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वर्चस्व की लड़ाई में अपना नुकसान कर बैठे सिंधिया ?

वर्चस्व की लड़ाई में अपना नुकसान कर बैठे सिंधिया ?

नई दिल्ली/भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस में एक दूसरे के किले में सेंध मारने और बर्चस्व की लड़ाई को लेकर नेताओं में मचा घमासान खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। प्रदेश के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी और कमलनाथ सरकार में मंत्री उमंग सिंघार द्वारा दिग्विजय बम फोडे जाने के बाद सिंधिया समर्थक अब मुख्यमंत्री कमलनाथ को ही निशाना बना रहे हैं। सिंधिया समर्थक सोशल मीडिया में हवा फैला रहे हैं कि चिदंबरम और कर्नाटक के नेता डी के शिवकुमार की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई और ईडी का अगला निशाना कमलनाथ हैं। कमलनाथ के भांजे रतुल पूरी के गिरफ्तार होने के बाद सीबीआई व ईडी को उनके सहयोगियों के खिलाफ छापे में कई चीजें मिली हैं, जिनसे जांच की आंच मुख्यमंत्री तक पहुंच सकती है। उनके समर्थक इस उम्मीद में हैं कि सिंधिया के भाग्य से छींका टूट सकता है। तभी इस तरह का दावा किया जा रहा है कि उनके पास 42 विधायकों का समर्थन है।

सीबीआई या ईडी में अब तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ को लेकर इस तरह की कोई कयासबाजी नहीं है। और न ही सिंधिया के भाग्य से कोई छींका टूट रहा है। चिदंबरम और कर्नाटक के कांग्रेस नेता डी के शिवकुमार से हठकर कमलनाथ का मामला कुछ अलग है। गांधी परिवार से नजदीकियां होने के साथ-साथ उनके कार्पाेरेट घरानों से व्यक्तिगत तौर पर अच्छे संबंध हैं। कुछ देर के लिए मान भी लें कि सिंधिया खेमे में 42 विधायक हैं तब क्या यह संख्या दिग्विजय सिंह या कमलनाथ खेमे से पार जाती नजर आ रही है? अगर नहीं तो सिंधिया के भाग्य से छींका टूटने का ख्याल किस आधार पर किया जा रहा है? उनसे ज्यादा विधायकों की संख्या तो दिग्विजय और कमलनाथ के पास है। तो वे क्यों भला सिंधिया का मुख्यमंत्री बनने देंगे? वैसे तो कमलनाथ फिलहाल अभी किसी तरह के कानूनी पेंच में फंसते नजर नहीं आ रहे हैं, अगर किसी कारण ऐसी स्थिति आती भी है तो भी सिंधिया मुख्यमंत्री बनने से रहे। उनके बारे में पखवाड़ा भर से चल रही चर्चाओं और समर्थकों द्वारा बयानबाजी से जो नुकसान सिंधिया का हुआ है वह शायद सोच नहीं पा रहे। गांधी परिवार में भी उनका सद्भाव कम हुआ है।

मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता रहे अर्जुन सिंह जब राजनीति की उंचाइयां चढ़ रहे थे तब प्रदेश संगठन में तीन युवा नेता अपनी विशिष्ट पहचान बना रहे थे। वे थे कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और सुरेश पचैरी। अर्जुन सिंह जैसे ही ओझल हुए कि दिग्विजय सिंह ने प्रदेश कांग्रेस संगठन पर कब्जा जमाया। दस साल मुख्यमंत्री रहते दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ और सुरेश पचैरी को राज्य की राजनीति में दखल देने से दूर दिल्ली की राजनीति में ही उलझाए रखा। कमलनाथ ने दिंछवाड़ा में अपनी जमीन बनाए रखी जबकि सुरेश पचैरी बिना जमीन के ही राज्यसभा से अपनी पैरवी करते रहे। तब इन तीनों के समकालीन नेता माधवराव सिंधिया केवल ग्वलियर अंचल में महल तक ही सीमित रहे। दिग्विजय सिंह ने पहले सीनियर सिंधिया को हाशिए पर लगाया। पचैरी प्रदेश अध्यक्ष बनकर आए तो उनका भी वही हाल हुआ जो सिंधिया के साथ किया गया। अब सवाल जूनियर सिंधिया का है तो उन्हें अभी सीखना है कि हार पी लेने की चीज होती है, गुणगान करने की नहीं। सिंधिया जो आज समझ पा रहे हैं, यह उनको बहुत पहले समझ लेना चाहिए था कि कमलनाथ जब प्रदेश अध्यक्ष बनकर भोपाल गए थे तभी उन्होंने बाजी मार ली थी। सिंधिया अगर यह समझ रहे हैं कि उनके पाले में 42 विधायक हैं तो वे गलत फहमी में है।

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