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दुनिया चकित है भारत के सूर्य की चमक से

दुनिया चकित है भारत के सूर्य की चमक से
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हमारी सांस्कृतिक परंपरा में त्यौहारों का महत्व सबसे अधिक है, हमारी रीति रिवाजों का भी वैज्ञानिक आधार रहा है, मकर संक्रांन्ति पर्व पर हम तिल गुड़ का सेवन करते हे, गुल्ली डंडे पतंगबाजी के खेल कूद होते है, इसी दिन सूर्यनारायण दक्षिणायन से उत्तरायण होकर धनु से मकर राशि में प्रवेश करते है। इसी पर्व के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी है। महाभारत की कथा में इसी दिन भीष्म पितामाह, जिन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था, उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे। यह भी माना जाता है कि इस दिन सूर्य तिल-तिल आगे बढ़ता है। क्रांतिकारी बदलाव की शुरूआत का पर्व भी संक्रांति को कहा जा सकता है। इस पर्व के एक दिन पूर्व (12 जनवरी) को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक साथ 31 उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित कर दुनिया को चकित कर दिया। भारत के वैज्ञानिकों द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित किया जाने वाला यह 100वाँ उपलग्रह है। ये उपग्रह सुरक्षा की दुष्टि से जासूसी का काम भी करेंगे। इससे चीन पाकिस्तान भी भारत की वैज्ञानिक क्षमता और शक्ति से घबराये हुए है। इसरो के वैज्ञानिको को पूरा देश आत्मीय बधाई दे रहा है। इसरो के चेयरमैन ए.एस. किरण ने कहा है कि हमें नये वर्ष का यह तोहफा देने में खुशी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इसरो के वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए कहा कि यह देशवासियों, किसानों और मछुआरों के लिए लाभकारी होगा। इसी दिन (12 जनवरी) को यह समाचार भारत के लिए खुशी लेकर आया कि दावोस स्विटजरलैंड वर्ल्ड इकानोमिक फोरम की बैठक के पहले अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी गैलप ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दुनिया के तीन लोकप्रिय नेताओं में से एक बताया है। पचास अलग-अलग देशों में हुए सर्वे के अनुसार वैश्विक लोकप्रियता में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने अमेरिकी, रूसी, चीन के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, ब्लादीमीर पुतिन और शी. जिनपिंग को भी पीछे छोड़ दिया है।

हर भारतीय को इस समाचार से गर्व की अनुभूति होना स्वाभाविक है। इसके पूर्व विश्व की जानी मानी मेग्जिन टाइम के मुख पृष्ठ पर नरेन्द्र मोदी का चित्र प्रकाशित होना उनकी लोकप्रियता को ही दर्शाता है। वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने भी भारत को वैश्विक उभरती शक्ति माना है। इसी प्रकार सैन्य शक्ति में भी जमीन, आकाश और जल में भारत के आधुनिक हथियारों की गूंज सुनाई दे रही है। अग्नि ब्रम्होस जैसी मिसाइले दुश्मनों को काल के समान दिखाई दे रही है। यह आंकलन भी हो रहा है कि आगामी पांच वर्षों में भारत चीन को पीछे छोड़ देगा। नेतृत्व की लोकप्रियता और भारत की उभरती महाशक्ति की उपलब्धि मोदी सरकार के साढ़े तीन वर्ष के कार्यकाल में ही दर्ज हुई है। हालांकि जिनकी दृष्टि देश की बजाय केवल वोटों पर केन्द्रित होती है, उन्हें ये उपलब्धियां इसी तरह परेशान करती है, जिस तरह चीन और पाकिस्तान भारत की शक्ति से परेशान होते है। भारत की बढ़ती शक्ति का ही परिणाम है कि सुपर पावर अमेरिका ने पाकिस्तान की हर सहायता पर रोक लगा दी है। पाकिस्तान तो अब भिखारी की स्थिति से कंगाली की स्थिति में आकर बिखराव एवं टूटन की स्थिति में है। 12 जनवरी को एक और घटना की कड़ी जुड़ गई है जो लोकतांत्रिक भविष्य के लिए चिंतन और चिन्ता के सवालों का उभार पैदा करती है।

सर्वोच्च न्यायालय के चार माननीय न्यायमूर्ति जो न्याय मंदिर में बैठकर काली पट्टी बांधे न्याय की देवी के सामने प्रमाणों के आधार पर न्याय करते रहे, ऐसे न्यायमूर्त चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसफ ने मीडिया के सामने आरोप लगाया कि रोस्टर तय करना चीफ जस्टिस का विशेषाधिकार है, परम्परा इसलिए बनाई गई कि कोर्ट का काम अनुशासित तरीके से हो सके, चीफ जस्टिस ने ये मामले अपनी पसंद की बैंच को सौंपे। इसके पीछे कोई तर्क नहीं दिये गये। मेडिकल घोटाले में चीफ जस्टिस की बैंच ने चेलमेश्वर की अगुआई वाली दो सदस्यीय बेंच का निर्णय पलट दिया, इसी प्रकार चारो न्यायमूर्तियों ने चीफ जस्टिस द्वारा मेमोरेंडम आॅफ प्रोविजर पर सुनवाई छोटी बेंच को देने पर सवाल उठाया। जजों ने सीबीआई जज लोया की मूर्ति के मामले को चीफ जस्टिस के बाद चार वरिष्ठ जजो को दरकिनार कर कोर्ट नं. 10 को देने पर नाराजी बताई, जस्टिस चेलेश्वर ने अपने एक निर्णय में बोलने की आजादी कायम रखी। जस्टिस रंजन गोगाई ने जस्टिस काटजू को निजी तौर पर पेश होने को कहा था। जस्टिस मदन बी लोकुर ने अपने फैसले में धर्म को राजनीति से दूर रखने की सलाह दी थी और जस्टिस कुरियन जोसफ ने तीन तलाक को कुरान के सिद्धान्त के खिलाफ बताया था। चार सर्वोच्च न्यायालय के जजों की शिकायतें इसलिए महत्व की है कि न्यायालय के प्रमुख स्तम्भों ने पहली बार मीडिया के माध्यम से जनता के पटल पर अपनी शिकायत दर्ज की है। लोकतंत्र के चार स्तम्भ माने जाते है, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया। संवैधानिक मान्यता प्रथम तीन स्तम्भों की है, मीडिया का सरोकार जनता से है। विश्वास के प्रथम क्रमांक पर न्यायपालिका है, लेकिन यह जनविश्वास दरकने लगा तो फिर जनता का विश्वास टूट जायेगा, अविश्वसनीय व्यवस्था होने का रास्ता अराजकता की ओर जाता है, मनुष्य जब निराश हो जाता है तो उसे जो नहीं करना, वह भी करने लग जाता है। चार न्यायमूर्तियों ने आत्मा की आवाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने चिन्ता का सवाल भी दर्ज किया है। जनता की आवाज, आत्मा की आवाज के शब्द प्रयोग राजनीति में प्रचलित है, जनता की आवाज कुछ नेताओं के मुख से निकली आवाज नहीं होती। इसी तरह आत्मा की आवाज का सरोकार व्यक्ति से होता है। चार न्यायमूर्तियों की आत्मा एक ही आवाज गूंजी। इससे यह तो कहा जा सकता है कि हमारे सबसे अधिक विश्वसनीय न्यायपालिका में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया के बारे में कई सवाल उठते रहे है। अब न्यायपालिका को भी चारो वरिष्ठ जजों ने चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया। आत्मा की आवाज का रास्ता पवित्र विचार पथ पर होकर बाहर जाता है। आत्मा की आवाज हो या जनता की आवाज हो, इनको व्यक्त करने की अनुशासन की मर्यादा निर्धारित है। इस लक्ष्मण रेखा को पार करने के क्या खतरे है, इसका सबक रामायण की कथा से ले सकते है।

चार न्यायमूर्तियों की आत्मा ने जो व्यक्त किया, उसका राजनैतिक सरोकार नहीं होने के बाद भी कांग्रेस को न्यायपालिका की जड़ पर कीचड़ फेंकने का अवसर मिल गया। कांगे्रस के शहंशाह राहुल ने लोकतंत्र पर खतरे की बात कहकर इसे गंभीर मामला बताया। उन्होंने कहा कि जस्टिस लोया के मामले की जांच होना चाहिए। इस प्रतिक्रिया के बाद भाजपा भी कैसे चुप रहती। भाजपा की प्रवक्ता की ओर से कहा गया कि यह सुप्रिम कोर्ट के अंदर का मामला है और अटार्नी जनरल ने इस पर बयान भी दिया है। इस पर राजनीति नहीं होना चाहिए। हम हैरान है कि जिस कांगे्रस को लोगों ने कई बार खारिज किया, वह इसका राजनैतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। इससे वह बेनकाब हो रही है। अटार्नी जनरल के.के. वेणु गोपाल का मानना है कि इस बयानबाजी से बचा जा सकता था, मतभेद सुलझा लेंगे। जनता का मत यही हो सकता है कि इस लोकतंत्र के स्तम्भ में जो दरार हुई है उसे भरने का काम भी न्यायपालिका के अंगों का ही है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है उसमें चाहे दिग्गज वकील होंगे, लेकिन उसे न्यायपालिका के मामले में मुंहबंद रखना चाहिए। 1975 में तो कांग्रेस ने ही लोकतंत्र का गला घोटने के साथ न्यायपालिका का मुंह बंद कर जंजीरों में जकड़ दिया था।


(लेखक - वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Updated : 2018-01-16T05:30:00+05:30
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