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Rajbali Yadav death anniversary

Rajbali Yadav Death Anniversary: अंग्रेजों और सामन्तों से आजीवन जूझते रहे राजबली यादव

अगस्त क्रांति भी उन्ही में से एक है जिसकी चर्चा राजबली यादव के बिना पूर्वांचल और अवध में अधूरी समझी जाती है। आजादी की लड़ाई में इस सपूत की अहम भूमिका रही।


rajbali yadav death anniversary अंग्रेजों और सामन्तों से आजीवन जूझते रहे राजबली यादव

Rajbali Yadav Death Anniversary: अंग्रेजों और सामन्तों से आजीवन जूझते रहे राजबली यादव |

डॉ.घनश्याम भारतीय, अंबेडकरनगर: अग्रेंजो की गुलामी के गहन गहवर से मुक्ति दिलाने के लिए तमाम वीर सपूतों ने समय समय पर क्रांति का विगुल फूंका। अगस्त क्रांति भी उन्ही में से एक है जिसकी चर्चा राजबली यादव के बिना पूर्वांचल और अवध में अधूरी समझी जाती है। आजादी की लड़ाई में इस सपूत की अहम भूमिका रही। बाद में सक्रिय राजनीति में दखल देकर लोकतांत्रिक संघर्ष की बदौलत किसानों, मजदूरों व दलितों शोषितों के आदर्श बनकर सामंती ताकतों की आंखो की किरकिरी रहे इस शख्स ने आंखे भी मूंदी तो अगस्त क्रांति की वर्षगांठ पर। 9 अगस्त इस महा सपूत की पुण्यतिथि है। 

कैसे बने यादव क्रांतिकारी?

राजबली यादव का जन्म 7 नवम्बर 1906 को अम्बेडकरनगर जनपद की जलालपुर तहसील के अरई गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। चूंकि इनके पिता रामहर्ष यादव एक किसान थे। कक्षा पांच में पढ ही रहे थे कि सन् 1919 में हुए जलियावाला बाग काण्ड ने इनके बाल मन को उद्वेलित कर दिया। महज तेरह वर्ष की अवस्था में इनके अंतस में हुुए क्रांति के बीजारोपण ने इन्हें क्रांतिकारी बना दिया। फिर क्या था किशोरों की टीम बनाकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाम के मन में क्रांति की भावना जगाते हुए सन् 1930 में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल होकर सक्रिय क्रांतिकारी बन गये। फिर उन्होने कभी पीछे मुडकर नही देखा।

1930 में पहली बार गए जेल

अंग्रेजो के विरूद्ध तत्समय के किसी भी आन्दोलन में वे हमेशा आगे रहे। सन् 1930 में पहली बार जेल जाने के बाद जेल की दहशत भी समाप्त हो गयी। सन् 1931 के व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन से लेकर सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन तक सभी में राजबली यादव ने बढ चढकर हिस्सा लिया। इस दौरान उनकी जेल यात्राओं का क्रम थमा नहीं और प्रदेश की विभिन्न जेलों की दर्जनों बार यात्राएं की। इस दौरान ब्रितानी हुुक्मरानों द्वारा दी गयी कठोर यातनाओ और ढाये गये जुल्मों सितम का न सिर्फ डटकर मुकाबला किया बल्कि आजादी के तराने गाते हुए तिरंगे की शान बढ़ाया। जेलों मे तनहाई की सजा के दौरान फिरंगियों के कोडे से इनका बदन तमाम बार लहूलुहान हुआ मगर मन विचलित नही हुआ। साहस और आत्मबल की बदौलत फैजाबाद, हरदोई, जौनपुर, लखनऊ और उन्नाव जेलों की मजबूत दीवारें भी उन्हें ज्यादा दिनो तक कैद न रख सकी। 

जिन्दा या मुर्दा पकड़ने का हुआ था फरमान जारी

तत्कालीन फैजाबाद जनपद के पूर्वाचल में स्थित राजेसुल्तानपुर की बाग में जनसभा के दौरान भारतीय नागरिकों पर जुल्म ढाने वाले दरोगा को मारने और गाजे बाजे के साथ उसका शव सरयू में प्रवाहित करने जैसे साहसिक कार्य में क्रांतिकारी बसुधा सिंह के साथ राजबली यादव प्रमुख रूप से शामिल रहे। राजेसुल्तानपुर थाने पर लगे यूनियन जैक को फाडने और तिरंगा फहराने के जुर्म में तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत ने श्री यादव को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने का फरमान जारी करते हुए इन पर इनाम भी घोषित किया था। मगर वे पुलिस की पकड से दूर रहे। इस दौरान उनके घर की कुर्की कर परिजनों को भी प्रताडित किया गया। 

जेल में गद्य व पद्य साहित्य का किया सृजन

क्रांतिकारी पक्ष की ही तरह इनका सृजनात्मक पक्ष भी मजबूत रहा है। सामंतशाही के उत्पीड़नात्मक रवैये तथा भारतीय नागरिकों की लाचारी को आधार बनाकर श्री यादव ने जेल में रहते हुए गद्य व पद्य साहित्य का सृजन भी किया। जिसमें कमजोरों को ताकत देने वाले शब्दों का प्रयोग किया गया है। जेल की त्रासदी भरे जीवन काल में राजबली यादव ने अवधी व भोजपुरी मिश्रित बोली में ‘‘धरती हमारी है‘‘ नाटक लिखा जो आगे चलकर जनजागरण का हथियार बना।

नाटक मंडली बनाकर शुरू किया जनान्दोलन

संघर्षो के इसी कड़ी में 15 अगस्त 1947 को आजादी की किरण फूटने के बाद कई वर्षो तक किसानो और मजदूरों के हक में देखा गया सपना जब साकार होता न दिखा तो राजबली यादव ने सामंतशाही के विरूद्ध दूसरा जनान्दोलन नाटक मंडली बनाकर शुरू किया। तत्समय चल रही चकबंदी प्रक्रिया में सामंतवादी शक्तियों के दबाव मे किसानो व मजदूरों की उपेक्षा के खिलाफ जनान्दोलन चलाते हुए श्री यादव ने कम्युनिष्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण किया और बिना पैसा लिए उत्तर प्रदेश के तमाम गांवो समेत देशभर में धरती हमारी हैं नाटक का मंचन कर लोगों को जगाया। उनके इस चर्चित नाटक के दौरान सामंती ताकतों ने अनेकों बार उन पर कातिलाना हमला  किया। अनेकों बार फर्जी मुकदमों में फसाकर सामंतवादियों ने उनकी आवाज दबाने का भरसक प्रयास किया। फिर भी इस क्रांतिबीर की क्रांति यात्रा अनवरत जारी रही। 

विधायक भी रहे राजबली यादव

समय के साथ हर गरीब की आवाज बन चुके राजबली यादव सन् 1967 के आम चुनाव में तत्कालीन मया अमसिन विधानसभा क्षेत्र से कम्युनिष्ट पार्टी के टिकट पर विधायक भी चुने गये। उनकी बढ़ती लोकप्रियता तथा संघर्ष शक्ति से जल उठी सामंती ताकतों ने साजिश के तहत एक मुकदमें में फसाकर सजा दिला दिया। परिणामतः उन्हें विधानसभा की सदस्यता से भी त्यागत्र देना पड़ा, लेकिन नाटक के जरिए उन्होंने जागरूकता अभियान जारी रखा और फिर कभी चुनाव नही लड़े। उनका अंतिम समय पैतृक गांव अरई में बीता। जहां 9 अगस्त 2001 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

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