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मुंगावली विधानसभा उपचुनाव: प्रत्याशी गौण, मुकाबला शिवराज बनाम सिंधिया

मुंगावली विधानसभा उपचुनाव: प्रत्याशी गौण, मुकाबला शिवराज बनाम सिंधिया
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कौन कहता है मुंगावली में एक उप चुनाव हो रहा है? और यह चुनाव भी मात्र 6-8 माह की विधायकी के लिए। चुनाव आयोग की बेव साइट भले ही यह कहे पर आप मुंगावली आइए और देखिए यहां हालात उप चुनाव के नहीं है। सीधा-सीधा बिगुल है कि सिंधिया या शिवराज। भैया या महाराज। प्रत्याशी गौण है, सिर्फ चेहरे हैं। मुंगावली विधानसभा में आज नारे देखें अब की बार सिंधिया सरकार यह नारा है कांगे्रस का तो भाजपा का है, चौथी बार शिवराज सरकार। इसके विपरीत महज एक या दो जगह ही पढ़ने को मिला। भाजपा प्रत्याशी बाईसाहब यादव को अपना आशीर्वाद दें, कांग्रेस प्रत्याशी विजेन्द्र सिंह यादव को अपना अमूल्य मत देकर विजयी बनाएं। पढ़कर आश्चर्य हुआ, दिमाग में सोच का कीड़ा भी बिलबिलाने लगा कि मुंगावली में तो एक विधानसभा का चुनाव हो रहा है और वह भी महज उपचुनाव, जिसकी अवधि भी साल दो साल न होकर सिर्फ छह माह है। फिर इसमें सिंधिया सरकार या शिव सरकार बनने की बात कहाँ से आ गई? इसके बाद मुंगावली पहुँचने तक 35-40 किलोमीटर के सफर के दौरान भी यह आश्चर्य छंट नहीं पाया। बाद में जब मुंगावली की गली-कूचो, चौराहों-चौपालों पर जनप्रतिनिधियों, राजनेताओं और आम नागरिकों से चुनावी चर्चा की गई तो सारा परिदृश्य स्पष्ट होकर सामने आ गया।

दरअसल मुंगावली में भलें ही एक विधानसभा का उप चुनाव हो रहा हो, किन्तु इसे हाल-फिलहाल सत्ता के सेमीफायनल के रुप में भी देखा और माना जा रहा है। खासकर कांग्रेस तो अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इसे इसी रुप में प्रचारित कर रही है। इसके साथ ही इस उपचुनाव के नतीजों को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक भविष्य से जोड़कर भी देखा जा रहा है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि उपचुनाव के नतीजे बहुत हद तक दोनों दिग्गज राजनेताओं के राजनीतिक भविष्य की दिशा और दशा भी तय करने वाले साबित होंगे। बात पहले कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की। अगर चुनाव के नतीजे कांग्रेस के पक्ष में आते है तो न सिर्फ कांग्रेस में श्री सिंधिया का कद बढ़ेगा, बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी पूर्ववर्ती ग्वालियर राजघराने के यह महाराज राजनीति के महाराज के रुप में स्थापित होने की और बढ़ जाएंगे। इसके साथ ही श्री सिंधिया के उन विरोधियों (दिग्विजय सिंह) के मुँह पर भी बहुत हद तक ताला लगेगा, जो पहले श्री सिंधिया के पिता पूर्व केन्द्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया को ग्वालियर संभाग का नेता बताते रहे है और अब यही तमगा जबरदस्ती ज्योतिरादित्य सिंधिया को पहनाने आमदा है, इतना ही नहीं, आगामी विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की ओर से श्री सिंधिया को मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी मिलने की संभावना भी काफी हद तक बढ़ जाएगी। इसके विपरीत अगर चुनाव के नतीजे कांग्रेस की उम्मीद के मुताबिक नहीं आते है तो कांग्रेस में गत विधानसभा चुनाव से चली आ रही मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी को लेकर सिर फुटव्वल और तेज होगी। साथ ही कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के अन्य उम्मीदवार सर्वश्री अजय सिंह, कमलनाथ, सुरेश पचौरी, अरुण यादव आदि, आदि हाथ धोकर नहीं, बल्कि नहा धोकर श्री सिंधिया के पीछे पड़ जाएंगे।

मुख्यमंत्री की उम्मीदवारी को लेकर अटेर से जो ताकत श्री सिंधिया ने जुटाई थी, उसे चित्रकूट जीतकर अजय सिंह ने बांट लिया है। अब श्री सिंधिया मुंगावली जीतकर फिर इस ताकत को समेटना चाहते है। दूसरी ओर अजय सिंह, कमलनाथ, सुरेश पचौरी आदि श्री सिंधिया का पत्ता काटने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेसी परंपरा बिना चेहरे के चुनाव लड़ने के नाम पर सहमत करना चाहते है। एक बात और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भलें ही खुद को मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी की दौड़ में न बताते हो, किन्तु यह अकाट्य सत्य है कि वह खुद के रहते श्री सिंधिया को उम्मीदवारी कतई नहीं मिलने देंगे और अब तो माँ नर्मदा परिक्रमा के जरिए वह अपने घिस चुके राजनीतिक अस्त्र-शस्त्रों को धार भी दे चुके है । यह इससे भी साबित होता है कि उन्होने कुछ ही समय पहले दो बातें कहीं है, पहली यह कि माँ नर्मदा की परिक्रमा के बाद वह प्रदेश में कांग्रेस की मजबूती (इसे खुद की मजबूती पढ़े) के लिए राजनीतिक यात्रा निकालेंगे और दूसरी बात यह कि मैं तो राजनेता हूँ, राजनीति ही करुंगा, पकौड़े थोड़ी बेचूंगा। इन बयानों के जरिए श्री सिंह ने अपने उन राजनीतिक विरोधियों के मुँह पर ताला लगाया है, जो माँ नर्मदा परिक्रमा को आधार बनाकर उन्हे जबरिया राजनीति से सन्यास दिलाने पर आमदा थे। कुल मिलाकर मुंगावली में श्री सिंधिया के लिए करो या मरो की स्थिति है। अब बात करें, प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तो अटेर और चित्रकूट की हार के बाद उनकी मुख्यमंत्री के रुप में कार्यशैली पर सवाल खड़े होने लगे है तो खुद श्री चौहान की व्यक्तिगत छवि भी कटघरे में आ गई है। सवाल श्री चौहान की अब तक की लोकप्रियता और नेतृत्व पर भी उठाए जाने लगे है। अगर नतीजे भाजपा की उम्मीद के मुताबिक आते है तो स्वाभाविक रुप से शिवराज सिंह चौहान का खुद का कमजोर पड़ रहा आत्मविश्वास वापस लौटेगा तो भाजपा संगठन और प्रदेश में भी उनकी स्वीकार्यता को बल मिलेगा। माना जाएगा कि उनका भैया, मामा और विकास पुरुष के रुप में प्रदेश की जनता पर जादू बरकरार है।

यानि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया, दोनों दिग्गज नेताओं के लिए मुंगावली का चुनाव काफी अहम है। यहीं कारण है कि नेताद्वय ने चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है। मुंगावली में चुनाव भाजपा-कांग्रेस, बाईसाहब-विजेन्द्र सिंह, विकास-भ्रष्टाचार का न होकर शिवराज-बनाम सिंधिया हो गया है। प्रत्याशी गौण हो गए है और मुकाबला सीधे तौर पर शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच हो रहा है। इसी के मद्देनजर दोनों नेताओं ने संगठन के साथ अपनी व्यक्तिगत पूरी ताकत भी चुनाव में झोंक दी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जहां खुद मुंगावली में आधा दर्जन से अधिक दौरे कर चुके है तो मंत्री, विधायकों की तो गिनती ही नहीं हो पा रही है। भाजपा संगठन से जुड़े दिग्गजों के साथ केन्द्रीय मंत्री भी कतार में है। इसके मद्देनजर कुंदन वाटिका (भाजपा का चुनावी आवासीय स्थल) मंत्री मंडल और प्रदेश भाजपा कार्यालय का रुप ले चुका है। इसके साथ ही मुंगावली में सौगातों की बरसात आकाशीय बारिश जैसी हुईं है। इसी तरह सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी मुंगावली में लगभग डेरा डाल रखा है तो ग्वालियर-चंबल और मालवा से जुड़े सिंधिया कांग्रेसियों की फौज मुंगावली में आई हुई है। इसके साथ ही जयविलास पैलेस तो श्री सिंधिया के दिल्ली कार्यालय का स्टाफ भी चुनाव में सक्रिय है।

कांग्रेस के दिग्गज नेताओं कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव, प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह, सांसद कमलनाथ, सांसद कांतिलाल भूरिया, सुरेश पचौरी का दमखम भी श्री सिंधिया मुंगावली में लगवा चुके है। खबर है कि इन नेताओं को फिर सिलसिलेवार मुंगावली में बुलाने की तैयारी की जा रही है। इसके मद्देनजर एसआर गार्डन ( कांग्रेस का चुनावी आवासीय स्थल) में काफी रौनक बनी हुई है। कुल मिलाकर दोनों दिग्गज नेताओं ने कोई कसर चुनाव जीतने के लिए नहीं छोड़ी है, जो थोड़ी-बहुत कसर बची भी होगी तो चुनाव के लिए शेष बचे 10-12 दिनों में वह भी पूरी कर ली जाएगी। बहरहाल दोनों दिग्गजों की इस जोर-आजमाईश के चलते 1 लाख 91 हजार 857 मतदाताओं एवं 264 मतदान केन्द्रों वाली इस मुंगावली विधानसभा का यह उपचुनाव इतना बड़ा हो चुका है कि पूरे प्रदेश की निगाहें इस पर लग गईं है, आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि देश के कुछ हिस्से भी इन दिनों मुंगावली की ओर देख रहे हो।




Updated : 2018-02-14T05:30:00+05:30
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