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भारतीय राजनेता की परिभाषा को चरितार्थ करते थे अटलजी

पुण्यतिथि विशेष

भारतीय राजनेता की परिभाषा को चरितार्थ करते थे अटलजी

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की स्थापना सन् 1951 में की। भारतीय राजनीति में बहुत कम लोग ऐसे बचे थे, जो अपने दल के जन्म से ही उसके विस्तार में लगे हों। जनसंघ की स्थापना के प्रारम्भ से जो जुड़े, उनमें एक अग्रणी नाम था 'अटल बिहारी वाजपेयी'। जनसंघ के संस्थापक डॉ. मुखर्जी 23 जून 1953 को शहीद हो गए। वे परमिट तोड़कर जम्मू कश्मीर में प्रवेश किये थे। उनके साथ बतौर पत्रकार अटल बिहारी वाजपेयी गए थे। जब परमिट तोड़कर डॉ. मुखर्जी जम्मू कश्मीर में प्रवेश किये तो डॉ. मुखर्जी ने अटलजी से कहा ''वाजपेयी गो बैक एंड टेल द पीपल ऑफ़ इंडिया डॉ. मुखर्जी इन्टर्ड जम्मू कश्मीर विदाउट परमिट''। अटलजी यहीं से प्रारम्भ हुए और कभी पलटकर नहीं देखा। इसी बीच 23 जून 1953 को डॉ. मुखर्जी की, जो कश्मीर में नजरबन्द थे, अचानक रहस्यमयी मौत हो गई। अटलजी पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संपर्क में प्रारम्भ में ही आ गए थे। वे उत्तर प्रदेश के संडीला में कुछ महीनों के लिए संघ के विस्तारक होकर भी गए थे। पर भारतीय जनसंघ की यात्रा जो उन्होंने उस समय शुरू की, वह कभी नहीं रुकी ।

अटलजी भारतीय राजनीति में जो नेतृत्व की कल्पना की गई है, उसके पर्याय थे। 'राजनेता' शब्द को यदि हमारे सामने किसी ने जिया तो वे अटलजी ही थे। उन्हें देखकर राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति श्रद्धा पैदा होती थी। 'राजनीति' की मृत्यु कभी नहीं हो सकती, क्योंकि वह समाज के साथ सत्य सनातन भाव से जुड़ा हुआ है। अटलजी जैसे लोगों ने राजनीति, जिसे लोग निकृष्ट स्थान कहते हैं, को उत्कृष्ट कार्य करने का स्थान बना दिया। अटलजी मां सरस्वती के वरद पुत्र थे। उनकी वाणी में भारत का दर्शन होता था। उनकी वाणी उनकी पहचान बन गई। भारतीय राजनीति में वे पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपनी वाणी से जन-जन के मन मंदिर में अपना स्थान बनाया था। कठोर से कठोर बातों को वे शीतल वाणी से कहकर लोगों का मन जीत लेते थे। आज पूरे भारतवर्ष में उनकी 'वाणी' का पर्याय कोई न दे सका। अपने प्रखर वक्तव्य और प्रभावी भाषण से अपने विचारों का कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रचार-प्रसार कर उन्होंने जनसंघ को स्थापित किया । भारत का अखंड प्रवास कर उन्होंने जनसंघ के दिए के प्रकाश भारत के कोने-कोने में ले गए। हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि हमें उनके साथ काम करने का अवसर मिला। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरु से अपनी छोटी उम्र में संसद में बहस कर उन्होंने संसद में भी अपना विशिष्ट स्थान बनाया था। यहि कारण था कि सन् 1963 में पंडित नेहरु ने सदन में अटलजी का ओजस्वी भाषण सुनकर कहा था 'मै इस युवा में भारत का भविष्य देखता हूं'।

अटलजी कवि थे। अटलजी लेखक थे। अटलजी नेता थे। अटलजी दार्शिनिक थे। अटलजी अति संवेदनशील थे। अटलजी विचारों के प्रतिबद्ध प्रति रहे। पर विचारों को प्रकट करने में निडर भी रहे। उनकी आंखों के सामने पहले देश रहता था और दल बाद में आता था। अटलजी भारतीय राजनीति में विपक्ष की शान थे। सदैव विपक्ष में रहे, पर देश का हर नागरिक यह कहता था कि अटलजी को एक न एक दिन प्रधानमंत्री बनना चाहिए। वे अपने दल में जितने लोकप्रिय थे, उससे भी अधिक अन्य, खासकर विरोधी दलों में लोकप्रिय थे। विरोधी दलों के नेता यह कहते हुए सुने जाते थे कि काश हमारी पार्टी में कोई अटलजी होते। उनके समय में हार- जीत से ज्यादा महत्व राजनीति की मर्यादा और मानवता का था ।

अटलजी के जीवन का हर राजनैतिक प्रसंग हम भारतीयों का प्रेरणा देता है। वे जब स्वयं चुनाव हार गए और केवल दो सीटें भारत में भाजपा की आई तब भी घबराए नहीं। उन्होंने कहा था कि 'हम चुनाव हारे हैं, मन नहीं हारे'। अटलजी विपक्ष की राजनीति करते हुए तनाव में नहीं दिखे। अटलजी 'मैं' से दूर और 'हम' के करीब रहते थे। अजातशत्रु शब्द को उन्होंने प्यार से जिया। उनका कोई दुश्मन नहीं था। उन्होंने अपने जीवन से कभी झूठ नहीं बोला।

अटलजी को लोगों ने सदैव नेता के रूप में देखा। हम सभी का सौभाग्य है कि हमने ग्वालियर के नाते हमेशा परिवार के वरिष्ठ लोगों के रूप में देखा। अटलजी पराजय में जय की संभावनाओं को कभी छोड़ते नहीं थे, वे कहते थे कि 'आज का पराजय ही कल की जय की संभावना लेकर आयेगा'।

भारतीय राजनीति में आज तक वर्षों विपक्ष में रहते हुए अटलजी चिंतन-श्रद्धा के केंद्र देशवासियों के बीच बने वैसा अब तक कोई दूसरा नहीं हुआ। 'विपक्ष की सत्ता में भूमिका, विपक्ष का सदन के भीतर भूमिका और विपक्ष का सड़कों पर कैसी भूमिका', को परिभाषित करने वाले भारत के अनूठे नेता थे अटलजी। भारतीय राजनीति में वर्षों विपक्ष में रहत हुए देश के प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ। वे भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने जो गैर- कांग्रेसी थे। अटलजी भारतीय संसद के गौरव थे। अटलजी भारतीय राजनीति के अद्वितीय आदर्श थे ।

अटलजी की वैचारिक प्रतिबद्धता प्रणाम करने लायक थी। ढांचा टूटा वे दुखी हो गए। पत्रकार लोग उनसे मिलने गए। पत्रकारों ने उनसे पूछा कि अब आप क्या करेंगे। अटलजी ने कहा कि ढांचा गिरना दुखद है। पर मै सदन में नरसिम्हा राव जी से यह अवश्य जानना चाहूंगा कि आखिर ये परिस्थिति क्यों बनी। क्या सरकार इसके लिए जिम्मेदार नहीं है।

अटलजी विषम परिस्थितियों में और निखर कर आते थे। अटलजी भारत के पहले प्रतिपक्ष के नेता थे जिन्हें भारत सरकार ने शिष्टमंडल लेकर यूएन भेजा था। अटलजी दल के माध्यम से देश की राजनीति करते थे। अटलजी ने संगठन को गढ़ने का, कार्यकर्ताओं को वैचारिक रूप से मथने का और जनता के बीच सदैव जीवित रहने का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।

अटलजी जनता पार्टी में थे। उन्होंने भारतीय जनसंघ का विलय लोकतंत्र के हित में आपातकाल के दौरान कर दिया। यहां तक कि अपना चुनाव चिन्ह भी छोड़ दिया। लेकिन कुछ वर्षों बाद जनता पार्टी के कुछ नेताओं ने जनता पार्टी में दोहरी सदयता की बात उठा दी। यहां तक कह दिया कि जो जनसंघ के घटक के लोग जनता पार्टी में हैं, उन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सदयता छोड़नी होगी। अटलजी ने आरंभ में इसे हलके से ले लिया और कहा की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में भाई कोई सदस्यता नहीं होती है। पर जनता पार्टी के नेता नहीं माने। अटलजी और आडवाणीजी ने उस समय की जनता पार्टी के नेताओं को जो कहा वो उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता का अनमोल उदाहरण है। अटलजी ने कहा, "राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हमारी मातृ संस्था है। हम वहां से संस्कारित हुए हैं। हम राजनीति छोड़ सकते हैं, जनता पार्टी छोड़ सकते हैं, पर कभी भी संघ छोड़ने की बात नहीं कर सकते।

इसके बाद ही 6 अप्रैल 1980 को 'भारतीय जनता पार्टी' का जन्म हुआ। अटलजी पहले अध्यक्ष बने। उन्होंने भाजपा के मुंबई में हुए प्रथम सम्मलेन में कहा था, " अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा और कमल खिलेगा"। आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह सच में भारत में ही नहीं, विश्व में भारत का परचम फहरा रहे हैं और अटलजी के भाजपा के प्रथम सम्मलेन में कही बात को पूरी तरह साकार कर रहे हैं। अटलजी काया से हमें छोड़कर गए, पर उनकी वैचारिक छाया के आंचल में हम सदैव पल्लवित होते रहेंगे।

- प्रभात झा, सांसद (राज्य सभा) एवं भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष

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