भारत में ‘फ्रेंड विद बेनिफिट’ संस्कृति किशोरों और परिवारों को कैसे प्रभावित कर रही है, इसके सामाजिक और मानसिक परिणामों पर विश्लेषण
कैलाश कन्द्र
भारत के सामाजिक परिदृश्य में एक बेचैन कर देने वाला बदलाव तेजी से उभर रहा है और उसकी सबसे मार्मिक मिसाल हाल में सामने आई वह घटना है, जिसमें 15 वर्ष की एक छात्रा गर्भवती पाई गई। डॉक्टर ने जब उससे पूछा कि बच्चा किससे हुआ है, तो उसका उत्तर था “पता नहीं… कई थे।” यह घटना कोई सनसनीखेज अपवाद नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे गहरी और अनदेखी की जा रही सामाजिक सच्चाई का ध्वज है।
उस किशोरी ने कबूल किया कि महंगे फोन, रिचार्ज, आउटिंग और ‘कूल लाइफस्टाइल’ की चाह में वह कई लड़कों के साथ ‘फ्रेंड विद बेनिफिट’ संबंधों में रही। उसके शब्द सिर्फ एक लड़की की व्यक्तिगत त्रासदी का बयान नहीं, बल्कि उस परिघटना का रूपक हैं, जो भारत के 13–18 वर्ष आयु वर्ग में तेजी से आकार ले रही है।
आँकड़े जो चौंकाते नहीं, चेताते हैं राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) 2023 बताता है कि नाबालिगों पर होने वाले यौन अपराधों में 97% अपराधी ‘परिचित’ होते हैं—मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदार, ऑनलाइन साथी, स्कूल-कॉलेज के परिचित। यह आँकड़ा एक असहज सत्य पर रोशनी डालता है कि खतरा ‘किसी बाहर वाले’ से नहीं, बल्कि बच्चों की उसी दुनिया से आता है, जिसे हम सुरक्षित समझते हैं।
एनएफएचएस-5 में भी स्पष्ट दिखता है कि शहरी भारत में किशोरियों की शारीरिक संबंधों की प्रथम आयु 13–15 वर्ष के बीच खिसक रही है। डब्ल्यूएचओ के दक्षिण एशिया अध्ययन (2022) के अनुसार, 13–17 आयु वर्ग की 71% लड़कियाँ इंटरनेट आधारित यौन सामग्री देखती हैं और 41% वेब-सीरीज या सोशल मीडिया के प्रभाव में आकर संबंध बनाती हैं। ये तथ्य बताते हैं कि यह समस्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संरचनात्मक और बहुस्तरीय है।
डिजिटल सबवर्शन : वर्चुअल दुनिया का अधिपत्य
आज का किशोर भौतिक संसार से कम और वर्चुअल संसार से अधिक प्रभावित है। इंस्टाग्राम, रील्स, ओटीटी, डेटिंग ऐप्स ये अब शौक नहीं, बल्कि किशोर मन की संरचना का आधार बन चुके हैं। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल (2021) का अध्ययन बताता है कि 13–17 वर्ष के किशोरों में प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स अभी पूरी तरह विकसित नहीं होता। इम्पल्स कंट्रोल 40% कम होता है और जोखिम लेने की प्रवृत्ति सामान्य से लगभग दोगुनी हो जाती है।
जब ऐसे मस्तिष्क पर ‘डिजिटल डोपामीन’ की बाढ़ रोज-रोज, पल-पल गिराई जाए, तो परिणाम सीमाओं के टूटने, नैतिकता के धुंधलाने और जोखिमपूर्ण संबंधों के सामान्यीकरण के रूप में सामने आते हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर 2018–2023 के बीच किशोर पात्रों के यौन चित्रण में 56% वृद्धि दर्ज की गई है। इसका सीधा परिणाम यह है कि किशोरों के लिए रिश्ते ‘तजुर्बा’, शरीर ‘वस्तु’ और सीमाएँ ‘पुरानी अवधारणाएँ’ बनती जा रही हैं। यह डिजिटल सबवर्शन है, जो पहले मन को प्रभावित करता है, फिर व्यवहार को।
परिवार : उपस्थिति के अभाव से शुरू हुआ विखंडन
शहरों में माता-पिता यह मान बैठे हैं कि बच्चों को महंगी सुविधाएँ देना ही पालन-पोषण का अंतिम रूप है। लेकिन सच यह है कि सुविधा देना और उपस्थित रहना दोनों बिल्कुल अलग चीजें हैं। पीईडब्ल्यू रिसर्च (2021) के अनुसार, भारतीय शहरी माता-पिता प्रतिदिन तीन घंटे से अधिक मोबाइल पर बिताते हैं, जबकि अपने बच्चों से औसत संवाद सिर्फ 18 मिनट का होता है। यह 18 मिनट का संवाद न भविष्य बनाता है, न मूल्य।
इस संवादहीनता के शून्य में पीयर ग्रुप, इन्फ्लुएंसर संस्कृति, ओटीटी कथानक और इंस्टाग्राम की आक्रामक छवियाँ बच्चों के मूल्य-संस्कार तय करने लगती हैं। जब 15 वर्ष का बच्चा 40–50 हजार रुपये का फोन लिए घूमता है और माता-पिता उसकी आर्थिक पृष्ठभूमि या ‘स्रोत’ पर सवाल नहीं करते, तो यह वही नजरअंदाजी है, जो आगे चलकर बड़ी दुर्घटनाओं का कारण बनती है।आज का परिवार ‘प्रोवाइडिंग पेरेंटिंग’ की ओर झुक गया है जहाँ धन उपलब्ध है, लेकिन भावनात्मक उपस्थिति, मार्गदर्शन और मूल्य-निर्माण गायब है। यही अनुपस्थिति बच्चों को डिजिटल जंगल में अकेला छोड़ देती है।
किशोरियों पर सबसे गहरा प्रहार : मानसिक स्वास्थ्य
‘एडोलसेंट हेल्थ रिव्यू’ (2022) के मुताबिक, एफडब्ल्यूबी संस्कृति का सबसे भारी असर मानसिक स्तर पर पड़ता है आत्मसम्मान में गिरावट, अवसाद और चिंता, इमोशनल नंबनेस, सेल्फ-वर्थ का टूटना और पहचान संकट। किशोरियों में संबंधों का ‘लेन-देन मॉडल’ विकसित होता है, जहाँ वे स्वयं को ‘वस्तु’ की तरह महसूस करने लगती हैं।15 वर्षीय लड़की का यह न जान पाना कि गर्भ किससे है, केवल यौन असावधानी नहीं, बल्कि भावनात्मक विखंडन की चरम अवस्था है जहाँ शरीर, भावनाएँ और पहचान एक-दूसरे से कट चुकी हैं।
उपभोक्तावाद का मनोविज्ञान : लाइक्स में खोजी जा रही पहचान
बाजार ने किशोरों को अपना सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग बना दिया है। ब्रांडिंग की रणनीति साफ है किशोरों की असुरक्षाओं को लक्ष्य करो और उन्हें यह विश्वास दिलाओ कि उनकी ‘कीमत’ महंगे फोन, फैशनेबल कपड़ों और सोशल मीडिया लाइक्स में छिपी है। जब पहचान वस्तुओं के सहारे बनने लगती है, तब शरीर, संबंध और नैतिकता भी बाजार की मुद्रा में बदल जाते हैं। यह उपभोक्तावाद का वह चेहरा है, जो आधुनिक किशोरावस्था को सबसे अधिक चोट पहुंचाता है।
पश्चिमी अवधारणाओं का बिना फिल्टर प्रवेश
‘फ्रेंड विद बेनिफिट’ संस्कृति पश्चिम में भी विवादित और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानी जाती है। लेकिन भारत में यह पश्चिमी अवधारणा बिना किसी सांस्कृतिक फिल्टर, पारिवारिक संवाद या स्कूल आधारित मार्गदर्शन के प्रवेश कर गई। यह टकराव भारतीय सामाजिक संरचना से होकर अब रिश्तों के विघटन, सामूहिकता के क्षरण और मूल्य-संक्रमण के रूप में सामने आ रहा है।
यह केवल सामाजिक संकट नहीं, राष्ट्रीय संकट है
यदि 13–18 आयु वर्ग में भावनात्मक टूटन, डिजिटल लत, यौनिक प्रयोगशीलता और नैतिक भ्रम ऐसे ही बढ़ते गए, तो इसका असर भारत के भविष्य के कार्यबल, सामाजिक स्थिरता, राष्ट्रीय मानव-संपदा और सामूहिक मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा पड़ेगा। राष्ट्र की शक्ति उसकी संख्या में नहीं, बल्कि उसकी युवा पीढ़ी की मानसिकता, अनुशासन और मूल्य-संरचना में निहित होती है। यदि वही पीढ़ी दिशाहीन हो जाए, तो राष्ट्र की ऊर्जा भी दिशाहीन हो जाती है।
समाधान : चार स्तंभों का संयुक्त प्रयास
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परिवार - डिजिटल पेरेंटिंग अनिवार्य हो; फोन देना और निगरानी दोनों। संवाद की पुनर्स्थापना—हर दिन कम से कम 30 मिनट पारिवारिक संवाद समय। किशोरियों को सेल्फ-वर्थ, सीमाएँ और स्वस्थ संबंधों के मूल्य सिखाना।
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विद्यालय- डिजिटल नैतिक शिक्षा और आयु-उपयुक्त सेक्स-सुरक्षा वार्ता। प्रशिक्षित काउंसलरों की नियुक्ति, लेकिन उन पर निगरानी भी उतनी ही मजबूत हो।
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सरकार - पोर्नोग्राफी, डेटिंग ऐप्स और अडल्ट प्लेटफॉर्म्स पर कड़ा एज-वेरिफिकेशन। ओटीटी पर टीन-सेंसिटिव रेटिंग का अनिवार्य क्रियान्वयन। सोशल मीडिया कंपनियों को ‘किशोर मानसिक स्वास्थ्य’ के प्रभाव पर उत्तरदायी बनाना।
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समाज - जागरूकता अभियान, संवाद मंच, माता-पिता-किशोर कार्यशालाएँ। सामाजिक संस्थाओं द्वारा मूल्य-निर्माण आधारित कार्यक्रम।
यह चेतावनी है, अंतिम अध्याय नहीं
15 वर्षीय लड़की की घटना हमें बताती है बच्चे अकेले पड़ चुके हैं और डिजिटल बाजार उनके मन पर कब्जा कर चुका है। यदि हम आज नहीं जागे, तो आने वाला समय भावनात्मक रूप से टूटे, डिजिटल रूप से शोषित और नैतिक रूप से दिशाहीन युवाओं से भरा होगा। बच्चे भविष्य नहीं, भारत की वर्तमान नींव हैं। उन्हें सुरक्षित रखना, मानसिक रूप से सशक्त बनाना और मूल्य-संपन्न बनाना यही राष्ट्र की असली शक्ति है।