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भीष्म साहनी के बालमन की वह गौरैया

भीष्म साहनी के बालमन की वह गौरैया
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गौरैया हमारी प्राकृतिक सहचरी है। कभी वह नीम के पेड़ के नीचे फुंदकती और बिखेरे गए चावल या अनाज के दाने को चुगती। कभी प्यारी गौरैया घर की दीवार पर लगे आइने पर अपने प्रतिबिम्ब पर चोंच मारती दिख जाती है। लेकिन बदलते वक्त के साथ आज गौरैया का यह अंदाज कम दिखाई देता है। एक वक्त था जब बबूल के पेड़ पर सैकड़ों की संख्या में घोंसले लटके होते और गौरैया के साथ उसके चूजे चीं-चीं का शोर मचाते। बचपन की यादें आज भी जेहन में ताजा हैं लेकिन वक्त के साथ गौरैया एक कहानी बन गई है। हालांकि पर्यावरण के प्रति जागरूकता के चलते हाल के सालों में यह दिखाई देने लगी है। गौरैया इंसान की सच्ची दोस्त भी है और पर्यावरण संरक्षण में उसकी खास भूमिका भी है। दुनिया भर में 20 मार्च को गौरैया संरक्षण दिवस के रुप में मनाया जाता है। प्रसिद्ध उपन्यासकार भीष्म साहनी ने अपने बाल साहित्य में गौरैया पर बड़ी अच्छी कहानी लिखी है। जिसे उन्होंने गौरैया नाम दिया। हालांकि, जागरुकता की वजह से गौरैया की आमद बढ़ने लगी है। हमारे लिए यह शुभ संकेत है।

गौरैया का संरक्षण हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इंसान की भोगवादी संस्कृति ने हमें प्रकृति और उसके साहचर्य से दूर कर दिया है। विज्ञान और विकास हमारे लिए वरदान साबित हुआ है। लेकिन दूसरा पहलू कठिन चुनौती भी पेश करता है। गौरैया एक घरेलू और पालतू पक्षी है। यह इंसान और उसकी बस्ती के पास अधिक रहना पसंद करती है। पूर्वी एशिया में यह बहुतायत में पायी जाती है। यह अधिक वजनी नहीं होती है। इसका जीवन काल दो साल का होता है। आंध्र विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में गौरैया की आबादी में 60 प्रतिशत से अधिक की कमी बताई गई है। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी आफ प्रोटेक्शन आफ बर्ड्स ने इस चुलबुली और चंचल पक्षी को रेड लिस्ट में डाल दिया है। दुनिया भर में ग्रामीण और शहरी इलाकों में गौरैया की आबादी घटी है। गौरैया की घटती आबादी के पीछे मानव विकास सबसे अधिक जिम्मेदार है। गौरैया पासेराडेई परिवार की सदस्य है। लेकिन इसे वीवरपिंच परिवार का भी सदस्य माना जाता है। यह दो मील की दूरी तय करती है। गौरैया को अंग्रेजी में पासर डोमेस्टिकस के नाम से बुलाते हैं। मानव जहां-जहां गया गौरैया उसका हम सफर बन कर उसके साथ गयी। शहरी हिस्सों में इसकी छह प्रजातियां पाई जाती हैं। जिसमें हाउस स्पैरो, स्पेनिश, सिंउ स्पैरो, रसेट, डेड और टी स्पैरो शामिल हैं। यह यूरोप, एशिया के साथ अफ्रीका, न्यूजीलैंड, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका के अधिकतर हिस्सों में मिलती है।

बढ़ती आबादी के कारण जंगलों का सफाया हो रहा है। ग्रामीण इलाकों में पेड़ काटे जा रहे हैं। ग्रामीण और शहरी इलाकों में बाग-बगीचे खत्म हो रहे हैं। इसका सीधा असर इन पर दिख रहा है। गांवों में अब पक्के मकान बनाए जा रहे हैं। जिसका कारण है कि मकानों में गौरैया को अपना घोंसला बनाने के लिए सुरक्षित जगह नहीं मिल रही है। पहले गांवों में कच्चे मकान बनाए जाते थे, उसमें लड़की और दूसरी वस्तुओं का इस्तेमाल किया जाता था। कच्चे मकान गौरैया के लिए प्राकृतिक पर्यावरण और तापमान के लिहाज से अनुकूल वातावरण उपलब्ध करते थे लेकिन आधुनिक मकानों में यह सुविधा अब उपलब्ध नहीं होती है। यह पक्षी अधिक तापमान में नहीं रह सकता है। गगन चुम्बी ऊंची इमारतें और संचार क्रांति इनके लिए अभिशाप बन गयी। शहर से लेकर गांवों तक मोबाइल टावर एवं उससे निकलते रेडिएशन से इनकी जिंदगी संकट में है।

खेती-किसानी में रासायनिक उर्वरकों का बढ़ता प्रयोग बेजुबान पक्षियों और गौरैया के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से कीड़े मकोड़े भी विलुप्त हो चले हैं। जिससे गौरैयों के लिए भोजन का भी संकट खड़ा हो गया है। दूसरा बड़ा कारण मकर सक्रांति पर पतंग उत्सवों के दौरान काफी संख्या में हमारे पक्षियों की मौत हो जाती है। पतंग की डोर से उड़ने के दौरान इसकी जद में आने से पक्षियों के पंख कट जाते हैं। हवाई मार्गों की जद में आने से भी इनकी मौत हो जाती है। दूसरी तरफ बच्चों की ओर से चिड़ियों को रंग दिया जाता है। जिससे उनका पंख गीला हो जाता है और वे उड़ नहीं पाती। हिंसक पक्षी जैसे बाज इत्यादि हमला कर उन्हें मौत की नींद सुला देते हैं।

दुनिया भर में कई तरह के खास दिन हैं ठीक उसी तरह 20 मार्च का दिन भी गौरैया संरक्षण के लिए निर्धारित है। लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा की इसकी शुरूआत सबसे पहले भारत के महाराष्ट्र से हुई। गौरैया गिद्ध के बाद सबसे संकट ग्रस्त पक्षी है। दुनिया भर में प्रसिद्ध पर्यावरणविद मोहम्मद ई दिलावर नासिक से हैं और वह बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से जुड़े हैं। उन्होंने यह मुहिम 2008 से शुरू की थी। आज यह दुनिया के 50 से अधिक देशों तक पहुंच गयी है।

गौरैया के संरक्षण के लिए सरकारों की तरफ से कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखती है। हलांकि, उप्र में 20 मार्च को गौरैया संरक्षण दिवस के रुप में रखा गया है। दिलावर के विचार में गौरैया संरक्षण के लिए लकड़ी के बुरादे से छोटे-छोटे घर बनाए जाएं और उसमें खाने की सुविधा भी उपलब्ध हो। अमेरिका और अन्य विकसित देशों में पक्षियों का ब्यौरा रखा जाता है लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। पक्षियों के संरक्षण के लिए कॉमन बर्ड मॉनिटरिंग आफ इंडिया के नाम से साइट बनायी है। जिस पर आप भी पक्षियों से संबंधी जानकारी और आंकड़ा दे सकते हैं। कुछ सालों से उनकी संस्था गौरैया को संरिक्षत करने वालों को स्पैरो अवॉडर््स देती है। घरों के आसपास आधुनिक घोंसले बनाए जाएं। उसमें चिड़ियों के चुगने के लिए भोजन की सुविधा भी उपलब्ध करायी जाए। घोंसले सुरक्षित स्थान पर हों जिससे गौरैया के अंडों और चूजों को हिंसक पक्षी और जानवर शिकार न बना सकें।

विज्ञान और विकास के बढ़ते कदम ने हमारे सामने कई चुनौतियां भी खड़ी की हैं। जिससे निपटना हमारे लिए आसान नहीं है। विकास की महत्वाकांक्षी इच्छाओं ने हमारे सामने पर्यावरण की विषम स्थिति पैदा की है। जिसका असर इंसानी जीवन के अलावा पशु-पक्षियों पर साफ दिखता है। इंसान के बेहद करीब रहने वाली कई प्रजाति के पक्षी और चिड़ियां आज हमारे बीच से गायब हैं। उसी में एक है स्पैरो यानी नन्ही सी वह गौरैया। समय रहते इन विलुप्त होती प्रजाति पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब गिद्धों की तरह गौरैया भी इतिहास बन जाएगी और यह सिर्फ गूगल और किताबों में ही दिखेगी। सिर्फ सरकार के भरोसे हम इंसानी दोस्त गौरैया को नहीं बचा सकते हैं। प्रकृति प्रेमियों को अभियान चलाकर लोगों को मानव जीवन में पशु-पक्षियों के योगदान की जानकारी देनी होगी।

लेखक: स्वतंत्र पत्रकार हैं

Updated : 2018-03-20T05:30:00+05:30
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