मातृभाषा में शिक्षा और शोध को बढ़ावा देकर भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा रहा है। नई शिक्षा नीति 2020 इस परिवर्तन की आधारशिला है।
प्रोफेसर राम प्रसाद प्रजापति (JNU, नई दिल्ली)
विश्व आज अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मना रहा है । यूनेस्को के प्रस्ताव पर 2000 से विश्व स्तर पर मनाये जाने वाला यह उत्सव भाषाई विविधता, सांस्कृतिक पहचान तथा मातृभाषा आधारित शिक्षा के महत्त्व को बढाता है। यह दिवस भाषाई विविधता के साथ यह भी बोध कराता है कि भाषा ज्ञान की आत्मा है । भाषा न केवल संवाद का माध्यम होती है, अपितु ज्ञान, संस्कृति और नवाचार की कुंजी भी होती है । जिस भाषा में मनुष्य सोचता, समझता और सपने देखता है, वही भाषा उसके सृजन, अनुसंधान और नवाचार की सबसे सशक्त माध्यम बनती है। आज जब विश्व ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है, तब मातृभाषा में शिक्षा और शोध का महत्त्व और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है। आंकड़े बताते है की विकसित देशों ने अपनी मातृभाषा को शिक्षा, शोध व नवाचार की भाषा बनाया तभी उनका विकसित राष्ट्र बनने का स्वप्न पूरा हुआ |
वर्तमान में अनेक शोध इस बात को सिद्ध कर रहे हैं कि मातृभाषा में शिक्षा और शोध सीखने की गुणवत्ता, समझ और अनुसंधान क्षमता को बढ़ाती है | यूनेस्को के वैश्विक शोध से पता चलता है कि जब बच्चों को उनकी अपनी भाषा में शिक्षा दी जाती है, तो सीखने की समझ अधिक गहरी हो जाती है और इसके बेहतर परिणाम मिलते है | मातृभाषा में शिक्षा से उनकी तर्क क्षमता मजबूत होती है और वे रचनात्मक रूप से सोचने में अधिक सक्षम होते हैं। मातृभाषा आधारित शिक्षा से बच्चों का बौद्धिक विकास बेहतर होता है | अपनी मातृभाषा में शोध, तकनीकी विकास तथा सांस्कृतिक संरक्षण को नई दिशा मिलती है। हमारे देश में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से शिक्षा प्रणाली में मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिया गया है । इस पहल के अच्छे परिणाम भी मिलना शुरू हो गए है | दुनिया भर में लगभग 7,000 भाषाएँ बोली जाती हैं | इनमें से कई भाषाएँ तकनीक, भाषा विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में शोध के लिए डिजिटल संसाधनों के निर्माण का विषय बन रही हैं।
इतिहास साक्षी है कि महान वैज्ञानिक उपलब्धियाँ प्रायः मातृभाषा में ही जन्म लेती हैं। जर्मनी में मैक्स प्लांक, आइंस्टीन और हाइजेनबर्ग जैसे वैज्ञानिकों ने अपने शोध का प्रारंभ जर्मन भाषा में किया। आधुनिक भौतिकी के जनक अल्बर्ट आइंस्टीन के प्रारम्भिक और सर्वाधिक क्रांतिकारी शोधपत्र जर्मन भाषा में लिखे गए थे। 19वीं और 20वीं सदी के आरंभ में जर्मन भाषा विज्ञान और भौतिकी की प्रमुख शोध भाषा थी। फ्रांस में गणित, रसायन और दर्शन के क्षेत्र में मौलिक कार्य फ्रेंच भाषा में हुए, जिसने वहां वैज्ञानिक परंपरा को मजबूत किया। जापान ने आधुनिक विज्ञान और तकनीक को जापानी भाषा में आत्मसात किया। परिणामस्वरूप जापान इलेक्ट्रॉनिक्स, रोबोटिक्स और ऑटोमोबाइल नवाचार में अग्रणी बना। दक्षिण कोरिया ने कोरियाई भाषा में उच्च शिक्षा और शोध को बढ़ावा देकर सेमीकंडक्टर, डिजिटल तकनीक और संचार के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल किया। चीन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विशाल ढांचा मंदारिन भाषा में खड़ा हुआ, जिससे अनुसंधान को व्यापक सामाजिक आधार मिला।
भारत की ज्ञान परंपरा सदियों तक संस्कृत, पाली, तमिल, फारसी और अन्य भारतीय भाषाओं में विकसित हुई। गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, धातुकर्म और दर्शन में हुए मौलिक योगदान इसी का प्रमाण हैं। औपनिवेशिक काल में अंग्रेज़ी शिक्षा के वर्चस्व ने भारतीय भाषाओं को हाशिये पर धकेल दिया, जिससे शिक्षा और समाज के बीच दूरी बढ़ी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इस ऐतिहासिक असंतुलन को सुधारने का प्रयास है। नीति स्पष्ट रूप से कहती है कि कम से कम प्राथमिक और अगर संभव हो तो माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा का माध्यम विद्यार्थी की मातृभाषा या स्थानीय भाषा में होना चाहिए। आज कई विश्वविद्यालयों और संस्थानों में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में विज्ञान, समाजशास्त्र और तकनीकी विषयों की सामग्री विकसित की जा रही है। यह एक सकारात्मक शुरुआत है, जिसे और व्यापक रूप देने की आवश्यकता है।
देश के प्रत्येक राज्य को चाहिए कि वह अपनी मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा, शोध और प्रशासन की मुख्यधारा में लाने के लिए ठोस कदम उठाए। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा अनिवार्य रूप से मातृभाषा में दी जाए, ताकि बच्चों की वैचारिक नींव मजबूत हो। माध्यमिक और उच्च शिक्षा में विज्ञान, गणित, समाजशास्त्र और तकनीकी विषयों की मानक पाठ्यपुस्तकें और संदर्भ सामग्री भारतीय भाषाओं में विकसित की जाएँ। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में मातृभाषा में शोध-लेखन, थीसिस और शोध-पत्र प्रस्तुत करने को प्रोत्साहन दिया जाए । इसके साथ ही उत्कृष्ट कार्यों के लिए विशेष अनुदान और सम्मान निर्धारित किए जाएँ। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मातृभाषा को अंग्रेज़ी के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान और नवाचार के समानांतर माध्यम के रूप में स्थापित किया जाए। जब देश के सभी राज्य अपनी भाषाओं में सोचने, पढ़ाने और शोध करने की संस्कृति विकसित करेंगे, तभी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावना के अनुरूप ज्ञान-समावेशी, आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से सशक्त भारत का निर्माण संभव होगा। यह प्रयास निश्चित ही 2047 तक विकसित भारत का संकल्प पूर्ण करेगा।