भारत के बढ़ते आत्मविश्वास से असहज औपनिवेशिक सोच, ट्रंप से राहुल गांधी तक एक जैसी दृष्टि और इसके राजनीतिक निहितार्थ
बलबीर पुंज
समय कई बार ऐसी चौंकाने वाली समानताएं हमारे सामने रख देता है, जो राजनीति-जीवन को नए तरीके से समझने का अवसर देती हैं। आज की उथल-पुथल भरी वैश्विक राजनीति में दो ऐसे व्यक्तित्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और देश के नेता प्रतिपक्ष (लोकसभा) राहुल गांधी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय होने के बावजूद बदलते भारत को देखने का दृष्टिकोण लगभग एक-सा रखते हैं। यह इसलिए भी अधिक हैरान करने वाला है, क्योंकि ट्रंप विदेशी हैं और राहुल भारत के शीर्ष नेताओं में एक।दोनों ही उस नए भारत से असहज हैं, जो अपनी जड़ों से जुड़कर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए बिना किसी हीनभावना के दुनिया से अपनी शर्तों पर आत्मविश्वास के साथ संवाद कर रहा है।एक ओर ट्रंप के रूप में वह दृष्टिकोण है, जो केवल लेन-देन पर आधारित है और वैश्विक व्यवस्था में अपनी धमक बरकरार रखने के लिए प्रयासरत है। वहीं राहुल एक ऐसे राजनीतिक वंश का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसने स्वतंत्र भारत की सत्ता को अपनी विरासत मानकर पश्चिमी स्वीकृति को ही कूटनीतिक सफलता का पर्याय समझा है।
ट्रंप द्वारा भारत को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ कहना कोई साधारण कूटनीतिक चूक नहीं थी। दरअसल, यह उस मानसिकता की झलक थी, जिसमें किसी राष्ट्र की ताकत को उसकी स्वतंत्र नीतियों से नहीं, बल्कि वह कितना ‘हां में हां मिलाता है’ उस पैमाने पर आंका जाता है। ट्रंप के सहयोगियों द्वारा भारत को रूस का ‘लॉन्ड्रोमैट’ बताना और रूसी तेल खरीद के मुद्दे पर ब्राह्मण समाज को निशाना बनाना महज आर्थिक टिप्पणियां नहीं थीं, बल्कि कुटिल औपनिवेशिक चिंतन की परछाईं थीं।लोकतंत्र में आलोचना स्वाभाविक है। लेकिन यह चिंताजनक तब हो जाता है, जब देश का कोई प्रमुख नेता बाहरी पूर्वाग्रहों को अंतिम सत्य मानकर उन्हें दोहराने लगता है। राहुल द्वारा ट्रंप के ‘मृत अर्थव्यवस्था’ कथन का समर्थन मोदी सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता का उदाहरण है।पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत-पाकिस्तान युद्धविराम में अमेरिकी मध्यस्थता को लेकर ट्रंप के दावे पर उन्होंने प्रधानमंत्री पर ‘नरेंद्र-सरेंडर’ जैसी टिप्पणी कर दी, जबकि भारत किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से साफ इनकार कर चुका था, जिसकी पाकिस्तान भी गवाही देता है।
निसंदेह, सशक्त विपक्ष के बिना लोकतंत्र अधूरा है। लेकिन अपने ही देश के खिलाफ बाहरी आरोपों को प्रामाणिक मानकर प्रस्तुत करना खतरनाक प्रवृत्ति है। भारत इसी परतंत्र मानसिकता के कारण शताब्दियों तक विदेशी आक्रांताओं के अधीन रहा था।बात राहुल के वक्तव्यों तक ही सीमित नहीं है। वे संसद जैसी गंभीर संस्था को अपने आचरण से कई बार उपहास का विषय बना चुके हैं। हाल ही में लोकसभा में उन्हें जनरल (सेवानिवृत्त) मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा से उद्धरण देने से जो न तो सार्वजनिक है और न ही रक्षा मंत्रालय द्वारा स्वीकृत संसदीय नियमों के तहत रोका गया।इस दौरान लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने यह भी खुलासा किया कि संसद में चर्चा के समय प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई अप्रिय हरकत करने की कोशिश की जा रही थी।राहुल की यह ‘अराजक’ शैली नई नहीं है। वर्ष 2018 में लोकसभा में प्रधानमंत्री को जबरन गले लगाने के बाद अपने सहयोगियों को आंख मारने की घटना आज भी जेहन में ताजा है। नाटकीयता गंभीर राजनीति का पर्याय नहीं हो सकती, वह संस्थागत गरिमा को आहत करती है। संसद परिसर में एक केंद्रीय मंत्री का जबरन हाथ पकड़कर संयुक्त प्रेस वार्ता का प्रयास भी इसी मानसिकता का विस्तार था।
जाने-अनजाने में राहुल देश-विरोधियों के हाथों में भी खेलने लगते हैं। सितंबर 2024 की अमेरिका यात्रा के दौरान उन्होंने दावा किया कि भारत में सिख समुदाय की पहचान खतरे में है। इस बयान को खालिस्तानी गुरपतवंत सिंह पन्नून ने अपने एजेंडे के समर्थन में तुरंत लपक लिया।इससे पहले वर्ष 2023 में ब्रिटेन यात्रा के दौरान राहुल द्वारा दिए गए वक्तव्यों का आशय था कि ‘भारत में लोकतंत्र समाप्त हो चुका है’ और उसे बचाने के लिए ‘पश्चिमी हस्तक्षेप’ अपेक्षित है। अक्सर विदेशों में दिए गए ऐसे वक्तव्य घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहते और भविष्य में देश के शत्रुओं के प्रचार-तंत्र का हथियार बन जाते हैं।राहुल इस तरह का व्यवहार क्यों करते हैं? क्या इसलिए कि वे ‘विशेषाधिकार की भावना’ से ग्रस्त हैं? क्या वे मानते हैं कि केवल उन्हें ही अपने मुताबिक ‘लोक’ (जनमानस) और ‘तंत्र’ (मीडिया, न्यायालय सहित) चलाने का ‘दैवीय अधिकार’ है?असल में, उनका यह चिंतन न तो 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद पनपा है और न ही यह भाजपा-आरएसएस तक सीमित है। 27 सितंबर 2013 को उन्होंने अपनी ही केंद्र सरकार के एक अध्यादेश को ‘बकवास’ बताते हुए उसे सार्वजनिक रूप से ‘फाड़कर फेंकने’ की बात कही थी।
इसी कड़ी में 2019 की एक चुनावी रैली में उन्होंने ‘मोदी’ उपनाम वाले सभी लोगों को ‘चोर’ कहा, तो 2024 की एक सभा में भाजपा के दोबारा सत्ता में आने पर देश के ‘आग में जल उठने’ की आशंका जताई।लगातार चुनावी पराजयों के बाद वे चुनाव आयोग और पूरी निर्वाचन प्रक्रिया पर भी सवाल उठा रहे हैं।राहुल कांग्रेस को उस व्यवस्था से आते हैं, जिसमें भारतीय परंपरा-स्वाभिमान को उत्सव का नहीं, बल्कि तथाकथित पिछड़ेपन, उत्पीड़न और महिला-विरोध का प्रतीक माना जाता है। दशकों तक भारतीय संस्कृति के प्रति हीन-भावना रखने वालों को मतदाता लगातार खारिज कर रहे हैं।वर्ष 2014 से ऐसे राजनीतिक नेतृत्व को जनादेश मिल रहा है, जो सभ्यतागत पुनरोद्धार, कल्याणकारी वितरण और रणनीतिक दृष्टि से ईमानदार है। भारत अभूतपूर्व स्तर पर आधारभूत संरचना का निर्माण, डिजिटल माध्यम से जनहित योजनाओं का विस्तार, रक्षा क्षेत्र का आधुनिकीकरण और बहुपक्षीय मंचों पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
ट्रंप अपने व्यवहार और वक्तव्यों से भारत का बहुत अधिक नुकसान नहीं कर सकते। एक तो उनका कार्यकाल सीमित है। दूसरा, भारत इतना सामर्थ्यवान हो चुका है कि वह किसी भी बड़ी वैश्विक शक्ति का विरोध सहते हुए सिर ऊंचा करके जी सकता है। परंतु भारत के भीतर, विशेषकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा दिए जाने वाले गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्य देश को गंभीर और गहरा नुकसान पहुंचा सकते हैं।