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मुक्ताकाशी मंच की तैयारियां अंतिम चरण में

आयोजकों ने किया निरीक्षण
झांसी। झांसी जन महोत्सव मेले का यूं तो शुभारंभ हो चुका है, लेकिन फिलहाल यह क्राफ्ट मेले तक ही सीमित है। आम जनता को मेले का पूरा शबाब देखने के लिए अभी कुछ दिनों का और इंतजार करना होगा। झांसी के ऐतिहासिक दुर्ग की प्राचीर के समीप स्थित इस मेले में उमड़ रहे जन सैलाब से जनप्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है। मेले की रंगत ही उसकी रौनक बन रही है। इस मेले की खासियत यह है कि यहां पर एक से बढ़कर एक शख्सियत सिरकत कर रही है। जो इसकी अमिट पहचान बनती जा रही हैं। देश प्रदेश के अनेक हिस्सों के शिल्पी अपने हुनर को साथ लेकर आये है जो काबिले तारीफ है।
झांसी जन महोत्सव के क्राफ्ट मेले में बुलंदशहर, सहारनपुर, भदोही, मिर्जापुर, आगरा के अलावा अन्य क्षेत्र से आये कारोबारियों की वस्तुएं आकर्षक ही नहीं, मनमोहक भी हैं। घर में सजाने के लिए बनाये गये सामान की स्टाले बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं। शीशम की लकड़ी के बने सोफों की कारीगरी लाजवाब है। सूखी हुई लकड़ी को लेकर उस पर नक्कासी करके इसकों सुंदर रूप दिया जाता है। उनका कहना है कि एक सेट को बनाने में तकरीबन 20 से 25 दिन लग जाते हैं वहीं, काफी सेट की लागत 18 हजार होती है तथा हैवीपिन सोफा की लागत 14 से लेकर 15 हजार पड़ती है। महोत्सव में चीनी मिट्टी के बर्तनों का भी कोई सानी नहीं हैं। एक से बढ़कर एक सेट महोत्सव की शोभा बढ़ा रहे हैं। एक सेट व्यक्ति के किचन के अनुकूल हैं। इसे आम व्यक्ति भी खरीद सकता है। इस बार ताज नगरी आगरा के शिल्पियों ने भी यहां आमद की है। हाथ की कलाकारी से बनाये गये सुंदर लेडीज पर्स दुकान पर महिलाओं को रुकने के लिए मजबूर कर देते हैं। महोत्सव में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर तैयार किया जा रहा मुक्ताकाशी मंच अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है। वहां पर कारीगर लगातार काम को अंजाम देने में लगे हुए हैं।
दुर्ग के समीप मुक्ताकाशी मंच की साज सज्जा को बेहतर रूप दिया जा रहा है। चारों ओर से कवर्डमंच को आकर्षक लुक दिया गया है। वहीं, दर्शक दीर्घा भी एक नये अंदाज में तैयार की जा रही है। मंच के साथ दर्शक पंडाल को इस बार ऐसा बनाया जा रहा है कि वहां बैठने वाले को किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। पंडाल इस बार बिना बांस बल्लियों के सहारे नई तकनीकी से तैयार किया जा रहा है। लोहे के मजबूत खंभों पर डिजाइनदार पीलर क्रेन के सहारे लगाये जा रहे हैं। जिससे पंडाल के अंदर एक भी खंभा नहीं लगेगा। अभी महोत्सव में बांस की बल्लियों के सहारे पंडाल बनाया जाता था। इस बार नई तकनीकी का सहारा लेकर मजबूत और सुंदर पंडाल बनाया जा रहा है।

Updated : 2015-12-22T05:30:00+05:30
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