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चिदंबरम के बाद पटेल या वाडरा?

कार्यकर्ताओं में असमंजस के चलते छायी है मायूसी

Update: 2019-08-27 17:00 GMT

नई दिल्ली। पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी.चिदंबरम की हवालात के बाद कांग्रेस पार्टी जबर्दस्त सकते में है। पार्टी रणनीतिकारों को समझ नहीं आ रहा कि आगे की लड़ाई के लिए क्या स्टैंड लिया जाए। चिदंबरम की गिरफ्तारी के बाद यह तो तय है कि सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय का अगला निशाना कांग्रेस के दूसरे और बड़े दिग्गज नेता अहमद पटेल हैं और पटेल के बाद परिवार के दामाद राबर्ट वाड्रा। परिवार के लिए वाड्रा ही चिंता का सबसे बड़ा कारण बने हुए हैं। परिवार और पार्टी यह जान रही है कि सीबीआई अगर चिदम्बरम जैसे कानूनी घेरेबंदी वाले चिदबंरम को घसीट सकती है तब अहमद पटेल और वाड्रा किस खेत की मूली हैं? तभी कांग्रेस और परिवार ने चिदबंरम के लिए खुद को झोंकने का निर्णय किया। क्योंकि आज नहीं तो कल परिवार के सदस्य या रिश्तेदार इस कड़ी का हिस्सा हो सकते हैं।

चिदंबरम बार-बार हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत लेकर गलत फहमी जीते आ रहे थे। उन्हें लगता था कि उनकी कानूनी जमात के चलते सीबीआई की क्या मजाल जो उनके गले तक पहुंचे। लेकिन, चिदंबरम की न तो वो कानूनी जमात काम आई और न ही उनकी कोई तरकीब ही। वे गिरफ्तारी से पहले उस सियार की तरह छिपने की खोह तलाशते फिर रहे थे, जिसकी संकट के समय सौ अक्कलें किसी काम नहीं आती हैं। इसी तरह की गलत फहमी अहमद पटेल भी पाले हुए हैं। अहमद पटेल को लगता है कि गुजरात की उद्योग लाबी की निटता के चलते वे इसे ढ़ाल बना लेंगे। लेकिन कांग्रेस के जनाधार विहीन नेताओं को आज नहीं तो कल जेल जाना तय है। सीबीआई के पिटारे में अभी आगस्टा वेस्टलेंड की खरीद-फरोख्त का गवाह बंद है। यह जिन्न जिस दिन भी पिटारे से बाहर आएगा। अहमद पटेल उसी दिन घिरते नजर आने लगेंगे। वाडरा के खिलाफ ऐसे कई आरोप बताए जा रहे हैं जो उन्हें जेल ले जाने के लिए पर्याप्त हैं।

चिदंबरम, अहमद पटेल और वाड्रा कोई जन नेता नहीं हैं इससे इनकी गिरफ्तारी को लेकर भविष्य में न तो किसी जनांदोलन की उम्मीद की जा सकती है और न ही पार्टी में एकजुटता। पार्टी कार्यकर्ता अब दवी जुबां में सीबीआई और ईडी की इस कार्रवाई को सही ठहरा रहे हैं। पार्टी के कई युवा नेता दिखावे के तौर पर कितना भी सरकार का विरोध करें लेकिन अंदर ही अंदर खुशी मना रहे हैं। जनाधार विहीन नेताओं के दांत लगातार ठंडे होते नजर आ रहे हैं। तभी शशि थरूर, जयराम रमेश और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे नेता आजकल मोदी सरकार के कसीदे पढ़ते नजर आ रहे हैं।

कांग्रेस की अंदरूनी घबराहट तो स्वर्गीय राजीव गांधी के 75वें जन्मदिन के मौके पर आयोजित सम्मेलन में साफ नजर आई, जहां कार्यकर्ताओं के भारी जमावट के बावजूद प्रबंधन बंटा और मायूस नजर आया। कांग्रेस में बिखराव और भ्रष्ट नेताओं के जेल जाने के सिलिसिले में चुनावी राज्यों के कद्दावर कांग्रेसी नेता खुद तय नही कर पा रहे हैं कि वे किन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएं? बताया जा रहा है कि हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा अंत तक 370 का समर्थन करते नजर आएंगे। ताकि भाजपा को अंत तक लगता रहे कि वे कांग्रेस से बगावत करें और उसकी शरण मे आएं। लेकिन, हुड्डा ऐसा अब नहीं करने जा रहे। वे पार्टी आलाकमान के साथ किन्तु-परंतु करते रहेंगे। उन्हें भले ही प्रदेश की कमान न मिले पर कैप्टन अमरिंदर सिंह की तर्ज पर अभियान समिति की बागडोर उन्हें ही संभालनी है। सोमवार रात पार्टी आलाकमान ने झारखंड प्रदेश के लिए नया ताना-बाना बुना जरूर पर इस ताने बाने में दूरदर्शिता नजर नहीं आती। पश्चिम बंगाल में पार्टी ने भाजपा को रोकने के लिए वामपंथियों के साथ चुनावी गठबंधन की डोर आगे बढ़ा दी है। महाराष्ट में एनसीपी के साथ बात अंतिम दौर में नहीं आ पाई है। कार्यकर्ता असमंजस में है। उसे समझ नहंी आ रहा है कि संगठन किस ओर कितनी दूर चलना है? इस असमंजस की स्थिति के चलते हरियाणा में देर शाम तक एक बड़ी कांग्रेस नेत्री शारदा राठौर के भाजपा में जाने की कयासबाजी थी। शारदा दो बार वल्लभगढ़ से विधायक और संसदीय सीचव रह चुकी हैं।   

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