22 फरवरी 1994 के संसदीय संकल्प और विदेश मंत्री जयशंकर के बयान के बाद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर भारत का रुख पहले से ज्यादा स्पष्ट हुआ है
अमित त्यागी
मार्च 2025 में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने लंदन में एक बड़ा बयान दिया था। विदेश मंत्री का कहना था कि जिस दिन पाकिस्तान अवैध रूप से कश्मीर के चुराए गए हिस्से को वापस कर देगा, उसी दिन कश्मीर समस्या का समाधान हो जाएगा और कश्मीर में शांति स्थापित हो जाएगी। चीन पर विदेश मंत्री का कहना था कि चीन को भारत के हितों का सम्मान करना चाहिए। सीमा एक महत्वपूर्ण विषय है। सीमा अस्थिर है, उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। नए वैश्विक परिदृश्य में जयशंकर द्वारा कश्मीर और चीन पर दिया गया स्पष्ट दृष्टिकोण बहुत कुछ कह देता है।
उत्तर दिशा में भारत की सीमाएँ अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन से मिलती हैं। इन तीनों देशों के साथ सीमा विवाद में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख प्रमुख सामरिक क्षेत्र हैं। इसलिए भारत की विदेश नीति में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख नीति अत्यंत महत्वपूर्ण है।जयशंकर के बयान को समझने के लिए भारतीय संसद द्वारा 22 फरवरी 1994 को पारित संकल्प के दस्तावेज को समझना आवश्यक होगा। उस समय कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री नरसिंह राव के नेतृत्व में भारतीय संसद ने ध्वनिमत से यह प्रस्ताव पारित किया था। संसद ने कहा था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) भारत का अटूट अंग है। पाकिस्तान को वह हिस्सा छोड़ना होगा, जिस पर उसने बलपूर्वक कब्जा जमा रखा है।
सदन ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकियों के शिविरों पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। सदन का मानना था कि पाकिस्तान की ओर से आतंकियों को हथियारों और धन की आपूर्ति के साथ-साथ भारत में घुसपैठ करने में भी मदद दी जा रही है। सदन ने भारत की जनता की ओर से घोषणा की थी कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा। भारत अपने इस भाग के विलय के लिए हरसंभव प्रयास करेगा। भारत में इस बात की पर्याप्त क्षमता और संकल्प है कि वह उन नापाक इरादों का मुंहतोड़ जवाब दे, जो देश की एकता, प्रभुसत्ता और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ हों। सदन ने मांग की थी कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के उन इलाकों को खाली करे, जिन पर उसने कब्जा कर रखा है। भारत के आंतरिक मामलों में किसी भी हस्तक्षेप का कठोर जवाब दिया जाएगा।
जब तक अनुच्छेद 370 और 35ए पर निर्णायक कार्यवाही नहीं हुई थी, तब तक 22 फरवरी का यह प्रस्ताव केवल एक प्रस्ताव मात्र प्रतीत होता था। इसका पूर्ण होना एक दुःस्वप्न जैसा लगता था। अनुच्छेद 370 पर जयशंकर का कहना था कि तीन चरणों में कश्मीर में शांति का समाधान किया गया है। पहले चरण में 370 का हटना, दूसरे चरण में विकास, आर्थिक गतिविधियाँ और सामाजिक न्याय पर कार्य, तथा तीसरे चरण में अच्छे मत प्रतिशत के साथ चुनाव संपन्न होना शामिल है। 370 पर कार्यवाही के बाद जयशंकर का बयान आशा दिखाता है।अब इसका एक दूसरा पक्ष भी समझना आवश्यक है। संकल्प प्रस्ताव के विरोधियों का तर्क है कि 1972 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुए शिमला समझौते के बाद संसद में पारित इस प्रस्ताव का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। इस समझौते के अंतर्गत नियंत्रण रेखा को दोनों देशों के बीच सीमा के रूप में स्वीकार किया गया था। विरोधियों के इस तर्क की वास्तविकता को समझने के लिए इतिहास को जानना आवश्यक है।
वर्तमान में जिसे हम पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर कहते हैं, जिसे पाकिस्तान ‘आज़ाद कश्मीर’ कहता है, वह वास्तव में कश्मीर का भाग नहीं बल्कि जम्मू का हिस्सा था। इसलिए उसे कश्मीर कहना ही गलत है। वहाँ की भाषा कश्मीरी न होकर डोगरी और मीरपुरी का मिश्रण है। विभाजन के बाद कश्मीर के महाराजा हरि सिंह भारत में अपने राज्य के विलय के प्रस्ताव को स्वीकार कर चुके थे। भारत में विलय के बाद तत्कालीन कश्मीर राज्य के सम्पूर्ण भूभाग पर भारत का अधिकार स्थापित हुआ। इसलिए महाराजा हरि सिंह से हुई संधि के परिणामस्वरूप पूरे कश्मीर भूभाग पर भारत का अधिकार है।
22 फरवरी को संसद द्वारा पारित प्रस्ताव संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय कानूनी मानकों के अनुसार सही है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 370 और 35ए का हटना आवश्यक था। संविधान निर्माता बाबा भीमराव अंबेडकर अनुच्छेद 370 के पक्षधर नहीं थे। भारत में संवैधानिक अधिकार ही अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार हैं।इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। 1948 में जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों पर चर्चा चल रही थी, उस समय भारत का संविधान भी निर्मित हो रहा था। हमारे संविधान निर्माताओं ने भारतीय नागरिकों को मिलने वाले मूल अधिकारों में ही अधिकांश मानवाधिकारों को समाहित कर दिया। भारत में अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा कहे जाने वाले मानवाधिकार हमारे यहाँ संविधान प्रदत्त मूल अधिकार हैं।
जैसे-जैसे भारतीय नागरिकों को संवैधानिक अधिकार मिलते हैं, वैसे-वैसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों की पूर्ति होती है। संवैधानिक स्थिति के साथ ही हमारी सांस्कृतिक विरासत इतनी समृद्ध रही है कि वेदों और पुराणों में मानवाधिकारों को जीवन-शैली का अंग बना दिया गया है।“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु” इस श्लोक में सभी मानवाधिकार निहित हैं। इस श्लोक की व्याख्या में समता का अधिकार (अनु. 14–18), शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनु. 23–24) और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनु. 25–28) अंतर्निहित हैं।22 फरवरी के संकल्प की पूर्णता के बाद पाकिस्तान अधिकृत भूभाग के नागरिक भी बेहतर अधिकार प्राप्त कर सकेंगे। जयशंकर के बयान के बाद भारत का दृष्टिकोण मुखर एवं स्पष्ट है।