बांग्लादेश में बीएनपी की जीत के बाद नई सरकार भारत और चीन के बीच किस रणनीति पर चलेगी? दिल्ली-ढाका रिश्तों की दिशा पर सबकी नजर
भारत के पड़ोसी बांग्लादेश में सत्ता बदल चुकी है। नए मुखिया ने बागडोर संभालने के लिए भारत की नकल करते हुए अपने पड़ोसियों के साथ ही विभिन्न देशों को शपथ ग्रहण में आमंत्रित किया। हालांकि भारत ने सधे हुए अंदाज में बांग्लादेश के नतीजों एवं बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी को बधाई और शुभकामनाएं देते हुए दोनों देशों के संबंधों को पटरी पर लाने की उम्मीद जताई है।
हालांकि भारत ने अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को बांग्लादेश भेजने का निर्णय लेकर बांग्लादेश को स्पष्ट संकेत तो दे ही दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत और चीन के बीच नई बांग्लादेश सरकार किस राह पर चलेगी? और भविष्य में उसकी रणनीति पाकिस्तान से लेकर चीन और अमेरिका तक क्या रहेगी? और इससे भी बढ़कर भारत के साथ वह कितना अनुकूल व्यवहार करने की स्थिति निर्मित करेगी। उसी पर निर्भर होगा कि बांग्लादेश में हिंसक और अराजक माहौल कितनी तेजी से बदलेगा।
बांग्लादेश में हुए चुनावों के बाद जैसे नतीजे आए हैं, उससे साफ है कि अब वहां सत्ता और सियासत का एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। दरअसल, इस क्षेत्र की भौगोलिक हकीकत यह तय करती है कि बांग्लादेश के संबंध में भारत की भूमिका निर्णायक रहेगी। बांग्लादेश की करीब 94 फीसद सीमा भारत के साथ लगी हुई है। यानी सुरक्षा और व्यापार के मामले में बांग्लादेश के लिए भारत की अनदेखी करना आसान नहीं होगा।बहुत कुछ इस पर निर्भर होगा कि मतभेद के कई बिंदुओं के बावजूद बांग्लादेश की नई सरकार भारत को लेकर क्या रुख अपनाती है। हाल के समय में बांग्लादेश में जिस तरह का तीव्र ध्रुवीकरण देखा गया, उसे संभालना और फिर से सहज माहौल बनाना वहां की नई सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
वर्ष 2024 में बांग्लादेश में जिस तरह से राजनीतिक तख्तापलट हुआ था और शेख हसीना को बांग्लादेश से भागना पड़ा था, यही नहीं, अंतरिम सरकार के मुखिया के रूप में मोहम्मद यूनुस ने बागडोर संभाली, लेकिन वे भी बांग्लादेश को हिंसा और अराजकता की आग से बाहर निकालने में असमर्थ ही रहे।ऐसे में वहां जो चुनावी नतीजे आए हैं, वे भी बहुत मायने रखते हैं। खासतौर पर इसलिए भी कि वहां कुल 300 में से बीएनपी यानी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को अकेले 209 सीटें मिली हैं। इसके बरक्स जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगियों को 77 सीटें मिली हैं, जबकि वर्ष 2024 में बांग्लादेश में हुई व्यापक उथल-पुथल के दौरान छात्र आंदोलनों से निकली एनसीपी यानी नेशनल सिटिजंस पार्टी को सिर्फ छह सीटें मिल सकी हैं।
शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया था। अब संभावना यही है कि पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे और बीएनपी के अध्यक्ष तारिक रहमान के हाथों में देश की कमान होगी। बीएनपी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत ‘बांग्लादेश सबसे पहले’ के नारे के साथ की थी।अब जबकि बीएनपी को देश के मतदाताओं ने भारी बहुमत से जिताया है, तो इसके बाद यह देखने की बात होगी कि नई सरकार अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मोर्चे पर इस नारे को किस हद तक केंद्र में रख पाती है। खासतौर पर चीन ने जिस तरह बांग्लादेश में दीर्घकालिक हित के मद्देनजर लंबी अवधि के लिए भारी निवेश किया है, उसमें नई सरकार के लिए अपने देश के हित के सवालों पर ‘सबसे पहले’ की नीति सुनिश्चित करना संवेदनशील फैसला होगा।मगर बांग्लादेश की असली परीक्षा भारत के साथ अपने संबंधों की दिशा तय करने के संदर्भ में होगी। बांग्लादेश का अस्तित्व भारत के बिना असंभव है। यह बीएनपी जितनी जल्दी स्वीकारेगी, उतना बांग्लादेश का भला होगा।