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क्या मप्र ने लिख दी सियासत की नई इबारत ?

क्या मप्र ने लिख दी सियासत की नई इबारत ?

- ऋतुपर्ण दवे

कर्नाटक का दांव और गोवा की तोड़फोड़ का खेल खेलने के बाद भाजपा मप्र में बगावत की तैयारी में थी। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव अलग हुंकार भर रहे थे। इस बीच मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से बिना हो हल्ला और ताम-झाम के जो कर दिखाया उसने भारतीय राजनीति में सनसनी फैला दी। इससे कमलनाथ की गंभीर एवं प्रभावी छवि के साथ राजनीतिक इंजीनियरिंग की काबिलियत सामने आई। उधर, भाजपा के इनकार के बावजूद आपराधिक कानून संशोधन विधेयक पर वोटिंग की मांग पर सरकार समर्थक बसपा विधायक संजीव कुशवाहा का अड़े रहना नई राजनीतिक इबारत लिख गया। भाजपा के नहीं चाहने के बाद भी संसदीय नियम प्रक्रिया का हवाला देकर संसदीय कार्यमंत्री ने सहमति दी और शह-मात का खेल हो गया। भाजपा के दो विधायक कांग्रेस के खेमे में चले आए। सब कुछ इतना गुपचुप हुआ कि विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने फ्लोर टेस्ट की घोषणा करते हुए लॉबी में एक ओर पक्ष और दूसरी ओर विपक्ष के विधायकों को जाने को कहा। तब भी विपक्ष में बैठी भाजपा हतप्रभ थी और पता तक नहीं चल पाया कि कब उसके दो विधायक सरकार के पक्ष में वोटिंग करके सदन के बाहर चले गए। मैहर विधायक नारायण त्रिपाठी जो कभी कांग्रेस के थे और कांग्रेस से भाजपा में आए शरद कोल ने सरकार का साथ देकर संभावित 120 सदस्यों की संख्या को 122 पर पहुंचा कर सबको हैरान कर दिया। जबकि विधानसभा में स्पीकर समेत मौजूदा सरकार में कांग्रेस के 114 समेत बसपा के 2, सपा के 1 और 4 निर्दलीयों का समर्थन मिलाकर यह आंकड़ा 121 पर पहुंचता है। जबकि भाजपा के विधायकों की संख्या 108 है।

अब इसे कमलनाथ की भाजपा नेताओं के बड़बोलेपन और ऊपर के आदेश पर 24 घंटे में सरकार गिराने के चैलेन्ज का नतीजा कि सब कुछ इतने अचानक हुआ जिसमें विपक्ष तो छोड़िए, सत्ता पक्ष के तमाम विधायक भी नहीं समझ पाए कि क्या होने वाला है। निश्चित रूप से कांग्रेस ने बिना हो-हल्ला के जबरदस्त तैयारी की थी। अब आगे और भी चौंकाने वाला कुछ हो सकता है। हालांकि फ्लोर टेस्ट को लेकर बार-बार तैयार कांग्रेस सोमवार को ही चर्चा चाहती थी।

इन परिस्थितियों में कह पाना मुश्किल है कि कितने और विधायक बगावत के मूड में हैं। गौरतलब है कि बगावत की शुरुआत भाजपा के मजबूत गढ़ विंध्य से हुई। इसी बीच विंध्य में जैतपुर (शहडोल) विधायक मनीषा सिंह का खुद ही आगे बढ़कर सफाई देना कि मुझे लेकर भी अफवाह फैलाई जा रही है लेकिन मैं भाजपा में ही रहूंगी, बताता है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। मनीषा सिंह के पिता डॉ. ध्यान सिंह कांग्रेसी हैं और वो भी 2018 में विंध्य के बांधवगढ़ (उमिरया) से भाजपा के हाथों पराजित हो चुके हैं।

विंध्य से घर वापसी की स्क्रिप्ट 28 जून को दिल्ली में ही लिखी जा चुकी थी। जब शरद कोल सीधे कमलनाथ के संपर्क में थे। उधर, नारायण त्रिपाठी 2016 का उपचुनाव जीतने के बाद मंत्री नहीं बनाए जाने से खफा थे। मैहर के बारे में अंधविश्वास कहें या संयोग कहा जाता है कोई भी प्रत्याशी एक ही दल से दोबारा चुनाव नहीं जीत पाता है। नारायण त्रिपाठी खुद सबूत हैं जो अब तक दल बदल-बदल कर 2003 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते थे जबकि 2008 में भाजपा से हार गए। 2013 में फिर कांग्रेस में वापसी की और जीते। 2014 में वो भाजपा में चले गए और 2016 के उपचुनाव में 20281 मतों जीत दर्ज की तो 2018 का चुनाव भी जीता। दूसरे विधायक शरद कोल हैं जिन्होंने 2018 में कांग्रेस को 32450 मतों से हराया था। शरद कोल के पिता जुगलाल फिलहाल मप्र कांग्रेस के सचिव हैं।

विधानसभा चुनाव 2018 के बाद प्रदेश भाजपा में कई बार अन्दरूनी कलह दिखी। आकाश विजयवर्गीय का मामला हो या प्रज्ञा ठाकुर के बयानों से हुई किरकिरी की, मजबूत नियंत्रण की कमी झलकी। अलबत्ता, दो राज्यों में किला फतह करने के बाद भाजपा इस मुगालते में थी कि अब मप्र और फिर राजस्थान में भी वह सत्ता के समीकरण में आगे हो जाएगी। लेकिन कहते हैं न कि बयानबाजी या अति उत्साह में नुकसान होता है। यही हुआ भी। जहां 24 घंटे में सरकार गिराने की बातें हुईं, वहीं 4 घंटे में गुपचुप वो व्यूह रचना रच गई जिसकी सपने में भी किसी ने कल्पना नहीं की होगी। अब भाजपा को जहां आत्ममंथन की जरूरत है वहीं कांग्रेस को भी गंभीरता से जनसरोकारों पर ध्यान केन्द्रित कर आगे काम करना होगा। हां, इस घटना से यह संकेत जरूर मिला कि देश में लोकसभा और विधानसभा के मुद्दे अलग होते हैं। अब देखना है कि इसी साल महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों और दल-बदल पर बने तीन अलग सीन पर कानूनी जंग कैसी होगी और ऐसी घटनाओं का मतदाताओं पर क्या असर पड़ता है?

(लेखक पत्रकार हैं।)

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