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भारतीय पत्रकारिता की ‘चदरिया झीनी रे झीनी’.....

भारतीय पत्रकारिता की ‘चदरिया झीनी रे झीनी’.....
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-पत्रकार के रूप में एनबीटी अध्यक्ष डाॅ. बल्देवभाई शर्मा का साहित्य से उन्माद
आगरा/मधुकर चतुर्वेदी। ‘अष्ट-कमल का चरखा बनाया, पांच तत्व की पूनी। नौ-दस मास बुनन को लागे, मूरख मैली किन्ही, चदरिया झीनी रे झीनी'...भारतीय पत्रकारिता ने विश्व को भाषा की आत्मीयता और उसके सौंदर्य से जोड़ते हुए अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को नई ऊंचाईयां प्रदान की है। काल के प्रवाह में जब मानव अपने नैतिक मूल्यों और उद्देश्यों से अलग हटता दिखाई दिया, ऐसे में पत्रकारों ने सूर, कबीर, मीरा, जायसी, प्रेमचंद्र, रामचंद्र शुक्ल, पं. अटल बिहारी वाजपेयी का रूप धारण कर समाज को नई दिशा दी। शुक्रवार को जब राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष डाॅ. बल्देवभाई शर्मा कबीर के भजन ‘चदरिया झीनी रे झीनी’ का गायन कर रहे थे, तब श्रोता भारतीय पत्रकारिता के सगुण से निर्गुण और भावों से उन्मादता का साक्षात्कार कर रहे थे।
दरअसल यह कोई नई बात नहीं हैं पत्रकारिता की विधा साहित्य का ही तात्कालिक अंग है। पत्रकारिता और साहित्य का सम्मिश्रण होने पर पत्रकारिता जनसूचना ही नहीं जनशिक्षण के उद्देश्य को भी पूर्ण कर पाती है। डाॅ. भीमराव अंबेडकर विवि के जेपी सभागार में आयोजित अभिनंदन समारोह में दिए डाॅ. बल्देव भाई के संबोधन से स्पष्ट है कि पत्रकारिता ने जहां राष्ट्रीय पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, बल्कि आजादी के पश्चात उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद भारतीय साहित्य जगत को बाजारीकरण के दौर में पिछड़ने से भी बचाया। बल्देव भाई ने अपने सबोधन में कहा कि हिन्दी पत्रकारिता राष्ट्रीय चेतना, समाज जागरण का कार्य करती आयी है, पत्रकार ना हो तो क्या-क्या अनर्थ हो जो जाए।
बात भी सही है, पत्रकार समाज को बचपन, यौवन, तरूण अवस्था से लेकर जीवन जगत के कड़वे अनुभवों, सत्य के प्रति आग्रह, संवेदनशीलता, करुणा और संयमी जीवन के मूलगामी अर्थों को पाठक तक लेकर जाते हैं। ‘चादर ओढ़ शंका मत करियो, ये दो दिन तुमको दीन्हि। मूरख लोग भेद नहीं जाने, दिन-दिन मैली कीन्हि। चदरिया झीनी रे झीनी'...कबीर ने जैसा कहा पत्रकारों ने वैसा ही किया और संस्कृति को कभी मैली नहीं होने दिया। शायद इसलिए भारतीय पत्रकारिता जनसंस्करण और लोकानुभावों की पिटारी है। इनमें संसार की असारता, माया मोह की मृग-तृष्णा, कामक्रोध की क्रूरता को भली-भांति दिखाया गया है। ये सांसारिक क्लेश, दुख और आपदाओं से मुक्त कराने वाली जानकारियों का भण्डार है। इसलिए कबीर से आजतक चंदरितया झीनीं रे झीनीं......
आगरा वाराणसी में लगेगी पुस्तक प्रदर्शनी
स्वदेश से वार्ता में डाॅ. बल्देव भाई शर्मा ने जानकारी दी कि भारतीय पुस्तक न्यास नौ सितंबर को वाराणसी में संस्कृत पुस्तक मेला लगाने जा रहा है। साथ ही नवंबर में आगरा में पुस्तक मेला व प्रदर्शनी का आयोजन होगा। उन्होंने कहा कि भारतीय पुस्तक न्यास ग्रामीण क्षेत्रों में साहित्य मेल व वाहनों द्वारा पुस्तक बिक्री कर पाठकों में पुस्तकों के प्रति लगाव को भी उत्पन्न कर रहा है। उन्होंने कहा कि साहित्य की मांग बढ़ी है और आगे इस कार्य में और गति आएगी।

Updated : 2017-08-27T05:30:00+05:30
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