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भाजयुमो ने निकाली इण्डिया फस्र्ट तिरंगा यात्रा

मथुरा। भागवत शब्दमयी मूर्ति है इसमें लिखा प्रत्येक शब्द श्रीकृष्ण है, शास्त्रानुसार शब्द ही ब्रह्म है। किसी भी मानव मात्र के पास उसका अपना स्वरूप, शरीर, सम्पन्नता, वाहन आदि तो अनेक हैं, परन्तु उसके अन्दर का मन यदि श्रीकृष्ण के पादारबिन्द में नतमस्तक नहीं है, तो उसका जन्म लेना ही व्यर्थ है।

यह उद्गार श्रीकृष्ण जन्मस्थान के पवित्र मंच से श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर भागवत प्रवक्ता इन्द्रेश उपाध्याय महाराज ने व्यक्त किये। आचार्य इन्द्रेश ने कहा कि भगवत चरणानुरागी बनने के लिए जहां भी कथा हो, उसका श्रवण करने अवश्य जाना चाहिये। भगवान की मृत्यु के भय से प्राणी को मुक्ति प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भस्थ शिशु की रक्षा अपने चक्र से की, ठीक इसी तरह श्रीकृष्ण ने स्वंय साड़ी बनकर कौरवों की सभा के मध्य द्रोपदी की लाज बचायी। जन्मस्थान के पवित्र परिसर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में उपस्थित श्रद्धालु भक्तों को भक्ति के रंग में भिगोते हुये पूज्य आचार्य इन्द्रेश महाराज ने आगे बताया कि भागवत की भक्ति, ज्ञान और धर्म की गंगा में डूबकर उसका पान सदा करना ही जीवन का पथिय होना चाहिये।

कथा प्रसंग में इन्द्रेश ने अपनी रसमयी वाणी में श्रोताओं को बताया कि जब राजा परीक्षित द्वारा यह प्रश्न करने पर कि शीघ्र मरने वाले की मुक्ति का उपाय क्या है। मानो साक्षात मुक्ति शुकदेव के रूप में राजा परीक्षित की सभा में ऋषियों की साक्षी में जैसे विराजमान हुई, तभी श्रीशुकदेव ने कहा कि हे राजन, यह प्रश्न तुम्हारा अपना नहीं, अपितु यह प्रत्येक प्राणी मात्र के लिए लोक कल्याणकारी इसलिए है कि मानव मात्र की आयु केवल सात दिन है अर्थात भगवान्नाम की नाव से संसार रूपी नदी को पार कर श्रीकृष्ण चरणों में शरणागति ही उपाय है।

कथा प्रारम्भ से पूर्व आचार्य गोपेश उपाध्याय, यजमान मधुसूदन, माधवी, कनिष्का अग्रवाल ने सपरिवार व्यासपीठ पर विराजमान पूज्य आचार्य इन्द्रेश उपाध्याय का माल्यार्पण कर आशीर्वाद लिया एवं भागवत का पूजन-अर्चन विधि-विधान एवं शास्त्रोक्त विधि से की। कथा विश्राम के साथ श्रीमद्भागवत की आरती में संस्थान के सदस्य गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी, मुख्य अधिशासी अधिकारी राजीव श्रीवास्तव, आचार्य गोपेश उपाध्याय एवं यजमानगण सपरिवार सहित विशेष रूप से उपस्थित थे।

Updated : 2016-03-14T05:30:00+05:30
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