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कहानी : भाग्य और दुर्भाग्य

कहानी : भाग्य और दुर्भाग्य

चार- चार बेटों की मां है, तभी तो इतराती है.... कभी सीधे मुंह बात ही नहीं करती.... सुना है रमा के दोनों बेटे विदेश में रच बस गए हैं... कल ही रमा छत पर खड़ी थी। कह रही थी तीसरा बेटा भी जल्द ही विदेश जाने वाला है और सबसे छोटे बेटे की सरकारी नौकरी लग गई... सच बड़े भागों वाली है रमा, पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में...और हो भी क्यों न बड़े दु:ख सहकर बेचारी ने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया है। ये सब तो रमा की ही मेहनत का फल है जो उसके बच्चे आज इतनी ऊंचाइयों पर हैं... सही है ठाठ है रमा के...

शायद ही मौहल्ले का कोई व्यक्ति हो जो रमा की प्रशंसा न करता हो। पति के चलबसने के बाद रमा पर तो जैसे दु:ख का पहाड़ ही टूट पड़ा था। अभी उम्र ही क्या थी रमा की, ऊपर से चार छोटे बच्चों का साथ ...ईश्वर की कृपा इतनी रही कि पति शासकीय कर्मचारी थे। बड़ी मशक्कत के बाद रमा को अनुकंपा नौकरी मिल सकी।

अकेले चार बच्चों को संभालना और नौकरी करना ऊपर से परिवार वालों का कोई साथ नहीं। इस सब के बाद भी रमा ने हिम्मत नहीं हारी और अंतत: रमा की मेहनत रंग लाई। एक औरत होकर इतना साहस।

एक समय ऐसा भी था जब यही मोहल्ले वाले रमा के बारे में तरह-तरह की बातें कहते नहीं थकते थे....सुरेश को गुजरे दस दिन भी नहीं हुए थे। ...अरे अभी उम्र ही क्या है बेचारी की...देखना दूसरी शादी करेगी, हां, सही हैं चार बच्चों को अकेले पालना भी तो कितना कठिन है...कौन व्याहेगा चार बच्चों की मां को...। जितने मुंह उतनी बातें। रमा के हृदय की वेदना तो वही समझ सकता था जिसने यह पीड़ा सही हो।

पति से ही सारे रिश्ते होते हैं। पति नहीं तो कौन पूछता है। इस एसहास की कसर भी रमा की देवरानी कामिनी ने पूरी कर दी। एक दिन वह भी रमा से बोल पड़ी- दीदी हमारे साथ भी दो बच्चे हैं, दोनों बच्चों की फीस...भैया की तो सरकारी नौकरी थी, लेकिन इनका तो प्रायवेट काम है, चला तो चला नहीं तो नहीं। दीदी मेरी बातों का बुरा नहीं मानना... आप तो मेरी बड़ी बहन जैसी हो... लेकिन रमा मन ही मन समझ गयी। आंखों में आंसू भरकर कमरे की ओर जाती हुई बस खुद से एक ही सवाल कर रही थी कल तक सुरेश जीवित थे सारी दुनिया अपनी लगती थी, सुरेश के जाते ही...

रमा जीवन के कठिन दौर से गुजर रही थी, आंखों में आंसू भी आते तो रमा को देखकर उसके बच्चे रोने लगते। रमा की हालत तो ऐसी थी जैसे शरीर से प्राण निकल गए हों और सांस चल रही हो। घर पर लोगों का आना जाना लगा रहता। जितने लोग उतनी बातें... सुरेश के ऑफिस के भी कुछ लोगों का घर मिलने आना हुआ। सुरेश के व्यवहार के बारे में सुनकर रमा बार-बार रुंआंसी हुई जा रही थी...भाभी जी होनी थी सो हो गई लेकिन अब आपको अपने बच्चों के लिए खुद को संभालना होगा। आप इतनी तो पढ़ी-लिखी हैं कि आपको, अनुकंपा पर नौकरी मिल सकती है। यह बात सुनते ही रमा के मन में आशा की किरण जागी। नौकरी का शब्द रमा के हृदय में जख्मों पर मरहम का काम कर गए।

सुरेश के ऑफिस के मित्रों के सहयोग और मशक्कत के बाद रमा को नौकरी मिल गई। नौकरी लगते ही रमा के प्रति घर वालों के तेवर तो बदल गए लेकिन इस सब के बाद भी रमा के संघर्ष कहां कम होने वाले थे। चार छोटे बच्चों को किसके सहारे छोड़ती। देवरानी ने पहले से ही रमा के मन में खटास भर दी।

...... परीक्षा तो एक दो दिन की होती है, लेकिन कई वर्षों का संघर्ष रमा को वज्र सा मजबूत बना गया। अपने काम से काम रखना, न ज्यादा बोलना, न बातचीत.... ३५ साल की रमा आज ६० वर्ष की हो चुकी थी चमकती काली आंखों पर चढ़ा मोटा चश्मा जीवन के हर दृश्य को स्पष्ट करता था। लेकिन फुर्ती और आत्मनिर्भरता आज भी वैसी ही जैसी पैंतीस साल पहले थी।

कुर्सी पर वैठी रमा राहत की सांस ले रही थी, दोनों बड़े बेटे विदेश में रच बस गए और तीसरा बेटा भी जल्द ही विदेश जाने वाला है, सबसे छोट बेटे की भी रमा के रिटायरमेंट से पहले नौकरी लग गई। रमा के बेटे अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ रहे थे।

समय इतना विपरीत भी हो सकता है ये कौन जान सका है। रमा को भी जीवन का एक विपरीत दौर देखना बाकी था। वृद्धावस्था की ओर तीव्रता से बढ़ते जीवन में ऐसा भी मोड़ आएगा शायद रमा ने भी नहीं सोचा होगा। सुबह का समय, रमा दैनिक कार्यों में ही लगी थी... बाथरूम में नहाने का पानी रख कर रमा ने दरवाजा लगाया था कि जोर से आवाज आई.... आवाज सुनकर देवरानी की बेटी दौड़ी आई... ताई जी.. ताई जी क्या हुआ। रमा अचेत हो चुकी थी। जैसे तैसे रमा को बाथरूम से बाहर निकाला। डॉक्टरी जांच के बाद पता चला रमा को लकवा मार गया है।

यह खबर सुनकर तो जैसे घर में सन्नाटा ही पसर गया। जब तक आदमी के पास पैसा है और उसके हाथ-पांव चल रहे हैं तब तक दुनिया अपनी होती है इनमें से एक भी चीज पीछे छूटी तो.... यही स्थिति रमा के साथ थी, देवरानी मन मसोसकर रमा की देखरेख कर रही थी। लेकिन बात-बात पर पति को ताना देती सुनो जी, मुझसे से ये सारे काम नहीं होते। आप अपने भतीजों को फोन लगाकर कह दो कि, दो-चार नौकर रख दें, मैं कोई नौकर नहीं हूं... बिस्तर पर पड़ी रमा कुछ बोल तो नहीं सकती थी आंसू भरी मां की नजरें अपने बेटों को देखने के लिए तरस रही थीं। रमा ने इशारे में अपनी देवरानी कामिनी से पूछा- बच्चे कब आ रहे हैं? कामिनी तो मानो रमा के यही प्रश्न की प्रतीक्षा कर रही थी, कि कब उसे एक दो बातें सुनाने का मौका मिले.... और पढ़ाओ बच्चों को, विदेश भेज दो... अब यहां हम घर के काम करें या आपको देखें। पैसा भेज दिया बस, काम कौन करेगा सारा। हमारा तो दो वक्त का आराम भी बेकार हो गया।

रमा की देखभाल के लिए बेटों ने नौकर चाकर, डॉक्टर की व्यवस्था तो करा दी थी। लेकिन मां अपने बच्चों का प्यार भी चाहती है। बेटा पास बैठे, बुढ़ापे में मां के सुख दु:ख को जाने.... फिजियोथैरेपिस्ट की सहायता से रमा चेयर पर बैठी थोड़ा बहुत हाथ- पैर तो हिला लेती लेकिन मन ही मन अपनी फूटी किस्मत पर आंसू बहा रही थी। जिसे सभी भागों वाली कहते नहीं थकते थे, वही भागों वाली व्हीलचेयर पर बैठी-बैठी अपने ही भाग को कोस रही थी।

-गौरी नारायण, ग्वालियर

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