चंदेरी के जागेश्वरी माता मंदिर में महंत और बंदर की 17 साल पुरानी दोस्ती आज भी कायम है। रोज तय समय पर लौटने वाला दयाराम इंसान और बेजुबान के रिश्ते की अनोखी मिसाल बन गया है।
संजय श्रोत्रिय,अशोकनगर। जिले के ऐतिहासिक शहर चंदेरी के जागेश्वरी माता मंदिर में पिछले 17 वर्षों से एक अनोखी परंपरा बिना रुके निभाई जा रही है। मंदिर के महंत और दयाराम नाम के बंदर के बीच बना यह रिश्ता आज भी लोगों को करुणा और विश्वास का संदेश देता है। यहां मंदिर के महंत और एक बंदर के बीच बना अपनापन सिर्फ कौतूहल का विषय नहीं, बल्कि जीवों के प्रति करुणा और विश्वास की जीवंत मिसाल बन चुका है। मंदिर परिसर में हर सुबह और शाम एक बंदर तय समय पर पहुंचता है। वह अपनी खास आवाज से महंत को बुलाता है और कुछ ही देर में अपने हाथों से भोजन कराने वाला वही चेहरा उसके सामने होता है। वर्षों से चला आ रहा यह क्रम आज भी बिना रुके जारी है।
दयाराम की कहानी एक हादसे से शुरू हुई
करीब 17 साल पहले जागेश्वरी माता मंदिर में अखंड रामायण का पाठ चल रहा था। उसी दौरान एक छोटे बंदर पर बड़े बंदरों ने हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल यह बंदर मंदिर परिसर में तड़प रहा था। उस समय महंत जुगल किशोर दास ने उसका उपचार कराया और उसकी देखभाल की। स्वस्थ होने के बाद उन्होंने उसका नाम दयाराम रखा और उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह अपनाया।
हर दिन तय समय पर निभाता है अपना रिश्ता
इलाज के बाद दयाराम जंगल में लौट गया, लेकिन उसने मंदिर से अपना नाता नहीं तोड़ा। आज भी वह रोज सुबह और शाम मंदिर पहुंचता है। आंगन में पहुंचकर अपनी खास आवाज निकालता है, जिसे सुनते ही महंत बाहर आ जाते हैं। इसके बाद वे अपने हाथों से उसे भोजन कराते हैं। वर्षों से यह सिलसिला बिना किसी बदलाव के जारी है।
श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण और सीख दोनों
मंदिर आने वाले लोग जब इस दृश्य को देखते हैं तो कुछ पल वहीं ठहर जाते हैं। उनके लिए यह केवल इंसान और बंदर की दोस्ती नहीं, बल्कि विश्वास और अपनत्व का उदाहरण है। कई श्रद्धालु इसे जीवों के प्रति संवेदनशील व्यवहार का संदेश भी मानते हैं।
करुणा का रिश्ता समय के साथ और मजबूत हुआ
महंत जुगल किशोर दास का मानना है कि पशु-पक्षी स्नेह और देखभाल को पहचानते हैं। यदि उन्हें प्रेम और सुरक्षा मिले तो वे उसे जीवनभर याद रखते हैं। दयाराम और महंत के बीच बना यह रिश्ता इसी विश्वास को मजबूत करता है और बताता है कि अपनापन केवल शब्दों से नहीं, व्यवहार से बनता है।