अयोध्या के उर्दू बाजार में स्थित त्रेतानाथ मंदिर महीने में सिर्फ दो दिन खुलता है। 420 साल पुराना इतिहास आज भी इसकी परंपरा में ज़िंदा है
महीने में सिर्फ दो दिन खुलते हैं, अपने अंतस में ऐतिहासिक घाव समेटे त्रेतानाथ मंदिर के कपाट
रामनगरी अयोध्या के उर्दू बाजार क्षेत्र में स्थित प्राचीन त्रेतानाथ मंदिर इतिहास के घाव समेटे हुए है। चार शताब्दियों बाद भी इस मंदिर पर मुगल शासक औरंगजेब काल की स्मृतियों की छाया बनी हुई है। यही कारण है कि यह मंदिर आज भी भक्तों के लिए महीने में केवल दो बार, दोनों एकादशी के दिन ही खोला जाता है। कभी यह क्षेत्र त्रेतानाथ मोहल्ला के नाम से जाना जाता था।
उर्दू बाजार में आस्था की विरासत
मुगलकाल में हुए धार्मिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों के बाद इसका नाम उर्दू बाजार पड़ गया। इसी मोहल्ले में स्थित त्रेतानाथ मंदिर आस्था, संघर्ष और परंपरा का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर के वर्तमान पुजारी सुनील मिश्रा, जिनका परिवार सात पीढ़ियों से इस सेवा में लगा है, बताते हैं कि यह मंदिर 500 वर्ष से भी अधिक पुराना है।
उनके अनुसार औरंगजेब के शासनकाल (1649 से 1707 के बीच) में इस मंदिर को तोड़ दिया गया था और आसपास तीन मस्जिदों का निर्माण कराया गया। करीब 150 वर्ष पूर्व मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ, लेकिन उस समय सुरक्षा को लेकर विशेष सावधानी बरती गई। निर्णय लिया गया कि अधिक भीड़ न जुटे, ताकि मंदिर सुरक्षित रह सके।इसी कारण भक्तों के लिए इसके कपाट महीने में केवल दो एकादशी के दिन ही खोले जाने लगे।
परंपरा ही बनी सुरक्षा कवच
सुनील मिश्रा बताते हैं, “हमारे परिवार ने हमेशा भगवान की नियमित पूजा-अर्चना की है। भले ही भक्तों के लिए मंदिर साल में कुछ ही दिन खुलता हो, लेकिन सेवा निरंतर चलती रहती है। यही हमारी आजीविका का भी आधार है।”उनका कहना है कि अब सामाजिक माहौल काफी बदल चुका है, लेकिन परंपरा का पालन आज भी पूरी निष्ठा से किया जाता है। समय के साथ मंदिर की स्थिति भी कमजोर होती जा रही है। भवन जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुका है। आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण अब तक समुचित मरम्मत नहीं हो सकी है।
त्रेतानाथ मंदिर आज भी इस बात का प्रमाण है कि अयोध्या की आत्मा संघर्षों के बीच भी जीवित रही है। सीमित दिनों के लिए खुलने वाले इसके कपाट भक्तों के लिए केवल दर्शन का अवसर नहीं, बल्कि इतिहास, धैर्य और श्रद्धा से जुड़ने का माध्यम बन जाते हैं। यह मंदिर आज भी मौन होकर उस दौर की गवाही देता है, जब आस्था को बचाने के लिए संयम और परंपरा ही सबसे बड़ा हथियार थे।