दुर्गा चालीसा का पाठ

नवरात्रि में करें दुर्गा चालीसा का पाठ, जान लीजिए इसका धार्मिक महत्व और नियम

नवरात्रि के नौ दिनों करें दुर्गा चालीसा का पाठ, घर में आएगी सुख-समृद्धि। इसलिए जान लीजिए इसके नियम....

By : सपना तंवर
नवरात्रि में करें दुर्गा चालीसा का पाठ, जान लीजिए इसका धार्मिक महत्व और नियम

19 मार्च से 27 मार्च तक चैत्र नवरात्रि के पावन दिन चल रहे हैं। इस दौरान मां दुर्गा का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है।

धार्मिक महत्व और नियम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र के दिनों में दुर्गा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के घर में सुख-समृद्धि आती है और मां दुर्गा की विशेष कृपा बनी रहती है। हालांकि, इसके पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए कुछ नियमों का पालन करना जरूरी होता है। पाठ करने वाले व्यक्ति को सात्विक जीवनशैली अपनानी चाहिए और तामसिक भोजन से दूरी बनानी चाहिए। इसके अलावा, ब्रह्मचर्य का पालन करना और मन को शुद्ध रखना भी महत्वपूर्ण माना गया है।

चलिए अब पूरी दुर्गा चालीसा जान लेते हैं।

श्री दुर्गा चालीसा

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

चौपाई

नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूँ लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरस करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लय कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुंदरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
प्रगट भई फाड़कर खंबा॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्यकशिपु को स्वर्ग पठायो॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुखदाता॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्नमस्ता भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहूँ लोक में डंका बाजत॥

शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे।
रक्तबीज संहारें सारे॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

परी गाढ़ संतों पर जब-जब।
भई सहाय मातु तुम तब-तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताको छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

शंकर आचार्य तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

आशा तृष्णा निपट सतावें।
रिपु मूरख मोहिं डरपावें॥

शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥

जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परम पद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

.....................................................समाप्त।

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