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Can Thalapathy Vijay Become the Next MGR in Tamil

दक्षिण भारतीय राजनीति: क्या दूसरा एमजीआर बन पाएंगे विजय !

थलापति विजय की फिल्म ‘जना नायकन’ और तमिलनाडु की राजनीति में उनकी एंट्री ने सियासी हलचल तेज कर दी है, क्या वे दूसरा एमजीआर बन पाएंगे


दक्षिण भारतीय राजनीति क्या दूसरा एमजीआर बन पाएंगे विजय

राजकुमार सिंह

तमिल राजनीति का जननायक बनने के महत्वाकांक्षी फिल्म अभिनेता थलापति विजय की अंतिम फिल्म ‘जना नायकन’ की सिनेमाघरों से दूरी कम होती नहीं दिख रही। नौ जनवरी को रिलीज होने वाली जना नायकन अभी तक सेंसर बोर्ड विवाद और कानूनी लड़ाई में अटकी है। जना नायकन की रिलीज डेट तो तय नहीं है, पर थलापति विजय की तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। विधानसभा चुनाव से पहले तमिलनाडु का राजनीतिक विमर्श जिन दो फिल्मों के इर्दगिर्द सिमट गया है, जना नायकन उनमें से एक है। दूसरी फिल्म है ‘पराशक्ति’। सेंसर बोर्ड से प्रमाण-पत्र मिलने के बाद पराशक्ति रिलीज भी हो चुकी है।

यह जानना भी जरूरी है कि पराशक्ति 1960 के आसपास हिंदी विरोधी आंदोलन और तमिल राजनीतिक भावनाओं की याद दिलाती है, जबकि जना नायकन अभिनेता विजय को जननायक के रूप में पेश करती है। जना नायकन को अपनी अंतिम फिल्म बताकर जोसेफ विजय चंद्रशेखर ने तीन दशक लंबी सिनेमाई पारी से संन्यास का ऐलान भी कर दिया है। विजय की सिनेमाई छवि लंबे समय से जननायक जैसी रही है। तमिझगा वेट्री कषगम (टीवीके) नामक राजनीतिक दल बनाने वाले विजय का इरादा आगामी विधानसभा चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री बनने का है।

पिछले कई दशकों से द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच दो-ध्रुवीय रही तमिल राजनीति में जयललिता के निधन से उत्पन्न शून्य को भाजपा, विभाजित अन्नाद्रमुक के एकीकरण और गठबंधन के जरिये भरने की कोशिश कर रही है। टीटीवी दिनाकरन की पार्टी एएमएमके भी राजग में लौट आई है, पर पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई की निष्क्रियता से सवाल उठने लगे हैं। तेजतर्रार अन्नामलाई द्रमुक के साथ-साथ अन्नाद्रमुक पर भी तीखे प्रहारों के लिए जाने जाते हैं।

जब टीवीके बनाकर विजय ने द्रमुक सरकार पर निशाना साधना शुरू किया, तो लगा कि मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की सत्ता से विदाई के लिए भाजपा उनकी लोकप्रियता की लहर की सवारी कर सकती है। लेकिन जना नायकन विवाद में सेंसर बोर्ड की भूमिका से समीकरण बदलते दिखे हैं। विजय ने जना नायकन की रिलीज में देरी के लिए सेंसर बोर्ड और सरकार से ज्यादा द्रमुक और भाजपा पर निशाना साधा है।

विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में शामिल द्रमुक ने भी इस विवाद का ठीकरा भाजपा पर फोड़ा है, ताकि टीवीके से मुकाबले में अल्पसंख्यकों के बीच उसकी लोकप्रियता प्रभावित न हो। मित्र दल द्रमुक को चुनौती देने वाले विजय की फिल्म जना नायकन को कांग्रेस का समर्थन चौंकाने वाला है। माना जा रहा है कि साथ चुनाव लड़ने के बावजूद द्रमुक सरकार में भागीदारी से वंचित कांग्रेस टीवीके से गठबंधन पर भी विचार कर रही है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन कांग्रेस-द्रमुक गठबंधन को अटूट बताते हुए भी हाल ही में फिर चुनाव बाद सत्ता में भागीदारी से इनकार कर चुके हैं।

बेशक द्रमुक-कांग्रेस का गठबंधन पुराना है, लेकिन राजनीति में सुविधानुसार मित्र बदलते रहते हैं। महाराष्ट्र और बिहार में मित्र दलों से तनातनी भी कांग्रेस की चुनावी रणनीतिक दुविधा का संकेत देती है। शायद तमिलनाडु में फिल्मी सितारों की चमत्कारिक सफलता कांग्रेस को विजय की ओर आकर्षित कर रही हो।

दक्षिण भारत में कुछ सितारे ऐसे लोकप्रिय राजनेता भी साबित हुए कि उन्होंने राजनीति की धारा ही बदल दी। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की सवा साल में दिल्ली की सत्ता तक पहुंच की चर्चा बहुत होती है, लेकिन सबसे चमत्कारिक चुनावी सफलता एनटी रामाराव के नाम दर्ज है। तेलुगु फिल्मों में राम-कृष्ण जैसी धार्मिक भूमिकाओं से घर-घर में लोकप्रिय हुए एनटीआर ने तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) बनाने के नौ महीने के भीतर ही कांग्रेस को आंध्र प्रदेश की सत्ता से खदेड़ दिया था। एनटीआर 1983 से 1994 के बीच तीन बार मुख्यमंत्री बने।

निधन के बाद टीडीपी पत्नी लक्ष्मी पार्वती और दामाद चंद्रबाबू नायडू के बीच विभाजित हुई। अंततः नायडू ही एनटीआर के राजनीतिक वारिस साबित हुए। 2008 में चिरंजीवी द्वारा बनाई गई प्रजा राज्यम पार्टी भी 2009 के विधानसभा चुनाव में 18 सीटें जीतने में सफल रही, लेकिन 2011 में उन्होंने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया। केंद्र में मंत्री भी रहे चिरंजीवी 2018 से राजनीति में सक्रिय नहीं हैं। उनके भाई पवन कल्याण अवश्य जन सेना पार्टी बनाकर अब चंद्रबाबू नायडू सरकार में भागीदार हैं।

दक्षिण भारतीय राजनीति में फिल्मी सितारों की चमत्कारिक सफलता की शुरुआत तमिलनाडु से ही हुई, जहां एमजी रामचंद्रन ने 1953 में कांग्रेस के साथ अपनी राजनीतिक पारी शुरू की। तमिल सिनेमा के इस सुपरस्टार को बाद में सीएन अन्नादुरई ने अपनी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) में शामिल होने के लिए मना लिया। 1962 में पहली बार विधायक बने एमजीआर ने अन्नादुरई के निधन के बाद द्रमुक में बढ़ते भ्रष्टाचार का विरोध किया, तो उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद उन्होंने अलग पार्टी अन्नाद्रमुक बनाई।

1977 के विधानसभा चुनाव में अन्नाद्रमुक ने 234 में से 130 सीटें जीतीं और एमजीआर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। एमजीआर से निकटता के चलते लोकप्रिय अभिनेत्री जयललिता अन्नाद्रमुक में शामिल होकर प्रचार सचिव भी बनीं, लेकिन पार्टी के भीतर विरोध के चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा। एमजीआर के निधन के बाद जयललिता को उनके परिवार के विरोध का भी सामना करना पड़ा, लेकिन खुद को उनकी राजनीतिक वारिस साबित करते हुए अंततः 1991 में तमिलनाडु की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।

एमजीआर और फिर जयललिता के मुकाबले द्रमुक का नेतृत्व करते हुए मुख्यमंत्री बने एम करुणानिधि भी तमिल सिनेमा के लोकप्रिय लेखक रहे। बेशक हिंदी सिनेमा के सितारों ने भी राजनीति में किस्मत आजमाई, लेकिन दक्षिण भारतीय सितारों जैसी सफलता किसी को नसीब नहीं हुई। कुछ सांसद या मंत्री बने, लेकिन पार्टी की कृपा से ही।

दक्षिण में भी हर फिल्म स्टार राजनीति में हिट नहीं हुआ। रजनीकांत और कमल हासन के अभिनय का लोहा पूरा देश मानता है, लेकिन जब उन्होंने चुनावी राजनीति में हाथ आजमाया, तो वे एमजीआर, एनटीआर, जयललिता और करुणानिधि की सफलता के आसपास भी नहीं पहुंच पाए। परदे के करिश्मे को वे सीधे जनसंवाद और जमीनी संपर्क में नहीं उतार सके।

अब देखना दिलचस्प होगा कि फिलहाल चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाते नजर आ रहे फिल्मी परदे के ‘जना नायकन’ थलापति विजय तमिल राजनीति का जननायक बनकर क्या दूसरा एमजीआर बन पाएंगे!