दिल्ली दंगों के छह साल बाद हिंदू पक्ष के वकील कपिल त्यागी से खास बातचीत। 700 एफआईआर, गिरफ्तारियां और अदालतों की अहम टिप्पणियां
दिल्ली दंगों को छह साल हो चुके हैं। न्यायालय ने कई बार सुनवाई के दौरान माना है कि यह एक सुनियोजित हिंदू-विरोधी दंगा था, जिसमें निशाना केवल हिंदुओं को बनाया गया। यही नहीं, न्यायालय ने यह भी माना कि हिंदू पक्ष को जबरदस्ती झूठे मामलों में फंसाया गया।
न्यायालय ने पाया है कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। सभी के कॉल रिकॉर्ड, चैट और ट्रांसक्रिप्ट स्पेशल सेल द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत किए जा चुके हैं, जो यह साबित करते हैं कि दंगा सुनियोजित साजिश के तहत किया गया था और इसमें हिंदुओं को टारगेट बनाया गया।
इस दंगे के मास्टरमाइंड उमर खालिद, शरजिल इमाम और ताहिर हुसैन सहित अन्य लोगों के खिलाफ न्यायालय में पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक इन्हें जमानत नहीं मिल सकी है।
इस केस में 700 से अधिक एफआईआर दर्ज हुईं और 500 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं। अब तक 80 प्रतिशत हिंदू आरोपी बरी हो चुके हैं और शेष जमानत पर बाहर हैं। हिंदू पक्ष से फिलहाल कोई भी जेल में नहीं है। हिंदुओं के खिलाफ दर्ज 16 केस पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। यह बातें हिंदू पक्ष के वकील कपिल त्यागी ने स्वदेश से विशेष बातचीत में कहीं।
कुछ मामलों में सुनवाई पूरी, कुछ में अभियोजन आरोप सिद्ध नहीं कर पाया
प्रश्नः छह साल बाद आप दिल्ली दंगों के मामलों की मौजूदा स्थिति को कैसे देखते हैं?
उत्तरः इन दंगों में 700 से अधिक एफआईआर दर्ज हुईं और 500 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन समय के साथ अदालतों में कई मामलों में अभियोजन पक्ष के आरोप टिक नहीं पाए। बड़ी संख्या में आरोपी बरी हुए और कई को जमानत मिली है। अदालतों ने कुछ मामलों में गवाहियों की विश्वसनीयता और जांच की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाए हैं।
प्रश्नः क्या अदालतों ने कुछ मामलों में झूठी गवाही या कमजोर साक्ष्य की बात मानी है?
उत्तरः जी हां, कुछ मामलों में अदालतों ने कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस साक्ष्य नहीं हैं। कई आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी किया गया।
प्रश्नः ‘कोल्ड ब्लडेड मर्डर’ से जुड़े मामलों की स्थिति क्या है?
उत्तरः दंगों से जुड़े हत्या के मामलों में अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं। कुछ मामलों में सुनवाई पूरी हो चुकी है और कुछ में अभियोजन पक्ष अपने आरोप सिद्ध नहीं कर पाया। वहीं, कुछ मामले अभी भी विचाराधीन हैं।
प्रश्नः जिन लोगों पर साजिश और यूएपीए के तहत आरोप हैं, यानी शरजिल, ताहिर और उमर के केस की स्थिति क्या है?
उत्तरः कुछ प्रमुख आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं। कोर्ट ने उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत पाए हैं। अपने आदेशों में पांच बार कोर्ट ने कहा है कि दंगे की साजिश में वे सीधे तौर पर लिप्त थे। निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय तक ने जमानत याचिकाएं खारिज की हैं। अदालतें आरोपपत्र, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और साजिश से जुड़े दस्तावेजों की गहन जांच कर रही हैं।
प्रश्नः क्या आपको लगता है कि मामले में कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश हुई है?
उत्तरः अदालत में हर पक्ष को अपनी बात रखने का अधिकार है। बचाव पक्ष ने कानूनी दांव-पेच अपनाए और केस को प्रभावित करने की कोशिश की। हालांकि, हमें विश्वास है कि अंततः अदालत साक्ष्यों के आधार पर ही अंतिम फैसला देगी।
प्रश्नः मीडिया में जमानत पर अधिक चर्चा और पीड़ितों के न्याय पर कम चर्चा को आप कैसे देखते हैं?
उत्तरः यह मीडिया का अपना दृष्टिकोण है कि वह किस पहलू को प्रमुखता दे, लेकिन हमारा मानना है कि पीड़ितों को न्याय और दोषियों को सजा ही मूल विषय होना चाहिए।
प्रश्नः आगे की कानूनी दिशा क्या होगी?
उत्तरः कई मामले अभी ट्रायल के विभिन्न चरणों में हैं। कुछ में बहस पूरी होने की प्रक्रिया में है। हमें भरोसा है कि जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ेगी, तथ्य स्पष्ट होंगे और अदालतें कानून के अनुसार निर्णय देंगी।
छह साल की कानूनी यात्रा पर एक नजर
17 फरवरी 2020: उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंसा, 55 से अधिक लोगों की मौत, सैकड़ों घायल। 2020–21: 700 से अधिक एफआईआर, 500 से ज्यादा गिरफ्तारियां, कई मामलों में चार्जशीट दाखिल। 2021–23: निचली अदालतों में ट्रायल शुरू, शरजिल, ताहिर और उमर पर कुछ मामलों में आरोप तय, कुछ में बहस जारी।
झूठे गवाह और साक्ष्य के अभाव में आरोपी बरी
झूठे गवाह और साक्ष्य के अभाव में हिंदू पक्ष के कई आरोपियों को बरी किया गया। हिंसा से जुड़े कुछ मामलों में अदालतों ने जांच की गुणवत्ता और गवाहियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। हिंदू पक्ष से फिलहाल कोई भी जेल में नहीं है, कुछ बरी हो चुके हैं और कुछ जमानत पर बाहर हैं। मुस्लिम पक्ष से इस केस में कोई भी बरी नहीं हुआ है। कुछ जमानत पर बाहर हैं, जबकि कुछ अभी भी जेल में हैं।
मौजूदा स्थिति
हिंदुओं के खिलाफ ज्यादातर हत्या और दंगा मामलों के केस खत्म हो चुके हैं। हिंदू पक्ष से कोई भी अभी जेल में नहीं है। फरवरी 2020 में हुए दंगों में हिंदुओं की भूमिका नहीं पाई गई। कई केस ट्रायल के अंतिम चरण में हैं।