पश्चिम बंगाल चुनाव में मुस्लिम वोटों में बदलाव के संकेत। ओवैसी, कांग्रेस और वाम-आईएसएफ गठबंधन से ममता बनर्जी की रणनीति पर असर।
तृणमूल कांग्रेस नेता व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जिस मुस्लिम वोटों की किलेबंदी के सहारे पिछले तीन चुनाव जीतती रही हैं, इस बार वह किला दरकता दिख रहा है। पश्चिम बंगाल की 80 विधानसभा सीटों पर वामदल-आईएसएफ और हुमाऊ कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) व असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) की तरफ से की गई घेराबंदी ममता बनर्जी का तिलस्म तोड़ सकती है और वह उसी तरह सत्ता से बेदखल हो सकती हैं, जैसे उन्होंने 2011 में वामदलों को किया था।
ओवैसी और छोटे दलों की एंट्री से बढ़ी चुनौती
पश्चिम बंगाल में सियासी ध्रुवीकरण बहुत तेजी से हो रहा है। जिस मुस्लिम वोट को वामदलों से छीनकर ममता बनर्जी सत्ता पर काबिज हुई थीं, इस चुनाव में वह वोट छिटक सकता है। कारण यह है कि बंगाल चुनाव में देश के भीतर मुस्लिम समाज का बड़ा चेहरा बन चुके एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी उन्हीं सीटों पर फोकस किए हुए हैं, जहां मुस्लिम मतदाता ज्यादा हैं। मालूम हो कि बांग्लादेश सीमा से लगे मुर्शिदाबाद में 66 प्रतिशत, मालदा में 51 प्रतिशत, उत्तर दिनाजपुर में 50 प्रतिशत, बीरभूम में 38 प्रतिशत, उत्तर 24 परगना में 40 प्रतिशत, दक्षिण 24 परगना में 37 प्रतिशत, नादिया में 27 प्रतिशत और हावड़ा में 26 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं। हालिया एसआईआर में कई मतदाताओं द्वारा दस्तावेज नहीं दिए जाने के कारण नाम भी कटे हैं। ये वे क्षेत्र हैं, जहां पिछले एक दशक में मुस्लिम मतदाता 50 प्रतिशत से अधिक हो गए हैं। यदि 2021 के विधानसभा चुनाव के आंकड़े देखें, तो इन क्षेत्रों की लगभग 80 मुस्लिम बहुल सीटों में से 75 सीटें तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने जीती थीं। इनमें मुर्शिदाबाद की 22 में से 20, मालदा की 12 में से 8, उत्तर दिनाजपुर की 9 में से 7, बीरभूम की 11 में से 10 और दक्षिण 24 परगना की 31 में से 30 सीटें टीएमसी को मिली थीं।
ममता को 57 सीटें भी डरा रही
पश्चिम बंगाल चुनाव में हुमाऊ कबीर की ‘बाबरी मस्जिद फार्मूला’ और ओवैसी द्वारा मुस्लिम समाज की गोलबंदी का प्रयास काफी हद तक प्रभावी हो सकता है। इसकी वजह यह है कि ओवैसी ने बिहार के मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र में राजद के वोट बैंक में सेंध लगाकर पांच सीटें जीती थीं, वहीं महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी के मुस्लिम गढ़ को भी प्रभावित किया है। लिहाजा, बंगाल चुनाव में उनकी आक्रामक मौजूदगी से तृणमूल कांग्रेस के लिए मुस्लिम वोटों के बंटने का खतरा बढ़ गया है।यदि ओवैसी और कबीर का गठबंधन इन 80 सीटों पर असर डालने में सफल रहता है, तो ममता बनर्जी के हाथ से सत्ता निकल सकती है। ममता बनर्जी को वे 57 सीटें भी चिंता में डाल रही हैं, जहां पिछले चुनाव में जीत-हार का अंतर 8 हजार से लेकर 3 हजार वोटों तक ही सीमित था। इन सीटों पर मामूली वोटों का बदलाव भी पूरे चुनाव परिणाम को बदल सकता है। आंकड़ों के अनुसार, इन सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी रहा था, जहां टीएमसी ने 29 सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को 28 सीटें मिली थीं।
कांग्रेस भी खेल रही मुस्लिम कार्ड
कांग्रेस इस समय बंगाल में सक्रिय भूमिका में है और मुस्लिम बहुल सीटों पर खास फोकस कर रही है। वहीं वामदल-आईएसएफ गठबंधन भी मुस्लिम मतदाताओं को साधने की कोशिश में है। ऐसे में ममता बनर्जी को अंदेशा है कि यदि 5 प्रतिशत वोट भी खिसकते हैं, तो सत्ता हाथ से निकल सकती है। यानी 80 सीटों के आधार पर सत्ता में पहुंचने वाली टीएमसी के लिए इस बार अपना किला बचाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।