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Surya Kant Tripathi Nirala Jayanti: Poet of Strugg

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जयंती आज: विषमताओं के बीच समन्वयकारी व्यक्तित्व

निराला जयंती पर जानिए कैसे संघर्षों के बीच समन्वय और क्रांति की आवाज बने सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला


सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जयंती आज विषमताओं के बीच समन्वयकारी व्यक्तित्व

सुरेश सिंह बैस

संत पंचमी संकेत है ब बसंत के पर्दापण का, मां सरस्वती की पूजा अर्चना का, और उस महान कवि सिरमौर के जन्म स्मरण का, जिसे अपने अद्भुत व्यक्तित्व के कारण 'निराला' उपनाम को धारण किया। इनका पूरा नाम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला था। इनका जन्म 1896 को बसंत पंचमी के ही दिन पश्चिम बंगाल के महिषादल में हुआ था। निराला, छायावादी कवि के रूप में विख्यात हैं, किन्तु गद्य क्षेत्र में भी निराला की उतनी ही पकड़ थी, इसीलिए यहां भी इनकी उतनी ही प्रसिद्धि हैं। 

इन्होंने गद्य की प्रायः सभी प्रचलित विधाओं में लिखा हैं, किन्तु अन्य छायावादी कवियों की तरह उनकी काव्य कृतियों की अधिक विवेचना हुई है। निराला का गद्य संसार वैविध्यों से परिपूर्ण था। इन्होंने अपने समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक वातावरण के यथार्थ चित्रण पर जोर दिया है, जिसमें यदाकदा अपने व्यक्तिगत अनुभवों और अनुभूतियों का भी इन्होंने सुंदर समावेश किया है। निराला का जीवन और व्यक्तित्व विचित्रताओं से परिपूर्ण रहा है, निरालाजी के काव्य संसार को समय या काल की सीमाओं में बांधना असंभव हैं। 

इनकी लेखनी ने प्रगतिवाद और प्रयोगवादी साहित्य में भी अपनी उपस्थिति दृढ़ता से दर्ज कराई हैं। निरालाजी के पिता का नाम पंडित रामसहाय त्रिपाठी था। बचपन में ही मां का देहावसान हो गया। निराला ने बचपन से ही कविताएं लिखना शुरू कर दिया था। इन्हें हिन्दी, बंगला, संस्कृत, अंग्रेजी, फारसी और उर्दू की भाषाओं पर अधिकार प्राप्त था। समाज की अव्यवस्था और विषमताओं के बीच निराला का समन्वयकारी व्यक्तित्व उभरकर सामने आया, तभी तो इनके काव्य में संघर्ष और क्रांति के स्वरों का सिंहनाद स्पष्ट सुनाई देता है। 'जागो एक बार फिर' का क्रांतिकारी स्वर आज भी भारतीय युवकों को भारतीय संस्कृति व उनके अपारशक्ति की याद दिलाती है।