संघ का आनंद संघ में आए बिना असंभव

अतुल तारे अनुराग उपाध्याय

Update: 2026-01-21 04:49 GMT

भोपाल। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मुख्यमंत्री होने से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक हैं। वे कहते हैं जैसे मीठे के आनंद के लिए मिठाई खाना पड़ती है, ऐसे ही संघ के आनंद के लिए संघ में जाना पड़ेगा और जो संघ में गया, उसके जीवन में बड़ा परिवर्तन हो जाता है। उन्होंने कहा कि हम तो स्वयं सेवक हैं काम करते रहते हैं। मुख्यमंत्री निवास में भी अकेले रहते हैं, कई बार तो मुख्यमंत्री निवास भी खुली जेल जैसा लगता है।

अतिआधुनिक स्टूडियो का उद्घाटन

स्वदेश के अतिआधुनिक स्टूडियो का उद्घाटन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साक्षात्कार के साथ हुआ। इस दौरान एक स्वयंसेवक के मुख्यमंत्री बनने से लेकर विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। संघ की चर्चा में मुख्यमंत्री इतने खो गए कि समय के सारे बंधन टूट से गए।

स्टूडियो में स्वदेश को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि मुझे गर्व है कि मैं स्वदेश के स्टूडियो में पहले साक्षात्कार के लिए उपस्थित हुआ हूं। हम सबके लिए यह गर्व की बात है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष भी चल रहा है।

स्वदेश के स्टूडियो में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का साक्षात्कार

2026 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। इस विशेष अवसर पर स्वदेश डिजिटल ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से संवाद किया। लेकिन यह कोई सामान्य राजनीतिक साक्षात्कार नहीं था। यह बातचीत एक ऐसे स्वयंसेवक पर केंद्रित थी, जिसने संघ के संस्कारों से अपने जीवन की दिशा बदली और जो आज राज्य का नेतृत्व कर रहा है।

डॉ. मोहन यादव ने स्पष्ट किया कि संघ का अनुभव वही जान सकता है, जो स्वयंसेवक बनकर संघ में भाग ले। उन्होंने इसे समझाते हुए कहा, “जैसे मीठे का स्वाद लेने के लिए मिठाई खानी पड़ती है, वैसे ही संघ का आनंद जानने के लिए संघ में जाना पड़ेगा।

उन्होंने बाल्यकाल से संघ से जुड़े संस्मरण, मार्गदर्शकों का प्रभाव, विवाह की कहानी, मुख्यमंत्री बनने की चुनौतियां और संघ के आदर्शों का जीवन में प्रभाव साझा किया। यह साक्षात्कार न केवल संघ की यात्रा को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे अनुशासन, समाज सेवा और नेतृत्व के गुण जीवन को बदल सकते हैं।

स्वयंसेवक का अर्थ हमारे लिए बहुत पवित्र मार्ग

मुख्यमंत्री यादव कहते हैं कि सच में स्वयंसेवक का अर्थ हमारे लिए बहुत पवित्रता वाला एक मार्ग है। इस मार्ग पर अपेक्षा की जाती है कि व्यक्ति अनुशासन का पालन करे और समाज में स्वानुशासन, संस्कार और स्व-नियंत्रण के अद्वितीय मार्ग पर चले।

मैं इस माध्यम से वास्तव में अपने आप को धन्य मानता हूं। हर व्यक्ति के अपने घर, परिवार और व्यवस्थाओं में चलने की अनुकूलता होती है, लेकिन संघ के संस्कारों के बल पर व्यक्ति का जीवन कितना बदलता है, यह अनुभव से समझ में आता है।

मेरा विवाह भी संघ ने ही कराया

सरसंघ प्रचारक स्वर्गीय बाबा साहब नातू जी के विशेष सानिध्य और मार्गदर्शन के सवाल पर मुख्यमंत्री मोहन यादव भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि बाबा साहब के बहुत अनुभव थे। बाबा साहब के साथ दिवाकर नालू जी, जो उनके भतीजे हैं, उनके साथ भी मैंने काम किया। वे हमारे प्रदेश अध्यक्ष भी रहे।

शालिग्राम जी मेरे मार्गदर्शक रहे हैं। मेरे विवाह में भी बाबा साहब की बड़ी भूमिका रही। हम सुबह से लेकर शाम तक विद्यार्थी परिषद का काम करते थे। मैं कॉलेज जीवन के बाद राष्ट्रीय मंत्री तक पहुंचा।

जब बाबा साहब घर आते थे तो माताजी-पिताजी कहते थे कि यह दिन भर बाहर रहता है, प्रवास में ही रहता है। अब इसका विवाह कराएंगे तो कोई संघ परिवार ही देख लेना, नहीं तो इसे बड़ी मुश्किल होगी।

हमारे परिवार में सभी विवाह मालवा में ही होते थे। ऐसे में मेरे विवाह की जिम्मेदारी बाबा साहब ने ली और रीवा के संघ परिवार में मेरा विवाह करवाया। इसके बाद घरवालों ने भी कहा कि संघ में भेजने का एक कायदा है कि कार्यकर्ता का विवाह भी वही ढूंढकर कराते हैं।

बाल स्वयंसेवक से संघ यात्रा की शुरुआत

डॉ. यादव ने बताया कि मैं स्वयंसेवक के नाते संघ से जुड़ा। हमारे यहां भारतीय कर्मचारी संघ के रमेश शर्मा जी थे, जो पिछली बार तक अध्यक्ष भी रहे। बुधवार को गीता कॉलोनी में हमारी शाखा लगती थी, जिसमें मैं पहली बार बाल स्वयंसेवक के रूप में गया।

उस समय मेरी उम्र लगभग 10-11 वर्ष रही होगी। हम फुटबॉल वगैरह खेलते थे। रमेश शर्मा जी हमारे मुख्य शिक्षक थे।

एक सवाल के जवाब में डॉ. यादव ने कहा कि शाखा में शारीरिक दक्षता के लिए कसरत होती थी और सभी प्रकार के शस्त्रों को चलाना भी सिखाया जाता था। उज्जैन धार्मिक शहर है, अखाड़ा पद्धति भी रही है। मुझे इसका शौक था। मैंने दंडा और तलवार चलाना भी थोड़ा-थोड़ा सीखा।

मुख्यमंत्री निवास भी खुली जेल जैसा

लक्ष्मी पूजन और लक्ष्मी उज्जैन में

डॉ. यादव ने कहा कि दिवाली के समय सीएम हाउस खूब सजाया गया। लाइट, रंगोली सब अच्छी रही। पंडित जी बोले लक्ष्मी पूजन पर आप बैठिए। मैंने बैठ गया। उन्होंने पूछा और कौन बैठेगा?

मैंने कहा कोई नहीं। बोले आपके बेटे-बेटी, आपकी श्रीमती नहीं आएंगी? मैंने कहा वे उज्जैन में पूजन करेंगे। एक स्वयंसेवक के नाते मैं इस सरकारी व्यवस्था में उन्हें नहीं जोड़ता।

मैंने सीएम हाउस में कहा कि हमारे लिए चाहे जितनी सजावट कर दी जाए, लेकिन हमारे लिए यह खुली जेल है। हर जगह पुलिस, सिस्टम से बंधन। रात को मैं ऊपर अकेला ही सोता हूं, किसी कर्मचारी को भी नहीं रखता।

अगर रात में बिजली चमकती है और नींद खुलती है तो सिक्योरिटी वाले कहते हैं, घंटी रखी है साहब। जरूरत हो तो बजा दीजिए। मैंने कहा, जब बजाने लायक रहूंगा, तभी बजाऊंगा।

स्वयंसेवक हूं, यही आनंद है। आदत पड़ जाती है।

संघ का आनंद संघ में आए बिना असंभव

संघ में आने के बाद ही सोच का दृष्टिकोण कैसे बदलता है, यह समझ में आता है। जैसे कोई मिठाई की दुकान पर जाकर पूछे कि रबड़ी में कैसा आनंद है, लड्डू में क्या आनंद है, पेड़े में क्या आनंद है कोई ठीक से नहीं बता सकता। सब मिठा ही दिखेगा, लेकिन हर एक का अपना स्वाद होता है।

वैसे ही संघ का भी अपना आनंद है, जो स्वयंसेवक बनने के बाद ही जाना जा सकता है।

संघ की शताब्दी यात्रा ईश्वर का वरदान

डॉ. यादव कहते हैं कि संघ की यात्रा सच में भगवान की दया और ईश्वर का वरदान है। संघ डॉक्टर हेडगेवार जी की देन है। उन्होंने आजादी से पहले यह समझ लिया था कि आजादी मिलने के बाद उसे संभालने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षित लोग चाहिए।

इसलिए संघ ने देशभक्ति की मशाल को जलाए रखने के लिए हर क्षेत्र में दक्ष लोगों को खड़ा किया। अतीत के काले अंशों को समेटकर भविष्य की चुनौतियों से कैसे निपटना है, यह भाव संघ ने खड़ा किया।

संघ को किसी एक दायरे में नहीं बांधा जा सकता। “मैं पीछे रहूं, राष्ट्र आगे रहे” यह भाव संघ सिखाता है। इसकी आवश्यकता आज भी है और संतोष है कि संघ के संस्कार आज हर जगह दिखते हैं।

संघ विरोध से स्वीकार्यता तक

एक वर्ग आज भी संघ से सहमत नहीं है। इस पर डॉ. यादव कहते हैं कि संघ के प्रारंभ से ही कुछ लोगों ने विरोध किया, लेकिन धीरे-धीरे काम के बल पर धारणा बदली।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1962 के युद्ध के बाद लाल किले की परेड में संघ को आमंत्रित किया। इंदिरा गांधी ने एकात्म यात्रा का समर्थन किया। सरदार पटेल से लेकर जयप्रकाश नारायण तक, जिन्होंने संघ को समझा, उनकी सोच बदली।

अटल बिहारी वाजपेयी जी ने 24 दलों को साथ लेकर सरकार चलाई, यह संघ का स्वयंसेवक ही कर सकता है। आज 20 से अधिक दलों के साथ सरकार चल रही है। अब संघ का विरोध कहां बचा है।

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