भोपाल के रातापानी टाइगर रिजर्व के कैरी महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि पर हजारों श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचे।
भोपालः मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 24 किमी दूर घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसे रातापानी टाइगर रिजर्व की घाटी में स्थित ‘कैरी के महादेव’ मंदिर में महाशिवरात्रि पर आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। बाघों की दहाड़ वाले इलाके में भी श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं पड़ा। मोटरसाइकिल, ट्रैक्टर और कारों से लोग पहुंचे, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं की रही।
साल में सिर्फ दो दिन खुलता है जंगल का रास्ता
यह मंदिर अभयारण्य क्षेत्र में होने के कारण आम दिनों में यहां प्रवेश प्रतिबंधित रहता है। वन विभाग साल में केवल दो अवसर जो कि महाशिवरात्रि और भूतड़ी अमावस्या है जिस पर ही आम श्रद्धालुओं को आने की अनुमति देता है। बाकी समय यहां सिर्फ वन सफारी के जरिए पहुंचा जा सकता है, जिसके लिए छह लोगों का करीब 4300 रुपये शुल्क तय है। बिना अनुमति प्रवेश पर सख्त जुर्माना और जेल तक का प्रावधान है।
संतान सुख की कामना लेकर पहुंचती हैं महिलाएं
मंदिर के महंत हरिगिरि महाराज बताते हैं कि यहां बहने वाली जलधारा को ‘महादेव की जटाएं’ माना जाता है। विशाल और करीब 200 साल पुराने कैरी (आम) के पेड़ की जड़ों से निकलने वाली यह धारा बारहों महीने बहती रहती है। मान्यता है कि इसकी छींटें पड़ने से संतान सुख, रोगों से राहत और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यही वजह है कि इन दो विशेष अवसरों पर महिलाओं की आस्था उमड़ पड़ती है।
तीन बाघों की टेरिटरी के बीच मंदिर
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, जिस स्थान पर मेला लगा, वहां एक सप्ताह पहले ही बाघ ने गाय का शिकार किया था। वन रक्षकों का कहना है कि मंदिर तीन बाघों की टेरिटरी की सीमा पर स्थित है। आसपास भालू, तेंदुआ, चीतल, नीलगाय और लकड़बग्गा जैसे वन्यजीव भी देखे जाते हैं। आस्था और वन्यजीवन का यह संगम इसे और भी विशिष्ट बना देता है।
28 वर्षों से साधना में लीन महंत
पिछले 28 सालों से हरिगिरि महाराज यहां पूजा-अर्चना कर रहे हैं। 2009 में धर्मगिरि महाराज के देवलोक गमन के बाद उन्होंने सेवा संभाली। वे मंदिर परिसर की खुली गुफा में अकेले रहते हैं। आसपास के ग्रामीण भोजन की व्यवस्था कर देते हैं। घाटी में पानी की कभी कमी नहीं होती।
100 साल पुरानी मेले की परंपरा
शिव शक्ति केरी महादेव सेवा समिति के आयोजक चंदरसिंह भल्लावी के अनुसार, यहां करीब 100 वर्षों से साल में दो बार मेला लगता आ रहा है। पहले पूर्वज आयोजन करते थे, अब समिति यह जिम्मेदारी निभा रही है। समिति ने मंदिर तक सीढ़ियां, पानी और बिजली जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई है।
घने जंगल, पहाड़ियां और प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए विश्वास का केंद्र बन चुका है। बाघों की मौजूदगी के बीच भी यहां उमड़ती आस्था हर साल हजारों लोगों को आकर्षित करती है।