भोपाल में नशे का बढ़ता जाल, 1900 करोड़ की ड्रग्स बरामदगी के बावजूद बेखौफ तस्कर। कॉलेज, बस्तियां और युवा सबसे ज्यादा चपेट में
केशवराज पांडे
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल, जिसे अब तक शांति, हरियाली और झीलों की नगरी के रूप में जाना जाता था, आज एक गहरे और खतरनाक सामाजिक संकट के मुहाने पर खड़ी नजर आ रही है। हालिया पुलिस रिपोर्ट, क्राइम ब्रांच के आंकड़े, केंद्रीय जांच एजेंसियों की बड़ी कार्रवाइयों और बीते एक साल में करीब 1900 करोड़ रुपये से अधिक की ड्रग्स बरामदगी ने यह साफ कर दिया है कि भोपाल अब नशे के संगठित कारोबार का एक बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र, हॉस्टल, पब-नाइट क्लब संस्कृति, झुग्गी-झोपड़ियां, गरीब बस्तियां और अंतरराज्यीय व अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क इन सभी ने मिलकर राजधानी को 'उड़ता भोपाल' की ओर धकेल दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शराब दुकानों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन उसके अनुपात में नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या बेहद कम है।विशेषज्ञ ऐसे में सरकार को नीति, निगरानी और संसाधनों, तीनों स्तरों पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है, ताकि युवा पीढ़ी को इस विनाशकारी लत से बचाया जा सके और समाज को एक सुरक्षित दिशा दी जा सके है.
1900 करोड़ की ड्रग्स बरामदगी
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पिछले एक साल में भीधात में कर बड़े इन सिविकेट का भंडा हुआ।
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अक्टूबर 2024-औद्योगिक क्षेत्र से 1814 करोड़ की एमडी हग्स बरामद की गई।
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अगस्त 2025 - इंटखेड़ी के अचारपुरा में 92 करोड़ की इग फैक्ट्री पकड़ी गई।
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राजधानी एक्सप्रेस से 24 करोड़ का विदेशी गांजा बरामद किया गया।
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भोपाल रेलवे स्टेशन से 4 करोड़ की कोकीन बरामद हुई।
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कटारा हिल्ला थाना क्षेत्र के बगरोदा मांव में गुजरात एटीएस और एनसीबों की संयुक्त कार्रवाई में 907 किलो मेफेड्रोन पकड़ा गया। इस फैक्ट्री में रोजाना 25-30 किलो हुम्स तैयार हो रहा था।
वर्कफोर्स की भारी कमी इलाज हुआ मुश्किल
राजीव तिवारी के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नशे की लत को मानसिक रोगों की श्रेणी में रखते हुए एफ-9 से एफ-20 तक वर्गीकृत किया है। इसके बावजूद प्रदेश में आरसीआई रजिस्टर्ड मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सकों की भारी कमी है। भोपाल जैसे बड़े शहर में ही 50 हजार से अधिक युवा नष्ठे की निपल में बताए जाते हैं, लेकिन हमीदिया अस्पताल और चिरायु अस्पताल में केवल एक-एक मनोचिकित्सक का पद स्वीकृत है।
राजधानी में अयोध्या नगर स्थित सत्कामी नशा मुक्ति केंद्र में महज 15 बिस्तरों की व्यवस्था है। प्रदेश के 55 जिलों में से 19 जिलों में मनोचिकित्सकों के पद ही स्वीकृत नहीं है। टू-टिया शहरों में संसाधनों की कमी के कारण कार्यभार अत्यधिक बढ़ गया है। वहीं, नहते से ससित अधिकांश परिवार अर्थिक रूप से कमजोर है, जिनके पास निजी इलाज का खर्च उठाने की क्षमता नहीं है।राजीव तिवारी का मानना है कि सरकार को नशे के खिलाफ आगरूकता अभियान को और मजबूत करने की आवश्यकता है। स्कूलों के पाठ्यक्रम में नशे से होने वाले दुष्परिणामों पर संवाद, प्रतियोगिताएं और चर्चाएं शामिल की जानी चाहिए, ताकि युवा वर्ग को समय रहते इस जाल में फंसने से रोका जा सके।
खुले बाजार में उपलब्ध रसायन बने बड़ी चुनौती
रातीबड़ स्थित श्रीजीकेएस नशा मुक्ति केंद्र के संचालक समर्थ दंडोतिया बताते हैं कि बीते दो वर्षों में एमडीएमए जैसे सिंथेटिक ड्रग्स का प्रसार तेजी से हुआ है। हाल ही में बैतूल में एक सरपंच द्वारा इस निर्माण की फैक्ट्री लगाए जाने की खबर ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह समस्या अब ग्रामीण क्षेत्रों तक गहराई से फैल चुकी है।समर्थ दंडोतिया का कहना है कि नारकोटिक्स विभाग द्वारा प्रतिबंधित कई रसायन, जो केवल दवा फैक्ट्रियों में उपयोग होने चाहिए, खुले बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं। यदि कोई दवा फैक्ट्री बंद है, तो उसके लिए आवंटित स्तावन किन माध्यमों से अवैध रूप से बाजार में पहुंच रहे है इसकी जांच जरूरी है। उनका स्पष्ट कहना है कि यदि रसायनों की आपूर्ति पर सख्त नियंत्रण हो जाए, ती सिंवेटिक इग्स का निर्माण अपने आप रुक सकता है।
कभी नशे की गिरफ्त में थे, अब समाज को बचाने की मुहिम
नशा केवल व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ताने-बाने को धीरे-धीरे खोखला कर देता है। इसकी भयावहता शुरुआत में समझ नहीं आती, लेकिन जब कोई इसकी गिरफ्त में फंस जाता है तो बाहर निकलना बेहद कठिन हो जाता है। यह अनुभव साझा करते हुए राजीव तिवारी बताते हैं कि उन्होंने स्वयं नशे की उस अंधेरी दुनिया को करीब से देखा है। कभी मंत्रालय में सरकारी सेवा में पदस्थ रहे राजीव तिवारी लगभग दो दशकों तक सिंथेटिक ड्रग्स के सेवन की चपेट में रहे। परिवार ने उन्हें नशे से बाहर निकालने के लिए लंबा संघर्ष किया। उसी संघर्ष ने उन्हें समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी।
राजीव तिवारी ने रातीबह क्षेत्र में चार एकड़ भूमि पर स्वयं शुद्धि नशा मुक्ति केंद्र की स्थापना की। आज वे पिछले 12 वर्षों से पूरी तरह नशे से दूर है और नशा मुक्ति के लिए निरंतर अभियान चला रहे है। उनके इस प्रयास को सरकार ने भी सराहा है और उन्हें स्वामी विवेकानंद नशा मुक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। राजीव तिवारी बताते हैं कि पहले नशे की समस्या मुख्य रूप से शराब तक सीमित थी. लेकिन अब सिंथेटिक द्वारा जैसे एमडीएमए, चरस और अफीम ने मध्यप्रदेश में गंभीर संकट पैदा कर दिया है। यह नशा अब केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण अंचलों में भी तेजी से अपनी पकड़ बना चुका है। इसके बावजूद सरकार और प्रशासन की ओर से इस समस्या को लेकर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई दे रही है।
स्थानीय पुलिस बनाम केंद्रीय एजेंसियां
भौपाल में सामने आई बड़ी ड्रग फैक्ट्रियों का खुलासा अधिकतर एनसीबी, डीआरआई और गुजरात पटीएस जैसी केंद्रीय एजेंसियों ने किया। स्थानीय पुलिस की भूमिका छोटे पैडलरों तक सीमित रहने से व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
सिर्फ पुलिस नहीं, समाज की भी जिम्मेदारी
बार-बार हो रही बड़ी बरामदगियों से यह साफ है कि जितना नशा पकड़ा जा रहा है, उससे कहीं ज्यादा खप भी रहा है। भोपाल अब सिर्फ झीलों की नगरी नहीं, बल्कि नशे का नया हॉटस्पॉट बनता जा रहा है। इस संकट से निपटने के लिए पुलिस कार्रवाई के साथ-साथ समाज, परिवार, शिक्षण संस्थानों और प्रशासन को भी समान रूप से सक्रिय होना होगा, अन्यथा आने वाले वर्षों में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है।
50-100 में मिल रही पुड़िया
16 क्विंटल गांजे की खपत
बस्तियों में आसानी से उपलब्धता
रोजाना 25-30 किलो ड्रग्स तैयार
नशा कारोबार का बहुस्तरीय मॉडल
भोपाल में नशे का कारोबार चरणबद्ध और अलग-अलग स्तरों पर संचालित होता है। सबसे निचले स्तर पर गांजा और नाइट्राचेट जैसी सस्ती नशीली चीजें बेची जाती हैं, जिनकी खपत गरीब बस्तियों और छात्रों में अधिक है। इसके ऊपर एमडी (मॅफेड्रोन), एक्स्टसी, एलएसडी और अन्य केमिकल इग्स का सीमित लेकिन बेहद खतरनाक नेटवर्क सक्रिय है पुलिस के अघोषित आंकड़ों के मुताबिक राजधानी में हर साल 16 किंटाल से अधिक गांजे की खपत होती है। यह गांजा न सिर्फ शहर में बल्कि आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी डंग पैडलरों के जरिए पहुंचता है।
कॉलेज और हॉस्टल बने आसान बाजार
जांच में सामने आया है कि भोपाल में नशे का सबसे बड़ा टारगेट कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पड़ने वाले छात्र हैं। निजी विश्वविद्यालयों के छात्र छत्राएं खास निशाने पर सहते हैं। ड्रग पैडलर हॉस्टलों और किराए के कमरी तक पहुंच बनाकर पुड़िया सिस्टम से माल खपाते है। 50 से 100 रुपये में मिलने वाली पुड़िया युवाओं के लिए सुलभ है। गोविंदपुरा, पिपलानी, गांधी नगर, निशातपुरा, कोलार रोड, बागसेवनिया और एमपी नगर जैसे इलाकों में हॉस्टल अधिका होने के कारण यहां सप्लाई नेटवर्क ज्यादा मजबूत है। पुलिस के अनुसार कई सात्र नींद से बचने, लंबे समय तक पड़ई करने या मानसिक तनाव से राहत पाने के लिए गांजा पीना शुरू करते हैं। धीरे-धीरे यही आदत लत में बदल जाती है।
सप्लाई रूटः ओडिशा से भोपाल तक
भोपाल में आने वाले अधिकांश गांजे की सप्लाई ओडिशा और तेलंगाना से होती है। पाले यह रूट बिहार और सागर जिले से होकर आता था. लेकिन लगातार कर्मचाई के बाद अब नर्मदापुरम के रास्ते सप्लाई हो रही है। छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्री में जहां गांजा या चास नहीं पहुंच पाती, वहां कच्ची शराब का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है। बैरसिया और कोलार रोड इलाके में इसका उत्पादन ज्यादा होता है, जिसमें एक विशेष जाति की महिलाएं शामिल पाई गई है।
हाईटेक और बेहद गुप्त नेटवर्क
जूम नेटवर्क अब बेहद साईटिक और विकेंद्रीकृत हो चुका है। पैडलरों को किसी एक रूट पर नहीं रखा जाता। नेटवर्क इतना बिखरा होता है कि यदि एक व्यक्ति पकड़ा भी जाता है, तो उसके पीछे मास्टरमाइंड तक पहुंचने में पुलिस को महीनों लग जाते हैं। जुल्याई 2025 में क्राइम ब्रांच ने यासिन अहमद को पकड़ने में तीन महीने का समय लगाया, जो एक कॉर्परिट घराने से जुड़ा था। इस केस में पूर्व पार्षद के बेटे, कारोबारी और विदेशी नागरिकों तक की गिरफ्तारी हुई, तब जाकर एमडी और गांजे की सप्लाई चेन टूटी।
एनडीपीएस एक्ट की बारीकियां समझ चुके हैं तस्कर
झुग्गी-बस्तियां और गरीब इलाकेः तस्करी का नया ठिकानाः
भोपाल की कई झुग्गी-बस्तियां और गरीब इलाके नशे के कारोबार की रीढ़ बन चुके है। अत्रा नगर, अयोध्या नगर बस्ती, बागमुगालिया बरखेड़ा पढ़ानी, पंचशील नगर, सतनामी नगर, गौतम नगर, छोला, हनुमानगंज, इतवारा, तलैया और निशातपुरा जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ड्रग पैडलर सक्रिय है। तलैया और निशातपुरा स्थित ईरानी डेरा को नशा सप्लाई का बड़ा केंद्र माना जाता है। इन इलाकों में कार्रवाई करना पुलिस के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। दबिश के दौरान महिलाएं आगे आकर पुलिस का विरोध करती है, कई बार पथराव तक की स्थिति बन जाती है। इसलिए यहां अक्सर कॉम्बिंग गश्त के बाद ही कार्रवाई की जाती है। तलैया इलाके में कुचबुदिया समुदाय के लोग गाजा बेचने के मामलों में अधिक सामने आए है। इसी साल पुलिस ने एक ही परिवार से 25 किलो से अधिक गांजा बरामद किया। सरला कुचबुदिया को एक साल में दो बार पकड़ा गया, जबकि उसके खिलाफ पहले भी आधा दर्जन मामले दर्ज है।

क्यों बना भोपाल तस्करों के लिए मुफीद
विशेषज्ञों के अनुसार मध्यप्रदेश राज्य के भोपाल जिले की भौगोलिक स्थिति, हाईये कनेक्टिविटी, राजस्थान-हरियाणा दिल्ली तक सीधी पहुंच, औद्योगिक क्षेत्र, चेक पोस्ट की कमी और सुनसान इलाके तस्करों के लिए अनुकूल साबित हुए हैं।उग तस्कर अब एनडीपीएस एक्ट की कानूनी पेचीदगियों को भली-भाति समझ चुके है। अधिकतर तस्कर एक किलों से कम गांजा अपने पास रखते हैं, ताकि पकड़े जाने पर आसानी से जमानत मिल सके। काइम ब्रांच ने इस साल एनडीपीएस एक्ट के तहत 49 प्रकरण दर्ज किए, जिनमें 98 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। भोपाल के चार जोन में 56 अन्य आरोपियों को गिरफ्तारी हुई। सबसे ज्यादा कार्रवाई तलैया थाना क्षेत्र में हुई।