आईआईटी गांधीनगर की रिसर्च में खुलासा—गंगा बेसिन तेजी से सूख रहा है, जबकि सिंधु नदी में जलस्तर बढ़ रहा, भारत की जल सुरक्षा पर खतरा
आईआईटी गांधीनगर की रिसर्चः भारत की जल सुरक्षा पर खतरा
भारत की जल सुरक्षा को लेकर एक नई और गंभीर चेतावनी सामने आई है। आईआईटी गांधीनगर की ताज़ा रिसर्च बताती है कि भारतीय उपमहाद्वीप की दो सबसे बड़ी नदी प्रणालियां, गंगा नदी और सिंधु नदी, बिल्कुल विपरीत दिशा में जा रही हैं। एक तरफ सिंधु बेसिन में पानी बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर गंगा बेसिन तेजी से सूखता जा रहा है। यह असंतुलन आने वाले वर्षों में करोड़ों लोगों के जीवन को सीधे प्रभावित कर सकता है।
चार दशकों का डेटा, चौंकाने वाले नतीजे
यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल Earth's Future में प्रकाशित हुआ है। इसमें 1980 से 2021 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 40 वर्षों में सिंधु बेसिन के जल प्रवाह में करीब 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि गंगा बेसिन के प्रवाह में लगभग 17 प्रतिशत की भारी गिरावट आई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि गंगा का इस तरह सूखना पिछले 1,300 वर्षों में सबसे तेज गिरावट मानी जा रही है।
हाई-रिजॉल्यूशन मॉडल से हुआ गहन अध्ययन
इस रिसर्च की खास बात यह है कि इसमें हाई-रिजॉल्यूशन भौतिक मॉडल का इस्तेमाल किया गया। बारिश, भूजल, नदियों के प्राकृतिक बहाव और सिंचाई के लिए की जाने वाली पंपिंग, इन सभी के आपसी संबंधों को बारीकी से परखा गया। इससे यह साफ हुआ कि सिर्फ जलवायु परिवर्तन ही नहीं, बल्कि मानवीय हस्तक्षेप भी इस संकट को गहरा कर रहा है।आईआईटी गांधीनगर के प्रोफेसर विमल मिश्रा के अनुसार, यह बदलाव सिर्फ पर्यावरणीय चिंता का विषय नहीं है, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुराने जल समझौतों पर भी दोबारा सोचने की जरूरत को दर्शाता है।
मानसून और पश्चिमी विक्षोभ की भूमिका
स्टडी में बताया गया है कि सिंधु नदी प्रणाली में पानी बढ़ने के पीछे पश्चिमी विक्षोभ और मानसून के बदलते पैटर्न की अहम भूमिका है। मुख्य सिंधु नदी के साथ-साथ उसकी पश्चिमी सहायक नदियों, झेलम और चिनाब में भी जलस्तर बढ़ा है।वहीं गंगा बेसिन की हालत इसके उलट है। रिपोर्ट बताती है कि यहां सिंचाई के लिए भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। कई इलाकों में नदियों के कुल प्रवाह का 50 से 70 प्रतिशत हिस्सा भूजल पर निर्भर है। यमुना और ऊपरी गंगा के कुछ हिस्सों में तो नदियां लगभग सूख चुकी हैं।
जल सुरक्षा पर सीधा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही रुझान जारी रहा, तो आने वाले समय में जल संकट और गहराएगा। खेती, पीने का पानी और ऊर्जा उत्पादन, तीनों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। यह रिपोर्ट एक बार फिर चेतावनी देती है कि नदियों को सिर्फ प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवित प्रणाली मानकर नीतियां बनानी होंगी।