भारत में स्तनपान दर में बड़ी गिरावट

NFHS-6 रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: भारत में घट रही है बच्चों को केवल स्तनपान कराने की दर

NFHS-6 रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग की दर 64% से घटकर 56% रह गई है। कई बड़े राज्यों में गिरावट दर्ज की गई, जिससे विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है।

By : स्वदेश डेस्क
NFHS-6 रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: भारत में घट रही है बच्चों को केवल स्तनपान कराने की दर

भारत में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-6 (NFHS-6) के अनुसार, जन्म के बाद पहले छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाने (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग) की दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक 2019-21 में यह दर 64 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में घटकर 56 प्रतिशत रह गई।   95.6 प्रतिशत बच्चों को मां का दूध मिल रहा था, लेकिन केवल 55.8 प्रतिशत बच्चों को ही पहले छह महीने तक सिर्फ मां का दूध मिला।

कई बड़े राज्यों में दर्ज हुई तेज गिरावट

NFHS-6 के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग के मामले में उल्लेखनीय कमी आई है। उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 60 प्रतिशत से घटकर 35 प्रतिशत तक पहुंच गया। वहीं हरियाणा में 70 प्रतिशत से गिरकर 41 प्रतिशत रह गया। इन आंकड़ों ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि सभी राज्यों की तस्वीर एक जैसी नहीं है। केरल, गुजरात और पश्चिम बंगाल में मामूली सुधार दर्ज किया गया है। छत्तीसगढ़ 76 प्रतिशत के साथ इस मामले में देश में सबसे आगे रहा।

अच्छी खबर भी है, जन्म के पहले घंटे में स्तनपान बढ़ा

रिपोर्ट में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। जन्म के पहले घंटे के भीतर बच्चों को स्तनपान कराने की दर बढ़कर 50 प्रतिशत हो गई है, जो पहले 42 प्रतिशत थी। झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इस दिशा में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। विशेषज्ञों का कहना है कि नवजात शिशु को जन्म के तुरंत बाद स्तनपान कराना उसकी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

आखिर क्यों घट रही है एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग?

 स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ इसके पीछे कई कारण बताते हैं। दरअसल, सी-सेक्शन डिलीवरी के बढ़ते मामलों को एक बड़ी वजह माना जा रहा है। कई अस्पतालों में अब भी यह धारणा बनी हुई है कि ऑपरेशन के बाद मां तुरंत स्तनपान नहीं करा सकती, जबकि चिकित्सा विशेषज्ञ इसे गलत मानते हैं। इसके अलावा शिशु दूध (फॉर्मूला मिल्क) के बढ़ते प्रचार और डिजिटल मार्केटिंग ने भी नई माताओं के फैसलों को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे प्राकृतिक स्तनपान को नुकसान पहुंच रहा है।

आम परिवारों पर क्या पड़ेगा असर?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ लंबे समय से जन्म के बाद पहले छह महीने तक केवल स्तनपान की सिफारिश करते हैं। इससे बच्चों को आवश्यक पोषण, संक्रमण से सुरक्षा और बेहतर शारीरिक विकास मिलता है। ऐसे में यदि एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग की दर लगातार घटती है तो कुपोषण, संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। NFHS-6 के आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि भारत ने शिशु स्वास्थ्य के कई क्षेत्रों में प्रगति की है, लेकिन स्तनपान को लेकर जागरूकता और स्वास्थ्य प्रणाली की मदद को और मजबूत करने की जरूरत बनी हुई है।

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