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India-US Trade Deal: More Than Tariffs and Numbers

टैरिफ से आगे:भारत-अमेरिका व्यापार समझौता आंकड़ों से कहीं बड़ा

भारत-अमेरिका व्यापार समझौता सिर्फ टैरिफ का मामला नहीं, यह रणनीति, कूटनीति और बदलती वैश्विक राजनीति के बीच लिया गया व्यावहारिक फैसला है


टैरिफ से आगेभारत-अमेरिका व्यापार समझौता आंकड़ों से कहीं बड़ा

अरुण आनंद

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर अब तक बहस टैरिफ और रियायतों तक सीमित रही है। इसे केवल आंकड़ों के नजरिए से देखने से असली तस्वीर पर से नजर हट जाती है। यह कोई साधारण व्यापारिक समझौता नहीं है। यह बदलती वैश्विक राजनीति, बढ़ते संरक्षणवाद और बड़ी ताकतों की प्रतिस्पर्धा के बीच लिया गया एक रणनीतिक फैसला है। आज व्यापार केवल कारोबार नहीं, बल्कि कूटनीति का अहम औजार है। इसलिए इस समझौते को सिर्फ हिसाब-किताब के चश्मे से नहीं, बल्कि भारत की बड़ी रणनीति के हिस्से के रूप में देखना चाहिए।

रिश्तों को पटरी पर लाने की कोशिश भारत-अमेरिका समझौता एक साधारण लेन-देन नहीं है। यह बिगड़ते रिश्तों को संभालने की कोशिश है। एक साल तक टैरिफ बढ़ोतरी, कानूनी विवाद और अन्य कई कारणों से भारत और अमेरिका के बीच दूरियां बढ़ रही थीं। हालात ऐसे हो गए थे कि बातचीत न होने की कीमत इस समझौते से कहीं ज्यादा भारी पड़ सकती थी। ऐसे में यह समझौता सारे मतभेद खत्म नहीं करता, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों को स्थायित्व देता है और अविश्वास को स्थायी दूरी बनने से रोकता है।

यह कोई पूर्ण मुक्त व्यापार समझौता भी नहीं है। यह एक सीमित और लचीला समझौता है, जो मौजूदा हालात को देखकर बनाया गया है। अमेरिका की नीतियां बदलती रहती हैं। भारत भी अपने विकल्प खुले रखना चाहता है। इसलिए यह समझौता दोनों देशों की जरूरतों के हिसाब से तैयार हुआ है। जब दो देशों के रिश्तों में दूरी आती है, तो तीसरी ताकतों को फायदा उठाने का मौका मिलता है। भारत-अमेरिका रिश्तों में ठंडापन आने से भारत-विरोधी देशों को यह मौका मिल रहा था। यह समझौता इस चुनौती से निपटने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

ध्यान रहे कि भारत-अमेरिका व्यापार विवादों का असर दूसरे अहम क्षेत्रों पर भी पड़ रहा था। महत्वपूर्ण खनिज, एल्युमिनियम, परमाणु ऊर्जा, रक्षा नवाचार और उन्नत निर्माण जैसे क्षेत्रों में भारत के लिए नई चुनौतियां पैदा हो रही थीं। यह समझौता इन बाधाओं से पार पाने का रास्ता खोलता है। समझौते के संदर्भ में यह भी समझना होगा कि रक्षा, ऊर्जा या बड़े खरीद समझौतों की घोषणाएं तुरंत पूरी करने के लिए नहीं होतीं। उनका मकसद दिशा दिखाना और उद्योग जगत को भरोसा देना होता है कि आगे सहयोग बढ़ेगा।

व्यावहारिक फैसला:भारत की ऊर्जा नीति में जो बदलाव दिख रहा है, वह कोई वैचारिक मोड़ नहीं है। यह आर्थिक संतुलन का मामला है। रूसी तेल का आयात घटा है, लेकिन उसे पूरी तरह बंद करना सही नहीं होगा। इससे अस्थिरता बढ़ सकती है। यह समझौता इस सच्चाई को स्वीकार करता है। इसलिए धीरे-धीरे विकल्प बढ़ाना, अचानक रिश्ता तोड़ने से बेहतर है।

श्रम मानकों और नियमों को लेकर कुछ चिंताएं भी हैं। लेकिन व्यापारिक समझौते केवल आदर्श साझेदारों से नहीं होते। वे वास्तविक परिस्थितियों में हितों को संभालने का तरीका होते हैं। इस लिहाज से यह समझौता न हार है, न जीत। यह दबावों में लिया गया एक व्यावहारिक फैसला है।भारत ने बातचीत कैसे की, यह भी उतना ही अहम है जितना उसका नतीजा। टकराव की जगह संवाद से रास्ता निकाला गया। इससे भारत की छवि एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में बनी है। टैरिफ में राहत से छोटे निर्यातकों को फायदा होगा, लेकिन बड़ा संदेश रणनीतिक है। भारत ने पीछे हटने के बजाय संवाद का रास्ता चुना।

व्यापार अब ताकत का साधन:भारत की व्यापक व्यापार नीति में यह समझौता संतुलन की रणनीति का हिस्सा है। भारत न पूरी तरह अमेरिका की ओर झुक रहा है, न एक निर्भरता को दूसरी से बदल रहा है। वह खुद को कई बाजारों और उत्पादन तंत्रों से जोड़ रहा है। इससे भारत के लिए अधिक विकल्प खुले रहेंगे।आज व्यापार कूटनीति का सबसे प्रभावी साधन बन चुका है। टैरिफ और बाजार तक पहुंच तय करते हैं कि आपूर्ति श्रृंखलाएं कहां जाएंगी और कौन-से रिश्ते मजबूत होंगे। भारत इस सच्चाई को समझता है। यह समझौता किसी एक देश के प्रति झुकाव दिखाने के लिए नहीं, बल्कि अपने हित सुरक्षित करने के लिए है।

दो रास्तों की नीति:भारत की व्यापार नीति अब दो रास्तों पर चलती दिख रही है। यूरोप स्थिरता देगा। अमेरिका बड़ा बाजार और अधिक मांग देगा। दोनों एक-दूसरे का विकल्प नहीं हैं। साथ मिलकर वे भारत के विकल्प बढ़ाते हैं। खासकर ऐसे समय में, जब अमेरिका की नीतियां अनिश्चित हैं और चीन की औद्योगिक ताकत बहुत बड़ी है।भारत की असली चुनौती केवल कम टैरिफ तय करवाना नहीं है। असली उद्देश्य लंबी अवधि के लिए स्थायी आर्थिक क्षमता बनाना है। अमेरिका के साथ व्यापार से निवेश, तकनीक, वैश्विक मानक और निर्माण का अनुभव मिलता है। इनका असर धीरे-धीरे दिखता है, लेकिन यही भारत की आर्थिक और रणनीतिक ताकत के लिए महत्वपूर्ण हैं।

निष्कर्ष:अमेरिका के लिए भारत हिंद-प्रशांत रणनीति में अहम है। भारत के लिए निवेश, तकनीक और बड़े बाजारों तक पहुंच जरूरी है। इस समझौते का स्वरूप भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि आपसी जरूरतों के आधार पर तय हुआ है। यह समझौता इस बात का द्योतक नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा। इसका मकसद दोनों देशों के बीच बढ़ रही रणनीतिक दूरी को रोकना, सहयोग की गति लौटाना और भारत को कई वैश्विक आर्थिक केंद्रों से जोड़ना है।आज के दौर में, जब व्यापार ही देशों की प्रमुख ताकत बन चुका है, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का आकलन केवल आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि रणनीति, कूटनीति और दीर्घकालीन राज्यनीति के संदर्भ में किया जाना चाहिए।

 

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