ने की थी पूजा -

बामदेवेश्वर पर्वत पर ही है एक विशाल शिव मंदिर भी है, यहां शिवलिंग स्थापित है। धर्मशास्त्रों के मुताबिक, इस शिवलिंग को महर्षि वामदेव ने स्थापित किया था। भगवान राम ने यहां आकर शिव की आराधना की थी। ऐसी मान्यता है कि यहां शिव पूजा का सबसे अच्छा फल मिलता है। यहां महामृत्युंजय का जाप भी फलदाई होता है।

हजारों साल पुरानी हैं यहां की चट्टानें -

बामदेवेश्वर के पत्थरों से निकलने वाले संगीत को लोग आस्था के नजरिए से देखते हैं, लेकिन वैज्ञानिक इसे चमत्कार नहीं मानते। प्रोफेसर अवधेश कुमार का कहना है कि इसके पीछे कोई धार्मिक कारण नहीं, बल्कि यहां की चट्टानों में डोलोमाइट यानि चूने और आयरन की मात्रा ज्यादा है। जब चूने और आयरन की मात्रा ज्यादा हो जाती है, तब पत्थरों से आवाज निकलने लगती हैं। वैज्ञानिक कारण हो या कोई दूसरा चमत्कार, लेकिन ये पर्वत लंबे समय से लोगों के लिए कौतूहल का केंद्र बने हुए हैं। लोग दूर-दूर से इस पर्वत की धुन को सुनने के लिए आते हैं।

Updated : 12 Dec 2020 9:51 AM GMT
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स्वदेश वेब डेस्क

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