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भारत जैसा चिंतन पूरी दुनिया में नहीं: जैन

भारत जैसा चिंतन पूरी दुनिया में नहीं: जैन
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सेवा राष्ट्र का आधार विषय पर व्याख्यान
ग्वालियर|
भारत जैसा चिंतन पूरी दुनिया में नहीं है। भारतीय चिंतन चर-अचर सभी जीवों के कल्याण की चिंता करता है। इसे पूरी दुनिया मानती है। 12 साल पूर्व न्यूयार्क में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फें्रस में जब इस बात पर चर्चा हुई कि दुनिया को युद्ध से कैसे बचाया जा सकता है, जिसमें सभी राष्ट्रों ने एक मत से माना था कि भारतीय चिंतन ही दुनिया को युद्ध की विभीषिका से बचा सकता है और पूरी दुनिया को एक कर सकता है।

यह बात सेवा भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री राकेश जैन ने शुक्रवार को सेवा भारती ग्वालियर द्वारा नई सड़क स्थित राष्ट्रोत्थान न्यास के विवेकानंद सभागार में आयोजित ‘सेवा राष्ट्र का आधार’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में मुख्य वक्ता की आसंदी से कही। कार्यक्रम की अध्यक्षता अभिभाषक संदीप मित्तल ने की। मुख्य अतिथि के रूप में जीवाजी विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला उपस्थित थीं। इस अवसर पर मुख्य वक्ता श्री जैन ने समाज में व्याप्त छुआछूत को सामाजिक एकता में सबसे बड़ा बाधक बताते हुए कहा कि हम कंकड़-कंकड़ में शंकर की कल्पना करते हैं फिर कोई इंसान हमारे लिए अछूत कैसे हो सकता है। उन्होंने कहा कि आज भी देश की 28 प्रतिशत आबादी छुआछूत का दंश झेल रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मजबूत भारत की कल्पना करता है। इसके लिए छुआछूत को मिटाकर हमें समाज में सामाजिक समरसता का निर्माण करना होगा। मुख्य अतिथि प्रो. संगीता शुक्ला ने कहा कि किसी भी राष्ट्र का विकास तभी हो सकता है, जब उस राष्ट्र के सभी लोग राष्ट्र के नवनिर्माण के लिए आगे आएं, लेकिन आज हर व्यक्ति केवल अपनी सेवा में लगा हुआ है। उन्होंने कहा कि आज के बच्चों में राष्ट्र भक्ति का ज्वार पैदा करना सबसे कठिन काम है, लेकिन सेवा भारती जैसे संगठन अपने विभिन्न सेवा प्रकल्पों के माध्यम से बच्चों और युवाओं में यह भाव भी जगाने का काम कर रहे हैं कि यह देश हमारा है और इस देश के लिए हमें काम करना है। वह भी अपने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को इस बात के लिए प्रेरित करती हैं कि जब विवि छोड़कर जाओ तो राष्ट्र के विकास की योजना और अपने गुरुजनों की तस्वीर हमेशा अपने मन-मस्तिष्क में रखो। प्रारंभ में अतिथियों ने भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। तत्पश्चात सरला विनोद वनवासी छात्रावास के छात्रों ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। अतिथियों का स्वागत सेवा भारती के क्षेत्रीय संगठन मंत्री रामेन्द्र घुरैया, नवलकिशोर शुक्ला एवं दिनेश शर्मा ने किया।

अतिथियों का परिचय सरला विनोद वनवासी छात्रावास के सचिव विजय दीक्षित ने दिया। सेवा भारती ग्वालियर महानगर के अध्यक्ष श्रीप्रकाश लोहिया ने संगठन की सेवा गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन गिरराज दानी ने एवं आभार प्रदर्शन सेवा भारती ग्वालियर महानगर के सचिव रामनिवास गुप्ता ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विभिन्न सेवा क्षेत्रों से जुड़े स्वयंसेवक एवं प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे।

जनसंख्या वृद्धि सबसे बड़ा संकट
मुख्य वक्ता श्री जैन ने जनसंख्या वृद्धि को सबसे बड़ा संकट बताते हुए कहा कि जिनका धर्मान्तरण होता है, उनका राष्ट्रांतरण भी हो जाता है। इसके लिए उन्होंने इंडोनेशिया का उदाहरण देते हुए कहा कि धर्मान्तरण के कारण इंडोनेशिया से अलग होकर पूर्वी तिमोर एक अलग राष्ट्र बन गया। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद भारत में हिन्दुओं की जनसंख्या 30 करोड़ से बढ़कर 90 करोड़ तो मुस्लिमों की जनसंख्या तीन करोड़ से छह गुना बढ़कर 19 करोड़ और ईसाईयों की जनसंख्या 28 लाख से बढ़कर तीन करोड़ हो गई है। देश के तीन राज्य ईसाई बाहुल्य हो चुके हैं। मेघालय में ईसाइयों की जनसंख्या 70 प्रतिशत, मिजोरम में 80 प्रतिशत और मणिपुर में 90 प्रतिशत हो चुकी है। अरुणाचल में भी इनकी संख्या 35 प्रतिशत है। मिजोरम में हिन्दू पांच प्रतिशत और बौद्ध दस प्रतिशत ही बचे हैं, जिन्हें मार-मारकर त्रिपुरा की सीमा पर भेज दिया गया है।

पूरे देश में चल रहे हैं 1.77 लाख सेवा प्रकल्प
मुख्य वक्ता श्री जैन ने बताया कि सेवा भारती द्वारा देश भर में 76 हजार 814 सेवा प्रकल्प संचालित किए जा रहे हैं। इसी प्रकार विश्व हिन्दू परिषद, भारत विकास परिषद, विद्या भारती, संस्कार भारती, दीनदयाल शोध संस्थान, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, राष्ट्र सेविका समिति, वनवासी कल्याण आश्रम आदि संगठनों द्वारा देश भर में 1.77 लाख की संख्या में विभिन्न सेवा प्रकल्प चलाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सेवा का रास्ता सबसे श्रेष्ठ है। लोगों में सेवा का भाव बढ़े। सेवा भारती के प्रकल्पों से सेवित लोग भी सेवा के लिए आगे आएं और दानदाता भी सेवा का केन्द्र बिन्दु बनें तभी हमारी ‘सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे भवंतु निरामया’ की कल्पना साकार होगी।

Updated : 2018-01-20T05:30:00+05:30
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