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कांकेर ग्रामसभा होर्डिंग विवाद: आदिवासी अधिकार बना

पाँचवीं अनुसूची बनाम धार्मिक स्वतंत्रताः कांकेर के आदिवासी गांवों में ‘कन्वर्जन विरोधी’ बोर्डों पर राष्ट्रीय विमर्श

कांकेर के आदिवासी गांवों में लगे ‘धर्मांतरण विरोधी’ बोर्डों पर उठा विवाद, पाँचवीं अनुसूची, पेसा कानून और अदालतों के फैसलों की पूरी पड़ताल।


पाँचवीं अनुसूची बनाम धार्मिक स्वतंत्रताः कांकेर के आदिवासी गांवों में ‘कन्वर्जन विरोधी’ बोर्डों पर राष्ट्रीय विमर्श

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के कुछ आदिवासी गांवों में लगे होर्डिंग से शुरू हुआ एक स्थानीय विवाद अब संवैधानिक बहस और राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुका है। मामला केवल इतना भर था कि ग्रामसभाओं ने गांव की सीमा पर ऐसे बोर्ड लगाए, जिनमें लिखा था कि ग्राम क्षेत्र में जबरन, प्रलोभन या भ्रम के माध्यम से होने वाली कन्वर्जन गतिविधियाँ स्वीकार्य नहीं होंगी। लेकिन इस सरल दिखने वाले निर्णय के पीछे पाँचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों की विशेष संवैधानिक स्थिति, पेसा कानून, धार्मिक स्वतंत्रता, जनजातीय संस्कृति और अदालतों की भूमिका जैसे कई गंभीर सवाल जुड़े हुए हैं। 

 पाँचवीं अनुसूची वाला आदिवासी इलाका

कांकेर जिला संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत घोषित अनुसूचित क्षेत्र में आता है, जहाँ बड़ी संख्या में अनुसूचित जनजाति की आबादी निवास करती है। इन क्षेत्रों में सामान्य पंचायत व्यवस्था के साथ-साथ ग्रामसभाओं को विशेष अधिकार और संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 यानी पेसा कानून के तहत ग्रामसभा को केवल विकास योजनाओं पर सहमति देने वाली इकाई नहीं, बल्कि स्थानीय परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों की रक्षक संस्था के रूप में मान्यता दी गई है। पेसा की धारा 4(d) साफ कहती है कि ग्रामसभा को अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का अधिकार होगा। इसी तारतम्य में अगस्त 2025 में कांकेर जिले के कुछ गांवों की ग्रामसभाओं ने प्रस्ताव पारित कर सूचना-पट्ट और होर्डिंग लगवाए, जिन पर बल, प्रलोभन या भ्रम के आधार पर कन्वर्जन गतिविधियों को अस्वीकार्य बताया गया और पाँचवीं अनुसूची व पेसा का हवाला दिया गया। 

किन गांवों में लगे बोर्ड और विवाद कैसे बढ़ा

सबसे पहले 5 अगस्त 2025 को भानुप्रतापपुर तहसील की बाँसला पंचायत के जुनवानी गांव से ऐसे बोर्ड की तस्वीर सामने आई, जिसमें बाहरी पास्टर/पादरियों के गाँव में प्रवेश पर रोक जैसा निर्देश लिखा था। इसके बाद कुडाल, परवी, बांसला, घोटा, घोटिया, बोंडानार, मुसुरपुट्टा और सुलंगी जैसे आठ गांवों में ऐसे ही बोर्ड लगाए गए। स्थानीय समाज का कहना था कि लंबे समय से कुछ बाहरी पास्टर, पादरी और संदिग्ध कन्वर्टेड समूह गांवों में आकर महिलाओं, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और सामाजिक रूप से हाशिए पर मौजूद वर्गों के बीच संगठित तरीके से कन्वर्जन की गतिविधियाँ चला रहे थे। ग्रामसभाओं को महसूस हुआ कि यदि समय रहते कोई सामुदायिक दिशा-निर्देश नहीं दिया गया तो गांव में सामाजिक विभाजन और परंपरागत व्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। 

इसी के चलते ग्रामसभा ने इसे विचार या आस्था पर हमला नहीं, बल्कि प्रलोभन और सामाजिक विघटन पर रोक के रूप में पेश किया। बोर्ड की भाषा में पाँचवीं अनुसूची और पेसा का उल्लेख इस बात का संकेत था कि ग्रामसभा अपने निर्णय को संविधान और वैधानिक ढांचे के भीतर उचित ठहराने की कोशिश कर रही है। लेकिन जैसे-जैसे इस घटना की तस्वीरें और सूचनाएँ सोशल मीडिया तथा कुछ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर पहुँचने लगीं, इसे ईसाई समुदाय के प्रवेश पर प्रतिबंध, धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला और आवागमन के अधिकार का उल्लंघन जैसे शीर्षकों के साथ पेश किया गया। ईसाई संगठनों और कुछ मानवाधिकार मंचों ने इसे अल्पसंख्यक अधिकारों पर चोट बताया। 

हाईकोर्ट में चुनौती: धर्म की स्वतंत्रता बनाम ग्रामसभा का अधिकार

मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में रिट याचिका के रूप में पहुँचा, जहाँ याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 19(1)(d) (भारत के भीतर स्वतंत्र आवागमन) के उल्लंघन का आरोप लगाया। न्यायालय के सामने मूल प्रश्न यह था कि क्या ये होर्डिंग स्वयं में असंवैधानिक हैं और क्या इनसे किसी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता या आने-जाने की स्वतंत्रता पर प्रत्यक्ष और वास्तविक प्रतिबंध लगता है। हाईकोर्ट ने भावनात्मक बहस के बजाय बोर्डों पर लिखे शब्दों का विश्लेषण किया और पाया कि वहाँ जबरन, प्रलोभन या भ्रम के माध्यम से कन्वर्जन पर रोक की बात लिखी है, न कि किसी धर्म विशेष के सभी अनुयायियों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध की। अदालत ने इसे गतिविधि-आधारित चेतावनी माना, न कि समुदाय-आधारित निषेध। 

न्यायालय ने यह भी याद दिलाया कि अनुच्छेद 25 की स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है, और रेव. स्टेनिस्लॉस बनाम मध्यप्रदेश (1977) के फैसले में Propagate का अर्थ किसी को बल, प्रलोभन या कपट से धर्म बदलवाना नहीं माना गया। छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 1968 की धारा 3 भी इसी सिद्धांत पर आधारित है, जो बल, प्रलोभन या कपट से कन्वर्जन पर रोक लगाती है। हाईकोर्ट ने पेसा और पाँचवीं अनुसूची की भावना को भी ध्यान में रखते हुए कहा कि ग्रामसभाओं को सांस्कृतिक संरक्षण का अधिकार है, लेकिन वे संविधान से ऊपर नहीं हैं। साथ ही, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पेसा नियमों के तहत ग्रामसभा के निर्णयों के विरुद्ध वैधानिक अपील और समीक्षा की प्रक्रिया उपलब्ध है, इसलिए सीधे रिट याचिका दाखिल करना उचित नहीं। अंततः अदालत ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर होर्डिंग स्वतः असंवैधानिक नहीं ठहराए जा सकते। 

संवैधानिक प्रश्नों से परहेज़ और वैकल्पिक उपाय पर जोर

हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) के माध्यम से चुनौती दी गई। यहाँ ईसाई पक्ष ने केवल होर्डिंग ही नहीं, बल्कि कथित हमलों, दफन विवाद और राज्यव्यापी उत्पीड़न जैसे अतिरिक्त मुद्दे भी जोड़ दिए, जो मूल रिट का हिस्सा नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले यह देखा कि हाईकोर्ट के सामने विवाद की वास्तविक सीमा क्या थी और यह कि हाईकोर्ट ने वैकल्पिक उपाय की उपलब्धता और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर निर्णय दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने Article 136 के तहत अपनी विवेकाधीन अपीलीय शक्ति का इस्तेमाल करने से इनकार किया और कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में कोई ऐसी गंभीर विधिक त्रुटि नहीं दिखती, जो हस्तक्षेप की मांग करे। साथ ही, उसने अपील में नए तथ्यात्मक विवादों के जोड़े जाने को भी स्वीकार नहीं किया। कानूनी रूप से यह रुख judicial restraint और constitutional avoidance के सिद्धांत के अनुरूप माना जा रहा है, जिसके तहत जब किसी विवाद का समाधान वैधानिक प्रक्रिया से संभव हो, तो अदालतें व्यापक संवैधानिक समीक्षा में नहीं कूदतीं। 

कन्वर्जन की जमीन पर खड़ा विवाद

इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए बस्तर और आसपास के आदिवासी इलाकों में सालों से चल रही कन्वर्जन से जुड़ी जमीनी हकीकत को भी समझना जरूरी है। स्थानीय रिपोर्टों और सामाजिक अनुभवों के अनुसार कई गांवों में चर्च नेटवर्क, प्रार्थना केंद्रों और स्थानीय एजेंटों के माध्यम से कन्वर्ज़न की गतिविधियाँ चलती रही हैं, जिन्हें आदिवासी समाज प्रलोभन, दबाव या सामाजिक विघटनकारी रणनीति के रूप में महसूस करता है। 

रिपोर्टों के मुताबिक कुछ गांवों में आधिकारिक जनगणना की तुलना में कहीं अधिक लोग व्यावहारिक रूप से ईसाई धर्म का पालन कर रहे हैं, जबकि जनजातीय परंपराओं से कटाव और ग्राम-जीवन में ध्रुवीकरण बढ़ा है। कई जगहों पर परंपरागत देवस्थानों, मेला-मड़ई, विवाह और मृत्युसंस्कार जैसी सामुदायिक प्रथाओं को अंधविश्वास या गलत बताकर उनसे दूरी बनाने के लिए प्रेरित किया जाता है, जिससे सामाजिक तनाव पैदा होता है। कांकेर के बोर्ड प्रकरण को स्थानीय समाज इसी पृष्ठभूमि में देखता है और इसे अपनी सांस्कृतिक अस्मिता तथा ग्राम-व्यवस्था की रक्षा के लिए उठाया गया कदम बताता है। 

 प्रतिबंध नहीं, सीमा की तलाश

कांकेर ग्रामसभा होर्डिंग विवाद को एक पंक्ति में अल्पसंख्यकों के प्रवेश पर प्रतिबंध कह देना इस जटिल मुद्दे के साथ अन्याय होगा। अदालतों के रिकॉर्ड और फैसलों को देखें तो यह मामला अधिकतर इस बात पर केंद्रित रहा कि क्या ग्रामसभा गतिविधि-आधारित कन्वर्जन पर रोक की बात कर सकती है, जबकि संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे। 

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने न तो ग्रामसभा के अधिकार को पूर्णतः निरस्त किया, न ही किसी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को समाप्त घोषित किया। दोनों न्यायालयों ने वैधानिक प्रक्रियाओं, मौलिक अधिकारों और स्थानीय स्वशासन के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है, ताकि पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में विकेंद्रीकरण भी बना रहे और संविधान की मूल संरचना भी सुरक्षित रहे। इसी संतुलन की खोज कांकेर के इन बोर्डों को एक स्थानीय विवाद से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय और संवैधानिक विमर्श का हिस्सा बना देती है। 

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