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देश की धरोहर हैं ये महान विभूतियां 

देश की धरोहर हैं ये महान विभूतियां 
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- अनिल शर्मा

जिन महान विभूतियों ने देश के लिए बलिदान या राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पण किया हो, वे राष्ट्र की धरोहर हैं। उन्हें क्या किसी जाति, धर्म या समाज तक सीमित रखना उस महान विभूति के साथ न्याय होगा। यह फैसला उस समाज को ही करना चाहिए जिसने एक महापुरुष को सुरक्षा की बेड़ियों में कैद कर रखा है। उसके सर्वव्यापी सर्वस्पर्शी विचारों को व्यापक बनाने के बजाय किसी जाति विशेष तक सीमित कर दिया है, निश्चित रूप से उस महान विभूति की आत्मा भी कष्ट में होगी, जिसने अपने जीवित रहते राष्ट्रहित के सोच को सीमित होने की शायद कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
आजादी के बाद देश तरक्की पर है, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवागमन, विज्ञान तकनीकी सूचना के माध्यम से बेहताशा विकास हुआ है, हमारी जीवनशैली में भी काफी सुधार हुआ है, खान-पान, रहन-सहन व आधुनिक सुख सुविधाओं से विकास हुआ है। लेकिन यदि कमी आई है तो सिर्फ एक वह हमारा सोच सीमित हुआ है, हम अपने व परिवार व बचे समय में जाति की सोचते हैं वहीं राष्ट्रीय सोच सीमित हो रहा है, जो विचारणीय है। इसकी तथ्य परक बहुत बड़ी व्याख्या की जा सकती है। भारतीय सनातन धर्म व संस्कृति में विशालता है, इसका कोई भी विचार या मान्यता सीमित नहीं है। लेकिन कहीं न कहीं भावनात्मक राष्ट्रहित के विचारों का ह्रास होना शुरू हुआ है, जो भविष्य के लिए घातक सिद्ध होगा, इस पर विचार मंथन करने की नितांत आवश्यकता है। विभिन्न जाति, वर्ग, गोत्रों के समावेश से सनातन धर्म पालन करने वाले हिन्दु समाज की संरचना हुई है। जिसका परमात्मा सृष्टि रचयिता एक है, यह सभी धर्म ग्रंथ, धर्म पुराणों में भी उल्लेख है, लेकिन न जाने हमारे सोच में जातियता की विकृति बहुत तेजी से क्यों बढ़ रही है। वह किसी एक जाति वर्ग या समाज में नहीं बल्कि सभी में है, इसलिए किसी भी जाति विशेष को बुरा मानने की जरूरत नहीं है।सबसे पहले मैं उस समाज का उल्लेख करता हूं।

जिसको सम्मान दिलाने व रक्षण के लिए ईश्वर ने स्वयं धरती पर मानव अवतार लिया और उन्हें पूजनीय माना और सम्मान दिया। उसकी भूमिका सनातन धर्म में समग्र हिन्दु समाज को दिशा व मार्गदर्शन करने की है, वह कभी राजसत्ता का भूखा नहीं रहा, बल्कि राजसत्ता पर आसीन लोगों को सही राह दिखाने का काम किया है। आज इस समाज का सोच इतना सीमित क्यों हो रहा है, समाज के कतिपय लोग भगवान विष्णु के अंश अवतार भगवान परशुराम को समाज तक सीमित कर उनकी महानता व प्रभुता को क्या कम नहीं कर रहे, यह उन्हें सोचना होगा। उनके नाम का घोष सिर्फ अपने समाज का प्रतीक मानकर अपने बड़प्पन की ही क्षति कर रहे हैं। इस समाज को भी अपने विचारों को व्यापक सर्वस्पर्शी रखना होगा। ऐसे ही क्षत्रिय कुल में भी महान विभूति अवतरित हुई हैं, वर्तमान परिवेश के उदाहरण स्वरूप महाराणा प्रताप जैसे वीर भी हुए हैं, क्या वे सिर्फ क्षत्रियों के लिए गौरव की बात है। ऐसे महान व्यक्तित्व के प्रति सारे समाजों को नतमस्तक होना चाहिए, क्षत्रिय भी उनको अपने तक सीमित न करें। इसी तरह अग्रसेन जयंती व महावीर जयंती को किसी जाति धर्म तक सीमित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता है। इन सब पर हमें गहन चिंतन की जरूरत है।

हिन्दु संस्कृति में जिन्हें भगवान का अंश माना गया है, जाति संबोधन को भी गंदी राजनीति के सोच ने विवादों के घेरे में खड़ा कर दिया है। इसलिए उन्हें कमजोर शोषित वर्ग से संबोधित करना उचित होगा। इस जाति में भी भक्त रहदास जैसे महान भक्त ने जन्म लिया, उन्होंने अपनी भक्ति के माध्यम से बता दिया कि भक्ति किसी जाति समाज विशेष में नहीं बल्कि व्यक्ति में उपजती है। आज क्या भक्त रैदास सिर्फ उसी जाति के लिए श्रद्धा के पात्र सम्माननीय होना चाहिए जिसमें उन्होंने जन्म लिया। यह उचित है या अनुचित आप ही तय करें। देश के संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर को लगभग तीन दशकों से सीमित करने का सोच शुरू हुआ है, वह उस महान व्यक्ति के विचारों व योग्यता को सम्मानित करने के बजाय अपमानित करना प्रतीत होता है। बचपन में शिक्षा के पाठ्यक्रम में बाबा साहेब अम्बेडकर का जीवन परिचय पढ़ा होगा, उनके जीवन चरित्र पढ़कर चाहे वह किसी भी जाति के हों बाबा साहेब के प्रति उनकी श्रद्धा बढ़ी होगी। आज वह बालक युवा है या फिर प्रौढ़ और उसे यह समझाया जाता है कि समाज में खाई पैदा करने का काम संविधान रचयिता बाबा साहब अंबेडकर ने आरक्षण की नींव डालकर किया है, तो उसकी भावनाएं बदलती हैं। निश्चित रूप से जब संविधान का निर्माण हुआ तो उपेक्षित वर्ग सेवा में इतना रत रहा कि वह शिक्षा से दूर रहकर आर्थिक, सामाजिक मामलों में पिछड़ गया। उसे बराबरी पर लाने के लिए संविधान में आरक्षण व्यवस्था की होगी, उसका भी समय सीमित रहा होगा। लेकिन राजनीति के सत्ता में बैठे बोट के सौदागरों ने आरक्षण को ही भुना लिया, पहली सरकार बनी उसने यह लाभ खुद देने का ढिंढोरा पीटा और इस वर्ग को अपना बोट बैंक के रूप में मान लिया। यह कहां तक न्याय संगत है।


Updated : 2018-04-13T05:30:00+05:30
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