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भारत को पटेल जैसा "लौह पुरुष" चाहिये...

विनोद कुमार सर्वोदय

भारत को पटेल जैसा लौह पुरुष चाहिये...

भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी और भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह इंशाअल्लाह आदि आदि के नारे लगा कर देश को ललकारने वाले तत्वों ने राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाये रखने के लिये स्व.सरदार पटेल की आत्मा को अवश्य पीड़ित किया होगा ? सरदार वल्लभभाई पटेल की दूरदर्शी सोच व कुशल शासकीय क्षमता का ही परिणाम था जिससे छोटे-छोटे राज्यों को एक साथ मिला कर एक सशक्त राष्ट्र के रूप में भारत का निर्माण हुआ था।ध्यान रहें राजाओं व नबावों के स्वामित्व वाले लगभग 564 राज्यों का एकीकरण करने की जटिल प्रक्रिया में सरदार पटेल की अदभुत भूमिका ने उनको भारत का "लौह पुरुष" बना दिया। अधिकांश भारतीय समाज को देश के विभाजन की अनेक हिन्दू-मुस्लिम जटिलताओं का पूर्णतः ज्ञान सम्भवतः न हो इसलिए यह भी स्मरण आवश्यक है कि सरदार पटेल के दूरदर्शी व साहसिक निर्णयों के कारण ही केवल एक पाकिस्तान बना नही तो अंग्रेजो ने तो ऐसी स्थिति बना दी थी कि हमारे बीच में ही अनेक घोषित पाकिस्तान बन जाते। इसलिए भी सरदार पटेल को "लौह पुरुष" कहा जाता है।यहां यह लिखना अनुचित नही होगा कि धार्मिक व सांस्कृतिक आधार को छोड़ दिया जाय तो भारत का राजनैतिक दृष्टि से सम्भवतः सम्राट अशोक के काल के अतिरिक्त कभी भी इतना विशाल स्वरूप नही रहा होगा ?

वर्तमान परिस्थितियों में जब देशद्रोही शक्तियां भारत को खड़-खंड करने की तुच्छ मानसिकता का परिचय देने का दुःसाहस कर रही हो तो राष्ट्र को अखंड रखने के लिये सरदार पटेल की कार्यशैली और अधिक प्रसांगिक हो जाती है। भारत के सन 1947 के धर्माधारित विभाजन के पश्चात भी अनेक भारत विरोधी देशी-विदेशी शक्तियां देश को और अधिक विभाजित करने के अवसरों को ढूंढने में अभी तक सफल नही हो पा रही है। यह अत्यंत दुःखद है कि आज देश की स्वतंत्रता के 70 वर्ष पश्चात भी हम सशक्त व कुशल राजनैतिक व प्रशासकीय नेतृत्व के अभाव में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के दुष्परिणामों को झेलने के लिये विवश हैं। हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इतना अधिक दुरुपयोग हो रहा है कि राष्ट्रद्रोही भावनाओं को भड़काने वाले तत्व प्रभावी होते जा रहे हैं। क्या यह अनुचित नही कि शत्रु देश पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाना , उसका झण्डा लहराना एवं देश के टुकड़े-टुकड़े करके उसकी बर्बादी तक जंग को जारी रखने वालों पर शासकीय तंत्र कोई अंकुश न लगा सका, क्यों ? आपको ज्ञात ही होगा कि देश की राजधानी नई दिल्ली में स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कुछ अराष्ट्रीय तत्व वर्षो से सक्रिय है। लेकिन लगभग ढाई वर्ष (फरवरी 2016) पूर्व जो "भारत की बर्बादी" जैसे चीखते व चुभते नारों ने राष्ट्रीय मानस को स्तब्ध कर दिया था। क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह होता है कि अपनी ही मातृभूमि के विरुद्ध षडयन्त्रकारियों को उत्साहित करके उनकी योजनाओं को सफल करने में सहायक बनें ? क्या अर्थ व अन्य लोभ-लालच वश देश-विदेश के द्रोहियों का समर्थन करके विश्वासघाती बनना अपराध नही ? क्या विश्व के किसी भी देश में ऐसे विश्वासघातियों को जो राष्ट्र को खड़-खंड करने के दुःस्वप्न देखते हो को बंधक बनाने के स्थान पर विभिन्न मचों पर सम्मानित होना स्वीकार होगा ?

ऐसे में शासकीय शिथिलता व कठोर निर्णायक क्षमता के अभाव में ऐसे तत्वों का दुःसाहस इतना अधिक बढ़ गया कि वे हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को ही स्व.राजीव गांधी के समान लक्ष्य बनाकर षड्यंत्र करने की सोचने लगे। पिछले माह आये ऐसे अनेक समाचारों से यह विदित हुआ है कि माओवादियों की देशद्रोही वैचारिक पृष्ठ भूमि की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी है। इनके साथियों में न जाने कितने वरिष्ठ बुद्धिजीवियों के नामों ने तो आश्चर्यचकित ही कर दिया। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों पर जब संदेह की दृष्टि से प्रशासकीय कार्यवाही की गयी तो अनेक पत्रकार, बुद्धिजीवी, अधिवक्तागण एवम राजनेता आदि एकाएक इनके पक्ष में खड़े हो गये और वैधानिक प्रक्रिया को प्रभावित किया। प्रायः अनेक अवसरों पर जब भी आतंकवादियों, अलगाववादियों, घुसपैठियों व अन्य देशद्रोही मानसिकता वालों के विरुद्ध कोई कठोर कार्यवाही होती है तो ऐसे तत्वों की संदिग्ध सक्रीयता बढ़ जाती है।ऐसी विकट स्थिति में जब राष्ट्रीय संप्रभुता पर संकट मंडराने लगे तो उसे कैसे थामा जाय ? क्या भारत विरोधी शक्तियां इनती अधिक सशक्त है कि वे हमारे प्रबुद्ध माने जाने वाले वर्ग में स्वदेश के प्रति नकारात्मक भावनाऐ भरने में सफल हो जाते है ? जिस कारण वे समय समय पर आन्दोलित होते रहते और भारतीय लोकतंत्र को प्रभावित करते आ रहे है। ऐसे में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षार्थ अराष्ट्रीय मानसिकता वाले विभिन्न संदिग्ध वर्गों पर अंकुश लगना ही चाहिये।

अतः ऐसी विपरीत अवस्था में आज हमको सरदार पटेल जैसे कठोर प्रशासक व नेतृत्व की महत्ती आवश्यकता है। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था , जहां चुनावों में विजयी होने वाले राजनैतिक दल द्वारा ही सरकार गठित होती है, में क्या ऐसी सामर्थ है कि वह एक ऐसा प्रभावशाली राजनैतिक नेतृत्व प्रदान करें जो राष्ट्रविरोधी तत्वों व अन्य शत्रुओं पर दृढ़ता से प्रहार कर सकें ? क्या देश की वर्तमान परिस्थितियों में कोई ऐसा नायक मिलेगा जो सरदार पटेल जैसी "लौह पुरुष" की भूमिका निभा सके ? इतिहास में वही शासक सफल माने गये है जो राष्ट्रहित को सर्वोपरि मान कर कठोर व कडवें निर्णयों के साथ आगे बढ़े थे। कुछ ऐसी ही संभावनाओं को ढूंढने के लिये सरदार वल्लभ भाई पटेल की गुजरात (साधुबेट- नर्मदा जिला) में 182 मीटर ऊंची विशाल प्रतिमा "स्टैच्यू ऑफ यूनिटी" का 31 अक्टूबर 2018 (144 वी जयंती ) को हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अनावरण करके उस महापुरुष को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही करोड़ो भारत वासियों को सकारात्मक संदेश देना चाहेंगे।यह भी एक संयोग है कि इस विशालकाय प्रतिमा का शिलान्यास भी श्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्य मन्त्री के रूप में सरदार पटेल की जन्म तिथि 31 अक्टूबर को ही 5 वर्ष पूर्व किया था।इस विशालकाय प्रतिमा का निर्माण मुख्यतः भारत के कोने कोने से लाये गये लोहे व मिट्टी से किया गया है। जिससे हम सबको एक स्पष्ट संदेश भी मिलता है कि सहस्त्रो वर्ष प्राचीन हमारी संस्कृति का भारत को एकजुट करने व रखने में सर्वश्रेष्ठ योगदान रहा और रहेगा । इस शास्वत सत्य को समझने और उसे धरातल पर स्थापित करके "भारत" का निर्माण करने वाले सरदार पटेल के महान व्यक्तित्व व कृतित्व के अनुरूप आज हमको एक और "लौहपुरुष" चाहिये। आज हम सब भारतवासियों का यह दायित्व है कि राष्ट्रीय एकता और अखंडता के प्रति समर्पित लौह पुरुष सरदार पटेल को अपनी अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यह उदघोष अवश्य करें कि "भारत अखंड, अजेय और अमर रहें।"


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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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