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मजदूरों का शहरों की ओर पलायन

मशीनों से हो रहे मनरेगा के काम
बहादुरपुर। मजदूरों को गांव में ही रोजगार दिलाने के लिये चल रही महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना क्षेत्र में विफल साबित हो रही है। हालांकि अधिकतर ग्राम पंचायतों में मनरेगा काम अवश्य हो रहे हैं, परंतु यह काम कागजों में मजदूरों के नाम पर और हकीकत में मशीनों द्वारा कराये जा रहे हैं। मनरेगा के काम मशीनों द्वारा होने पर मजदूरों की स्थिति और भी बदहाल हो गई हैै। हालात यह हैं कि मजदूर परिवार सहित पलायन की स्थिति में हैं। बहादुरपुर सहित अंचल भर के कई गांवों के कई परिवार पिछले महीनों में रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर पलायन कर चुके हैं। इसके पीछे जहां मनरेगा के काम मशीनों से होना बताया जा रहा है वहीं पिछले तीन वर्षों से फसलों का खराब उत्पादन भी है। वहीं मजदूरों द्वारा मनरेगा में कम मेहनताना मिलना भी इसमें रूचि नहीं होने के कारण हैं। इस योजना के तहत मजदूरों को प्रति दिन के हिसाब से 159 रुपये का भुगतान होता हैं जिसे मजदूरों के बचत बैंक खातों में भेजा जाता है। यह भुगतान भी तमाम कागजी एवं कप्यूटरीकृत कार्रवाई होने के बाद मिल पाता है। इन उलझनों के कारण जहां स्वंय मजदूर भी मनरेगा में काम करने से हिचकिचाते हैं वहीं ग्राम पंचायतों के सरपंच-सचिव भी परेशान हैं।
पलायन कर गये कई परिवार:
रोजगार की व्यवस्था नहीं होने के कारण क्षेत्र के कई परिवार हाल ही के महीनों में पलायन कर महानगरों में चले गये हैं। बहादुरपुर निवासी साबिर खान अपने परिवार के साथ इंदौर में मजदूरी कर रहे हैं, तो हैंडपंप मिस्त्री वीरसिंह लोधी भी इंदौर पहुंचकर फैक्टरियों में काम कर रहे हैं। इसी तरह ग्राम सुमेर के रणवीर सिंह बैस तो ग्राम सोपरा के राजू कटारिया। और भी न जाने कैसे इतने नाम हैं जो अन्यंत्र पहुंचकर आजीविका का पालन कर रहे हैं। वहीं क्षेत्र के सैंकड़ों युवा इन दिनों राजस्थान और गुजरात के षहरों में काम कर जीविका चला रहे हैं।
त्रिशंकु हो गईं पंचायतें:
हाल ही के वर्षों में पंचायती राज व्यवस्था में हुई सुधार सरपंचों और सचिवों के गले नहीं उतर रहे हैं। पहले जहां पंचायतों में काम एवं भुगतान में पारदर्शिता नहीं होने के कारण सरपंच-सचिव काली कमाई कर लेते हैं लेकिन तमाम सुधारों के बाद उन्हे अपेक्षित लाभ नहीं हो पा रहा है। ऐसे में मनरेगा के काम मषीनों से कराकर सरपंच-सचिव कमीषन कमाने के फेर में हैं। किंतु इसमें मजदूरों के खातों में भुगतान उनके गले की हडडी बन गया है। अवैध तरीके से किये जा रहे पंचायत के काम एवं उनके अवैध भुगतान की बंदरबांट को लेकर सरपंच, सचिव एवं रोजगार सहायकों में भी कई ग्राम पंचायतों में घमासान है। जिससे इनके झगड़े उभरकर सामने आ रहे हैं।

Updated : 2015-12-05T05:30:00+05:30
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