पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतदाता ममता बनर्जी के हाथों से फिसलते दिख रहे हैं। हुमायूं कबीर की बाबरी यात्रा और राजनीति ने राज्य की सियासत गर्म कर दी
शुक्रवार, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के पाले-पोसे मुस्लिम मतदाता इन दिनों खिसकते नजर आ रहे हैं। आने वाले चुनाव में यह मतदाता किस करवट बैठेंगे, इस बात की चिंता ममता बनर्जी को अभी से सताने लगी है। पश्चिम बंगाल का चुनाव ममता बनर्जी इन्हीं पाले-पोसे मतदाताओं के कारण ही जीतती आ रही हैं। लेकिन इस बार पश्चिम बंगाल में यह मतदाता अपनी अहम भूमिका निभाने वाले हैं।
मुस्लिम मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा ममता बनर्जी के हाथों से छिटकता दिखाई दे रहा है। कभी ममता बनर्जी के भरोसेमंद रहे और तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित हुमायूं कबीर अब उन्हीं के गले की फांस बनते नजर आ रहे हैं। कबीर ने मुर्शिदाबाद में 'बाबरी मस्जिद' की प्रतिकृति निर्माण की घोषणा की, उस पर अमल शुरू किया और अब बाबरी यात्रा शुरू कर राज्य की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है।
कभी जय श्रीराम के नारों से बिदकने वाली ममता बनर्जी इस मामले में पूरी तरह से चुप हैं। यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं, बल्कि चुनावी गणित का स्थापित सच है। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 27-28 प्रतिशत है और मतदाता सूची में भी यह अनुपात लगभग उतना ही है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाता केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता के निर्णायक वोट बैंक माने जाते रहे हैं।लेकिन अब यही वोट बैंक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ से फिसलता दिख रहा है। वास्तव में, यह कहना गलत नहीं होगा कि वोट बैंक रूपी यही औजार अगले विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है।
ममता बनर्जी की सबसे बड़ी चिंता निलंबित विधायक हुमायूं कबीर द्वारा शुरू किया गया पैदल मार्च है, जो कबीर को पश्चिम बंगाल में हीरो बना रहा है। इस बाबरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य मुर्शिदाबाद के बेलहांगा में अयोध्या की बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति का निर्माण करना है। इस यात्रा के जरिए कबीर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वोट बैंक यानी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में अपनी पैठ बनाएंगे और अपनी नई पार्टी, जनता उन्नयन पार्टी, के लिए जनसंपर्क करेंगे।अयोध्या विवाद का अध्याय बंद होने के बाद किसी ने नहीं सोचा था कि 'बाबरी' शब्द फिर से किसी चुनावी राज्य में इतनी तेजी से गूंजेगा। लेकिन मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के नाम पर गतिविधियों ने उत्तर प्रदेश से लेकर बंगाल तक राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। यह केवल धार्मिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि सीधा-सीधा वोट बैंक की लड़ाई बन चुका है।कबीर साफ संदेश दे रहे हैं कि मुस्लिमों को तृणमूल कांग्रेस की 'सेकुलर छत्री' से बाहर निकलकर अब अपनी अलग पहचान बनानी चाहिए। बाबरी यात्रा उसी रणनीति का हिस्सा है, जिससे ममता की पकड़ मुस्लिम मतदाताओं पर कमजोर की जा सके।
मुर्शिदाबाद लंबे समय से मुस्लिम बहुल जिला रहा है और तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ भी। आज वही जिला ममता सरकार के लिए राजनीतिक प्रयोगशाला बन गया है। बाबरी मस्जिद से जुड़ी गतिविधियों और बाबरी यात्रा की चर्चाओं ने यहां ध्रुवीकरण की जमीन तैयार कर दी है। कुछ निर्दलीय विधायक और स्थानीय मुस्लिम नेता भी इस यात्रा को समर्थन दे रहे हैं। यह लोग खुद को 'मुस्लिम हितों का असली प्रतिनिधि' बताकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। इसका सीधा असर तृणमूल के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ेगा।इस पूरे मामले में हिंदू मतदाता खामोश रहकर सारी परिस्थितियों को भाप रहे हैं। बाबरी नाम की वापसी ने स्वाभाविक रूप से भावनात्मक प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। इसका लाभ भाजपा को मिलेगा, ऐसी चर्चाएं यहां जोरों पर हैं। ममता का हिंदू विरोधी चेहरा भाजपा ने कई बार उजागर किया है। ऐसे में कहा जा सकता है कि बाबरी मस्जिद विवाद और बाबरी यात्रा ने भाजपा को एक नया अवसर दे दिया है। पार्टी इसे कानून-व्यवस्था, तुष्टिकरण और धार्मिक राजनीति से जोड़कर ममता सरकार पर हमला तेज कर सकती है।