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Caste Politics and Organisational Crisis in Indian

जाति, संगठन और चुनावी राजनीति के संकट

लगातार चुनावी सफलता के बीच जाति आधारित राजनीति और संगठनात्मक समरसता के टकराव ने नए वैचारिक संकट को जन्म दिया है


जाति संगठन और चुनावी राजनीति के संकट

प्रो. आनन्द पाटील

भाजपा की सफलता व तात्कालिक संकट की ओर बूथ-स्तर की संगठनात्मक संरचना और सक्रियता, घर-घर संपर्क तथा सामाजिक इंजीनियरिंग (नेटवर्किंग, जो भी कहिए) ने इन सफलताओं में निर्णायक भूमिका निभाई है। किन्तु इसी चुनावी सफलता के समानान्तर, संगठनात्मक दृष्टि से कुछ ऐसे असहज प्रश्न मुँह बाए खड़े हैं, जो अब केवल राजनीति तक सीमित नहीं रह गए हैं। वे धीरे-धीरे गहरे वैचारिक और संगठनात्मक संकट की ओर संकेत करते हैं।

इसका एक प्रमुख लक्षण यह है कि हिन्दू समाज के भीतर जाति-आधारित विमर्श पुनः उफान मारता दिखाई दे रहा है। इसके पीछे सरकार द्वारा इस मध्य लिए गए कुछ निर्णय भी उत्तरदायी हैं। यद्यपि जातियाँ प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे के बरक्स तनकर खड़ी नहीं दिखतीं, परन्तु भीतर-भीतर उनके बीच टकराव व प्रतिस्पर्धा गहराती जा रही है। इस अंतर्द्वंद्व की झलक सामाजिक संचार माध्यमों पर स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है, जहाँ पहचान और श्रेष्ठता के संदेश अधिक मुखर होते जा रहे हैं। यह परिघटना मात्र सामाजिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि परिवर्तित होते राजनीतिक आचरण की परिणति भी है।

भाजपा को निरन्तर चुनावी विजय का एक अप्रत्याशित परिणाम यह भी रहा है कि कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में सुविधाजनक व अवसरानुकूल जाति-आधारित दृष्टि का विकास हुआ है। यह दृष्टि वैचारिक प्रतिबद्धता या सामाजिक समरसता के आदर्श से अधिक, चुनावी उपयोगिता और तात्कालिक लाभ से संचालित प्रतीत होती है। फलस्वरूप, जाति की भूमिका अब ‘सामाजिक यथार्थ’ तक सीमित न रहकर ‘राजनीतिक रणनीति के उपकरण’ में परिवर्तित होती दिखाई देती है। इस प्रकार, जिस संगठनात्मक संस्कृति का लक्ष्य जाति-पार सामाजिक एकता था, वही संस्कृति आज राजनीतिक व्यवहार के दबाव में अंतर्विरोधों से जूझती दिख रही है।

चुनावी सफलता जहाँ एक ओर ‘संगठन की शक्ति’ का प्रमाण देती है, वहीं दूसरी ओर उसके भीतर पनपते ‘जाति-आधारित वैचारिक तनावों’ को भी उजागर कर रही है।

वर्तमान स्थिति यह है कि कुछ लोग अब जाति के मूल स्वरूप पर विचार करते हुए, उसे ‘महत्वपूर्ण सामाजिक आवश्यकता’ बताकर उसका तात्कालिक विश्लेषण करने लगे हैं। निस्संदेह चुनावी राजनीति ने जाति के प्रभाव और उसकी निर्णायक भूमिका को भली-भाँति पहचान लिया है और तदनुरूप अपनी चालें चलना आरम्भ कर दिया है। परिणामस्वरूप, वर्तमान परिदृश्य में दो स्पष्ट धाराएँ उभरती दिखाई देती हैं। एक ओर जाति-आधारित राजनीति की व्यावहारिक, सत्ता-संचालित धारा है, तो दूसरी ओर संगठन का घोषित आदर्शवाद है, जिसका केन्द्र समरसता, सामाजिक समन्वय और जाति-आधारित विभाजन से ऊपर उठकर हिन्दुओं की समस्त जातियों को एकता-सूत्र में बाँधने का संकल्प रहा है।

यहीं मूल टकराव जन्म लेता है। एक ओर संगठनात्मक और वैचारिक स्तर पर समरसता मूल तत्व है, तो दूसरी ओर राजनीतिक व्यवहार में जाति ‘रणनीतिक साधन’ के रूप में स्वीकृत है। यह द्वैत केवल रणनीति तक सीमित न रहकर धीरे-धीरे विचार एवं दृष्टि को भी प्रभावित करता है। जब सुविधानुसार जाति को महत्व दिया जाता है, तब समरसता का आदर्श नारे तक सिमटकर रह जाता है।

इस संदर्भ में यह तथ्य विस्मृत नहीं किया जा सकता कि भारतीय समाज के इतिहास में तथाकथित ‘श्रेष्ठतर’ ने अनेक बार तथाकथित ‘निकृष्टतर’ का पददलन किया है, और कालांतर में यदा-कदा शक्ति-संतुलन बदलने पर तथाकथित ‘निकृष्टतर’ ने भी उसी प्रवृत्ति को दोहराया है। यह चक्र आज भी किसी-न-किसी रूप में जारी है। अतः जाति को केवल विश्लेषणात्मक या रणनीतिक उपकरण मान लेना, बिना उसके ऐतिहासिक और सामाजिक दुष्परिणामों को समझे, दीर्घकालिक वैचारिक लक्ष्य के लिए घातक सिद्ध होगा।

वर्तमान समय में जो टकराव दिखाई देते हैं, वे केवल चुनावी विवशता और आदर्शवादी घोषणाओं के मध्य का नहीं, बल्कि संगठन की आत्मा और उसकी राजनीतिक रणनीति के बीच का द्वंद्व हैं। यदि इस द्वंद्व को वैचारिक स्पष्टता और आत्मालोचनात्मक साहस के साथ नहीं सुलझाया गया, तो चुनावी सफलताएँ अंततः संगठनात्मक खोखलेपन और वैचारिक अपक्षय को ढकने का आवरण मात्र बनकर रह जाएँगी।

संगठन की दृष्टि से, आरम्भिक और केन्द्रीय लक्ष्य समस्त हिन्दुओं का संगठन करना रहा है। यह लक्ष्य केवल संख्यात्मक एकीकरण से नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता से ही संभव था। समरसता का अर्थ स्पष्ट था—पूर्वाग्रहों का त्याग, समान सहभागिता की स्वीकृति और सामाजिक दायित्वों का साझा निर्वाह। दूसरे शब्दों में, संगठन का आधार ‘श्रेष्ठता’ या ‘हीनता’ नहीं, बल्कि सहभागिता और पारस्परिक सम्मान होना चाहिए था।

किन्तु सामाजिक यथार्थ यह है कि शताब्दियों से विकसित श्रेष्ठता-बोध और हीनता-बोध ने हिन्दू समाज के भीतर गहरी दरारें बनाए रखी हैं, जो समय-समय पर अधिक विभाजक होती दिखाई देती हैं। इन दरारों को पाटने का कार्य दीर्घकालिक सामाजिक संस्कार, आत्मसंयम और निरंतर संवाद से ही संभव था। इसके विपरीत, 2014 के बाद उभरी चुनावी राजनीति की निरंतर सफलता ने इन प्रवृत्तियों को कम करने के बजाय कई बार और गहरा कर दिया है।

सत्ता-प्राप्ति के तात्कालिक लक्ष्य और चुनावी दाँव-पेचों ने जाति को सामाजिक समस्या के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक संसाधन के रूप में देखने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया है। यही कारण है कि आज विमर्श में दो परस्पर विरोधी धाराएँ समानान्तर चलती दिखाई देती हैं। एक ओर सामाजिक समरसता का आदर्श है, जिसे वैचारिक स्तर पर दोहराया जाता है; दूसरी ओर चुनावी व्यवहार है, जिसमें जाति-आधारित गणना, हिस्सेदारी का सौदेबाजी मॉडल और पहचान-आधारित लामबंदी केन्द्रीय भूमिका निभा रही है।इस प्रक्रिया में श्रेष्ठता-बोध और हीनता-बोध का पुराना ढाँचा टूटने के बजाय नए राजनीतिक अर्थों में पुनर्गठित हो रहा है। इसका एक गंभीर परिणाम यह हुआ है कि ‘हिन्दू’ की परिभाषा स्वयं एक ‘गतिशील’ और ‘सुविधाजनक’ अवधारणा बनती जा रही है।

 

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