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कश्मीर पर रिर्पोटिंग और बीबीसी का काला सच

अरूण आनंद

कश्मीर पर रिर्पोटिंग और बीबीसी का काला सच

जम्मू—कश्मीर से धारा 370 हटने और राज्य के दो केंद्रशासित प्रदेशों के रूप में पुनर्गठन के बाद से विदेशी मीडिया, खासकर पश्चिमी मीडिया, द्वारा कश्मीर के हालात पर गलत रिपोर्टिंग के कई मामले सामने आए हैं। गलत जानकारी देकर माहौल को जबरन विस्फोटक बनाने वाली इस शरारतपूर्ण रिपोर्टिंग की अगुआई कर रहा है ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन(बीबीसी)।

कश्मीर पर बीबीसी की रिपोर्टिंग से साफ जाहिर है कि वह समाचार देने के बजाए अब खुद 'न्यूज़ मेकर' कर भूमिका निभा रहा है। कई भारतीय पत्रकार जो कश्मीर में जमीन पर दौरा करके आए हैं,उनका भी यही मानना है कि बीबीसी तथा विदेशी मीडिया का एक वर्ग तथ्यों को नजरअंदाज़ कर तथ्यहीन पत्रकारिता का निकृष्ट उदाहरण पेश कर रहा है। इससे कश्मीर में संवेदनशील स्थिति बिगाड़ने की उनकी मंशा साफ नजर आती है। सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तर पर बीबीसी द्वारा फैलाई गई कई 'फेक न्यूज़' का उल्लेख सार्वजनिक रूप से हो चुका है।

इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण खुलासा यह है कि बीबीसी, जिसकी निष्पक्ष छवि को कई लोग संतुलित पत्रकारिता का मानक मानते रहे हैं, वास्तव में पत्रकारिता के सारे नियम—कायदों को बहुत पहले ही थेम्स नदी में बहा चुका है। बीबीसी की असलियत खंगालने से पता चलता है कि उससे किसी भी तरहं की निष्पक्षता की उम्मीद करना स्वयं को धोखा देना होगा।

आईए बीबीसी के हालिया इतिहास पर नज़र डालते हैं और पत्रकारिता के प्रति उनके अपराधों के कुछ उदाहरण देखते हैं। सन् 2013 में ब्रिटेन के थिंक टैंक 'सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज़' ने बीबीसी की रिपोर्टिंग पर 'बायस एट द बीब' नामक विस्तृत शोध रपट जारी की थी। इसके निष्कर्ष कुछ इस प्रकार थे—बीबीसी में वामपंथियों की विचारधारा को खुला समर्थन मिलता है, वामपंथी थिंक टैंक को स्वतंत्र थिंक टैंक बताकर उनके विचारों को बीबीसी के माध्यम से निष्पक्ष विचारों का झूठा लबादा पहनाकर प्रसारित किया जाता है। ड़ा ओलिवर लाथम की इस रिपोर्ट में इससे पूर्व के भी कई अध्ययनों का जिक्र है जिन सबके निष्कर्ष भी यही थे कि बीबीसी की रिपोर्टिंग पूरी तरहं से पक्षपातपूर्ण है।

हटन रिपोर्ट: इराक में अमेरिका और ब्रिटेन के हमले के बाद ब्रिटेन में लार्ड हटन की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी का गठन किया गया था जिसने बीबीसी को पक्षपातपूर्ण व ढूठी रिपोर्टिंग के लिए पूरी तरहं से कटघरे में खड़ा कर दिया। हटन रिपोर्ट में कहा गया कि बीबीसी की संपादकीय व्यवस्था नाकारा है। इस रिपोर्ट के बाद बीबीसी के चेयरमैन गेविन डेविस और महानिदेशक ग्रेग डाइक को इस्तीफा देना पड़ा था। ईराक में परमाणु व रसायनिक हथियारों को लेकर विवादास्पद रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर एंड्रयू गिलिगन को भी बीबीसी से इस्तीफा देना पड़ा था। उस दौर में ब्रिटेन के कई अखबारों ने यह साफ लिखा था कि बीबीसी की पत्रकारिता पूरी तरहं पक्षपातपूर्ण है। मतलब यह कि जिस देश की जनता के पैसे से बीबीसी चलता है, उसी देश में उसकी छवि तार—तार हो चुकी है।

बीबीसी की फंडिंग व्यवस्था ही ऐसी है कि एक स्वतंत्र व निष्पक्ष समाचार संगठन की श्रेणी में उसे रखना संभव नहीं है। बीबीसी की फंडिंग एक मानक लाइसेंस फीस से होती है। ब्रिटेन में जो भी टीवी दशर्क लाइव प्रोग्राम टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल आदि पर देखना चाहता है यां इन्हें डाउनलोड करना चाहता है उसे एक तय लाइसेंस फीस सरकार को देनी पड़ती है जो बीबीसी के लिए बने कोष में जाती है। जरा सोचिए कि सरकारी पैसे फंडिंग वाली संस्था भला किसी भी तरहं निष्पक्ष मीडिया संस्थान की श्रेणी में कैसे आ सकती है। फंडिंग के इस पैटर्न के बाद यह समझना आसान हो जाता है कि क्यों बीबीसी की रिपोर्टिंग उन देशों में सरकारों और समाजों के खिलाफ है जो कभी ब्रिटेन के उपनिवेश थे। औपनिवेशिक मानसिकता पर आधारित बीबीसी की पत्रकारिता इस बात को सिद्ध करने की प्रयास करती है कि कभी ब्रिटेन के उपनिवेश रहे देशों में ब्रिटेन के हटने के बाद आज अराजकता का माहौल है। ये देश और समाज खुद को संभालने के काबिल नहीं हैं।

कश्मीर में बीबीसी की रिपोर्टिंग इसका ताजा उदाहरण है। इसका एक और प्रत्यक्ष उदाहरण 2015 में पेरिस में आतंकवादी हमले के दौरान सामने आया। बीबीसी के रिपोर्टर टिम विलकॉक्स ने हमले के बाद एक ट्वीट किया जिसमें उस आतंकवादी हमले को एक प्रकार से जायज़ ठहराते हुए इसका ठीकरा इजरायल पर फोड़ दिया गया। तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद विलकॉक्स ने इस ट्वीट को तो हटा दिया पर बीबीसी ने सैंकड़ों शिकायतें आने के बाद भी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और न ही इस प्रकरण के लिए खेद तक जताया।

इसी प्रकार बीबीसी ने 2015 में 'द ट्रेन दैट डिवाइड्स जेरूसलम' शीर्षक से एक डॉक्यूमेंट्री का प्रसारण किया जिसमें पक्षपातपूर्ण ढंग से इस्रायल को खलनायक के रूप में तथा फिलिस्तीनियों को पीड़ितों के रूप में प्रदर्शित किया गया। लंदर में इस्रायली दूतावास ने अधिकारिक तौर पर पर डॉक्यूमेंट्री की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

कश्मीर में भी 27 अगस्त को स्थानीय पुलिस अधिकारी इम्तियाज़ अली ने एक के बाद एक कई ट्वीट कर बीबीसी की झठी रिपोर्टिंग का खुलासा करते हुए कहा था, ''बीबीसी उर्दू की स्टोरी में रिपोर्टर ने दंगाइयों की ओर से यह दलील दी कि चूंकि एक ट्रक में सुरक्षा बलों के होने की संभावना है, इसलिए उस ट्रक के चालक को मार देना चाहिए। एक प्रबुद्ध पत्रकार द्वारा इस प्रकार एक हत्या को न्यायोचित ठहराना शर्मनाक है।..'' अफवाहों और सूत्रों के आधार पर कश्मीर से झूठी व मनगढ़ंत रिपोर्टिंग करने वाले बीबसी का यही काला सच है।

—लेखक मीडिया थिंक टैंक इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।

Updated : 13 Sep 2019 6:00 AM GMT
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