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माया की 'माया' में उलझा उत्तर प्रदेश में महागठबंधन

माया की माया में उलझा उत्तर प्रदेश में महागठबंधन
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नई दिल्ली/लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा प्लस में गठबंधन मायावती की माया में उलझा हुआ है। मायावती ना तो ना कर रही हैं, ना ही हां कर रही हैं। सपा सूत्रों का कहना है कि पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव बसपा के लिए अधिक सीटें छोड़ने को राजी हो गए हैं । वह राज्य की 80 लोकसभा सीटों में से 40 से भी कुछ अधिक सीटें छोड़ने पर हामी भरने को तैयार हैं। बसपा सुप्रीमो तक यह संदेश पहुंचा दिया गया है। उन्होंने इस पर ना नहीं किया है। इससे लगता है कि वह मान जायेंगी लेकिन अभी हामी नहीं भर रही हैं।

मायावती के इस रुख से लोक सभा चुनाव को लेकर सपा नेताओं की चिंता बढ़ती जा रही है, क्योंकि सीटों के हिसाब से तैयारी भी करनी है। अब सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके पार्टी के प्रबंधक यह महसूस करने लगे हैं कि मायावती कहीं न कहीं केंद्र सरकार और उसके सीबीआई, आयकर और ईडी से बहुत ज्यादा डरी हुई हैं, तभी वह अधिक लोकसभा सीटें बसपा को दिए जाने के बावजूद सपा से गठबंधन का ऐलान करने को राजी नहीं हो रही हैं । सपा के एक नेता का कहना है कि अखिलेश यादव ने मायावती से कहा है कि आप 80 में से 40 से कुछ अधिक सीटें ले लें, बाकी सीटों पर सपा, कांग्रेस, रालोद आपस में तालमेल करके सीटों का बंटवारा करके लड़ेंगे। सूत्रों का कहना है कि यह हुए 15 दिन से अधिक हो गया । इसके बावजूद बसपा सुप्रीमो मायावती चुप्पी साधे हुए हैं। इससे यह लगता है कि वह एक तो पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम का इंतजार कर रही है, दूसरे केन्द्र सरकार व उसकी सीबीआई तथा आयकर आदि एजेंसियों से डरी हुई हैं।

इस बारे में सपा सांसद रवि वर्मा का कहना है कि यदि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के पहले मायावती हामी भर दी होतीं, तब सपा भी उत्तर प्रदेश में रालोद और कांग्रेस के साथ अपनी सीटें शेयर करने की घोषणा कर सकती थी, जिसका प्रभाव मध्य प्रदेश और राजस्थान के लोकसभा विधानसभा चुनाव पर भी पड़ता । जनता को लगता कि देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस एकजुट होकर भाजपा को चुनौती देने के लिए तैयार हो गए हैं। विकल्प की कड़ी बनने लगी है। जो लोकसभा में और मजबूत हो सकती है लेकिन सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की तमाम कोशिश के बावजूद मायावती अभी तक अपना रुख स्पष्ट नहीं की हैं। उम्मीद है कि लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले हो जायेगा।

इस मामले में एआईसीसी सदस्य अनिल श्रीवास्तव का कहना है , 'लगता है मायावती सीबीआई और भाजपा से बहुत ज्यादा डरी हुई हैं। इसलिए वह लोकसभा चुनाव की घोषणा के पहले उ.प्र. में गठबंधन पर कुछ नहीं बोल रही हैं। जब चुनाव की घोषणा हो जाएगी और केंद्र सरकार का हाथ चुनाव आयोग के अधिकार से बंध जाएगा, तब मायावती गठबंधन के बारे में कोई लाइन ले सकती हैं। उसके बाद सपा अपनी सीटों में से कांग्रेस और रालोद को देने की घोषणा कर सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि अखिलेश यादव चाहते हैं मायावती 43 सीटों पर हामी भर दें और कह दें कि गठबंधन की घोषणा लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद की जाएगी लेकिन इस पर भी मायावती राजी नहीं हो रही है ।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के एक विश्वासपात्र का कहना है कि यदि बसपा से सपा का गठबंधन होता है तो, नहीं होता है तो, दोनों ही स्थितियों में रायबरेली व अमेठी संसदीय सीट पर कांग्रेस को सपा सहयोग करेगी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी व सोनिया गांधी या उनके परिवार का कोई प्रत्याशी होता है तो उसके विरुद्ध प्रत्याशी खड़ा नहीं करेगी। बाकी सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों के विरुद्ध सपा अपने प्रत्याशी खड़ा करेगी और कांग्रेस भी अपने प्रत्याशी खड़ा करेगी। पहले भी ऐसा हो चुका है। इसलिए यह कोई नई बात नहीं है। इधर कांग्रेस को भी लगता है कि 11 दिसम्बर को पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव परिणाम आ जाने के बाद उसकी स्थिति और बेहतर हो जानी है। इसलिए यदि उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए सपा व बसपा के साथ गठबंधन की बात है, तो वह विधानसभा चुनाव परिणाम आ जाने के बाद कांग्रेस के लाभ वाला भी हो सकता है। क्योंकि कांग्रेस का इन पांचों राज्यों में से कुछ राज्यों में सरकार बनने की संभावना है। कांग्रेस के जीतने के बाद स्थिति दूसरी होगी। उस समय बातचीत में कांग्रेस का हाथ ऊपर होगा। इसलिए सारा दारोमदार अब पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों पर है । यदि कांग्रेस दो राज्यों में जीत जाती है तो उत्तर प्रदेश व अन्य प्रदेशों में भी कांग्रेस के साथ अन्य विपक्षी दल कम सौदेबाजी करेंगे और आसानी से गठबंधन कर सकते हैं। यदि 5 राज्यों में से किसी में भी कांग्रेस नहीं आई तो अन्य विपक्षी दल कांग्रेस के साथ तालमेल करने से परहेज करेंगे, या करेंगे तो अपनी शर्तों पर।

कांग्रेस के नेताओं को लगता है कि यदि कांग्रेस दो से तीन राज्यों में जीत गई तो उत्तर प्रदेश में दलित, ब्राह्मण और मुसलमान वोट उसकी तरफ आएंगे । ऐसी स्थिति में कांग्रेस, सपा और बसपा से तालमेल करने की बात करते समय अधिक सीटें लेने पर अड़ सकती है। बसपा व सपा भी उसे सीट छोड़ सकते हैं, क्योंकि सबको पता है कि 2004 और 2009 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने किस तरह दलित, ब्राह्मण ,मुस्लिम तथा कुछ अगड़ी जातियों के वोट से अच्छी संख्या में सीटें उत्तर प्रदेश में जीती थीं। इसलिए फिलहाल जो पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनके परिणाम आने के बाद उसके आधार पर कांग्रेस की सपा, बसपा ,तृणमूल कांग्रेस, तेदेपा व अन्य विपक्षी पार्टियों के साथ तालमेल की बातचीत हो सकती है। गठबंधन की रूपरेखा स्पष्ट हो सकती है।

Updated : 2018-11-26T23:18:49+05:30
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Swadesh Digital

स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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