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Emergency Story: When Police Took Son From Kitchen

आपातकाल की आपबीती: घरों में खाना बनाती माँ, बेटे को उठा ले गई पुलिस

भोपाल के टीला जमालपुरा से आपातकाल की एक मार्मिक कहानी, जब घर में खाना बनाती मां के बेटे को मीसा में गिरफ्तार कर लिया गया


आपातकाल की आपबीती घरों में खाना बनाती माँ बेटे को उठा ले गई पुलिस

आपातकाल की कहानी केवल जेल जाने वालों की नहीं, उन माताओं की भी है जो घर की चौखट पर खड़ी होकर अपने बेटों की राह देखती रहीं। भोपाल के टीला जमालपुरा के स्व. प्रदीप शर्मा की कहानी भी ऐसी ही है। घरों में खाना बनाकर बेटों का पालन करने वाली माँ का सहारा जब पुलिस उठा ले गई, तब एक परिवार पर मानो पहाड़ टूट पड़ा। यह संस्मरण उनकी पत्नी श्रीमती कृष्णा शर्मा की जुबानी उस दौर की पीड़ा और साहस का साक्षी है।

भोपाल। यहां टीला जमालपुरा में स्व. प्रदीप शर्मा का घर था। वे बचपन में ही अपने पिता नेतराम शर्मा को खो चुके थे। उनकी मां ने घरों में भोजन बनाकर दोनों बेटों का पालन किया। बड़े भाई राधेश्याम शर्मा ग्वालियर में नौकरी करते थे और घर का खर्च मां की मेहनत तथा भाई की कमाई से चलता था। आपातकाल के समय प्रदीप शर्मा 12वीं कक्षा के छात्र थे। तब तक उनका विवाह नहीं हुआ था।

श्रीमती कृष्णा शर्मा बताती हैं कि विवाह के बाद पति अक्सर उस दौर की घटनाएं सुनाते थे। वे बताते थे कि कैसे अचानक माहौल बदल गया, कैसे पुलिस बिना चेतावनी घर पहुंची और उन्हें मीसा के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। जिस बेटे के सहारे मां अकेली रह रही थीं, वही बेटा एक दिन जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गया।बेटे के जेल जाने की खबर मिलते ही मां व्याकुल हो उठीं। वे पूरी तरह असहाय महसूस करने लगीं। गुलशन गार्डन के मालिक और विदिशा के राघवजी सहित कुछ कार्यकर्ताओं ने उन्हें ढांढस बंधाया। समय-समय पर उन्हें जेल ले जाकर बेटे से मिलवाया जाता था। जेल में बेटे को देखकर मां की आंखें भर आती थीं, फिर भी वे उसे हिम्मत देतीं कि हौसला बनाए रखो।

श्रीमती शर्मा के अनुसार, उनके पति आपातकाल के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ आंदोलन में सक्रिय रहे। मीसाबंदी परिवारों की सेवा हो या सरकार के विरोध में प्रदर्शन, वे पीछे नहीं हटे। जेल में भी वे शिवराज सिंह चौहान के साथ एक ही बैरक में रहे। जेल जाने से उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई, पर संकल्प कमजोर नहीं पड़ा।

इस कठिन समय में संघ के स्वयंसेवकों ने परिवार को सहारा दिया। मां को ढांढस बंधाया गया और घर चलाने के लिए सहयोग पहुंचाया गया। श्री शर्मा के जेल में रहने तक प्रतिदिन कार्यकर्ता घर आकर हालचाल लेते और मदद करते रहे। यह सहयोग परिवार के लिए बड़ा संबल बन गया।आपातकाल समाप्त होने के बाद जब प्रदीप शर्मा घर लौटे, तो मां की आंखों में राहत और खुशी एक साथ छलक उठी। जेल का अनुभव उनके जीवन का स्थायी हिस्सा बन गया था। बाद के वर्षों में पार्टी और संगठन ने उन्हें अनेक जिम्मेदारियां सौंपीं। वे स्व. कैलाश नारायण सारंग के राजनीतिक सहयोगी रहे और विश्वास सारंग के पार्षद चुनाव में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

श्रीमती कृष्णा शर्मा बताती हैं कि वर्ष 2001 में उनके पति का निधन हो गया। उनके दो बेटे और एक बेटी हैं। पर आज भी जब वे उस दौर की बात करती हैं, तो उनकी आवाज भर आती है।यह संस्मरण बताता है कि आपातकाल केवल राजनीतिक दमन नहीं था, वह एक मां के धैर्य और एक बेटे के संकल्प की भी कहानी है। घरों का चूल्हा संभालने वाली मां ने जिस साहस से संकट झेला, वही उस दौर की असली ताकत थी।

 

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