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ग्वालियर के बदनापुरा की बदनाम कहानी

दिनेश राव / फूलचंद मीणा

ग्वालियर के बदनापुरा की बदनाम कहानी
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ग्वालियर। देह व्यापार के लिए बदनाम हो चुका बदनापुरा एक बार फिर से सुर्खियों में है। वेश्यावृत्ति का गढ़ बन चुका बदनापुर इस बार कोरोना को लेकर सुर्खियों में आया। एक साथ आठ लड़कियों में कोरोना के लक्षण मिलते ही समूचे ग्वालियर शहर में हडक़ंप मच गया। तरह तरह के सवाल बदनापुरा को लेकर उठने लगे। इन सवालों का जवाब ढूंढने के लिए जब स्वदेश की टीम पहुंची तो एक बार फिर से ऐसी सच्चाई सामने आई जिसके लिए बदनापुरा सालों से बदनाम रहा है। बदनापुरा की कहानी आज भी वैसी ही है जो सालों साल पहले थी। कुछ भी बदला नहीं है, वेश्यावृत्ति आज भी जारी है लेकिन अब इसका स्वरुप बदल गया है।

मोतीझील स्थित साडा रोड से अंदर एक किमी चलने के बाद बदनापुरा पहुंचने पर चारों और का नजारा कुछ अलग किस्म का था। कोरोना संक्रमित लड़कियों के आने के कारण इस पूरे इलाके को बेरीकेट्स लगाकर सील कर दिया गया है। लोगों के आने जाने पर प्रतिबंध है। किसी तरह हम अंदर गए तो नजारा संदिग्ध सा दिखाई दिया। बंद दुकानों के सामने कुछ युवतियां लडक़ों के साथ हंसी ठिठौली करती दिखी, पूछताछ करने पर पता चला कि यह उनके दोस्त थे। दुकान के सामने खड़े होने का कारण पूछा तो उत्तर था सामान लेने आई हैं लेकिन बंद दुकान के सामने कुछ लडक़ों के साथ हंसी ठिठौली का मतलब स्पष्ट था कि दाल में कुछ काला है। गांव के ही कुछ लोगों ने बताया कि यह तो सामान्य सी बात है। हर रोज यहां इसी तरह होता है। शहर से जुड़े संभ्रांत परिवार के लोग यहां आते हैं और संतुष्ट होकर चले जाते हैं। इसके एवज में मोटी रकम मिलती है।

ठाणे, मुंबई व नागपुर में बस गई हैं यहां की युवतियां-

अब हम उन परिवारों से मिले जहां कोरोना संक्रमण के कारण परिवार के सदस्यों को पिछले पंद्रह दिनों पहले क्वारन्टाइन कर दिया गया था। मुंबई के ठाणे से लौटी एक युवती ने बताया कि वह ठाणे में ब्यूटीपार्लर चलाती है। बातों बातों में उसने बताया कि वहां महिलाओं के साथ पुरुष भी आते हैं। पुरुषों की मसाज का काम इस ब्यूटीपार्लर में होता है। इसी तरह नागपुर से लौटी एक युवती की कहानी भी यही थी। कोरोना वायरस के चलते इस गांव में रहने वाले परिवार की महिलाएं फिलहाल यहीं हैं लेकिन इन परिवारों के लोगों का कहना था कि ज्यादातर महिलाएं महाराष्ट्र के मुंबई, ठाणेे, नागपुर जैसे महानगरों में बस गई हैं और वहां ब्यूटीपार्लर खोलकर वेश्यावृत्ति जैसे कामों में संलग्न हैं। साल में होली दीवाली पर ही मोटी रकम लेकर यहीं लौटती हैं।

वेश्यावृत्ति से होता है भरण पोषण-

दबे स्वर में घर के बुजुर्गों ने यह स्वीकार किया कि वेश्यावृत्ति ही परिवार के भरण पोषण का एकमात्र सहारा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। बेडिय़ा जाति से जुड़े यहां के परिवार इसे अपना पुश्तैनी काम मानते हैं। फिर पैसे के लिए इस पेशे में घर के बुजुर्ग न यह देखते हैं कि वेश्यावृत्ति जैसे इस घिनौने काम में उतरने वाली उनकी बेटियां हैं, या पत्नी या फिर बहनें। सबकी सब इसी काम में जुटी हुई हैं।

कई बार पकड़ी जा चुकी हैं यहां की युवतियां-

एक साल पहले एक महिला लक्ष्मी कुशवाह को एक बच्ची के अपहरण के आरोप में पकड़ा गया था, तब पुलिस ने उसके पास से चार बच्चियों को बरामद किया था। इन बच्चियों को वह बदनापुरा में चालीस से पचास हजार रुपए में बेच देती थी जहां पुलिस की पड़ताल में यह खुलासा हुआ था कि इन बेची गई बच्चियों को वेश्यावृत्ति के काम में धकेल दिया जाता है और इस काम के बदले में ग्राहकों से मोटी रकम वसूल कर ली जाती हैं।

दलाल भी रहते हैं सक्रिय-

बदनापुरा व रेशमपुरा में वेश्यावृत्ति के लिए यहां कुछ दलाल भी सक्रिय रहते हैं जो शहर व शहर के बाहर युवतियों की सप्लाई करते हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश इनके परिवारों के सदस्य हैं। जो घरो में बैठकर यहां आने वाले ग्राहकों से सौदा कर युवतियां उपलब्ध कराते हैं। कुछ बाहरी तत्व भी इन परिवारों के सदस्यों से मिलकर युवतियों को बाहर ले जाने का काम करते हैं। लक्ष्मी कुशवाहा जब पकड़ी गई थी तब इस तरह के चौंकाने वाले खुलासे हुए थे जिससे यह पता चलता है कि यहां बाहर की नाबालिग बच्चियों को खरीद कर बड़े बड़े शहरों में ब्यूटीपार्लरों या दलालों के हाथों बेच दिया जाता है।

जाबाली योजना भी काम नहीं आई-

बेडिय़ा जाति में वेश्यावृत्ति की प्रथा को समाप्त करने के लिए मध्य प्रदेश शासन की ओर से आज से बीस साल पहले जाबाली योजना संचालित की गई थी। महिला बाल विकास विभाग के अंतर्गत आने वाली इस योजना का लाभ बहुत ही कम लोगों को मिल पाया। हाई कोर्ट के आदेशानुसार लगभग दो दशक पूर्व प्रारंभ की गयी इस योजना को चार चरणों में लागू किया जाना था, लेकिन प्रथम चरण से ही यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई और संसाधनों की कमी और सुरसा की तरह बढ़ती महंगाई के कारण यह योजना दम तोड़ गई। इस योजना में शिष्यवृत्ति क्रमश: 500-525 रुपये प्रति बालक-बालिका निर्धारित की गई है जो कि ऊंट की मुंह में जीरा साबित हुई।

अयुदय आश्रम देता है इन्हें परवरिश

मुरैना में संचालित अयुदय आश्रम की संचालिका अरुणा छारी बताती हैं कि इनके चाचा रामस्नेही छारी ने बदनापुर व रेशमपुरा में पोषित हो रही इस कुप्रथा से समाज के लोगों को मुक्त कराने के लिए काफी प्रयास किए थे। इन प्रयासों के चलते काफी हद तक इस समाज के लोग दूसरे काम धंधों से जुड़े और समाज में चल रही इस कुप्रथा से मुक्त हुए। अरुणा छारी का कहना है कि रामस्नेही जी के निधन के बाद यह बीड़ा उन्होंने उठाया है और काफी कुछ बदलाव इस समाज में देखने को मिल रहा है। लेकिन पूरी तरह से यह प्रथा बंद हो जाए,ऐसा नहीं हो पा रहा है। इन्हें काम धंधों से जोडऩा पड़ेगा। इन्हें शिक्षित करने का काम बड़े पैमाने पर करना होगा। इसके लिए सरकारों को आईसीपीसी जैसी योजनाओं को बढ़ावा देकर इसका बजट बढ़ाना होगा, तभी इन कुप्रथा से मुक्त हुआ जा सकेगा। अरुणा छारी का कहना है कि देह व्यापार से मुक्त कराई गई बालिकाओं में इतनी प्रतिभा है कि वे क्रिकेटर से लेकर पुलिस व अन्य सेवाओं में अपना योगदान दे सकती है। खेल से लेकर अन्य विधाओं में भी निपुण हैं लेकिन आश्रम के पास इतना साधन नहीं हैं, कि वे इन बच्चों की परवरिश के साथ साथ इन्हें वह सारी सुविधा मुहैया करा सकें, जिससे वे अच्छे खिलाड़ी बनकर देश का नाम रोशन कर सकें।

सोनागाक्षी से आई महिला का बदला जीवन

अरुणा छारी बताती हैं कि अयुदय आश्रम में रहने वाली कई बालिकाओं को जीवन सुधरा हैं। यह ऐसी बालिकाएं थी जो पहले वेश्यावृत्ति जैसी कुप्रथा से जुड़ी थी लेकिन जब आश्रम में आई तो इनका जीवन ही सुधर गया। ऐसा ही एक उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि सोनागाक्षी से एक युवती वेश्यावृत्ति जैसे काम से जुड़ी थी। उसकी मां ने उसे इस काम में धकेल दिया था, जब यह युवती अत्याचार नहीं सहन कर सकी तो किसी तरह से भाग कर उनकी शरण में किसी माध्यम से पहुंची और आज उसका जीवन खुशहाल है। पांच साल तक आश्रम में रहने के बाद उसन हाईस्कूल व इंटर की परीक्षा पास की। आज वह युवती इटावा में अपने पति के साथ खुशहाल जीवन गुजार रही है।

इनका कहना है

जाबाली योजना ग्वालियर जिले में लागू नहीं है, इसलिए इस योजना का लाभ उन्हेंं मिल पा रहा है लेकिन आंगनवाड़ी योजना के अंतर्गत हम यहां नजर बनाये रखते हैं। कई बार जब यहां संदिग्ध गतिविधियां मिलती हैं तो विभाग द्वारा कार्रवाई भी की जाती है। फरवरी माह में ही हमने दो बच्चियों को मुक्त कराकर उन्हें आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से परवरिश देने का काम किया था।

शालीन शर्मा, महिला बाल विकास अधिकारी

पुलिस को जब भी बदनापुरा में वैश्यावृति की सूचना मिलती है वह कार्रवाई करती है। पुलिस बदनापुरा से अवोध बच्चियों को भी बरामद कर चुकी है। महिला बाल विकास विभाग और सामाजिक संगठनों को इसके लिए आगे आना होगा और समय समय पर वहां जाकर लोगों को इसके लिए जागरुकता लानी होगी, तभी बदलाव आ सकता है।

पंकज पांडेय, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अपराध शाखा,

Updated : 2020-06-14T06:56:30+05:30
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स्वदेश वेब डेस्क

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