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कहानी : एक दिन अचानक

कहानी : एक दिन अचानक

इसे आज ही बिगडऩा था, झुंझलाते हुए शरद मिश्रा ने सोचा था। उन्होंने दूर दूर तक नजर दौड़ाई लेकिन कहीं किसी मैकेनिक का साया भी नजर नहीं आ रहा था। आज रोज की तरह ठंडी पुरवैया भी नहीं थी और ना ही रूमानियत में डूबी गुलाबी सर्दी थी, आज मौसम भी खुशगवार होने की जगह खुश्क हो उठा था। पेशे से शिक्षक मिश्रा जी ने जीवन के पांच दशक अब तक बिताये थे। सारी जमापूंजी दोनों बेटों की शिक्षा दीक्षा को भेंट हो चुकी थी।लेकिन अब घर की हालत 'साईं इतना दीजिये जामे कुटुम्ब समाय ,मैं भी भूखा ना रहूँ ना साधू भूखा जाय' के दौर से गुजर रही थी। लगभग बीस साल से भी ज्यादा का साथ निभाने वाला स्कूटर अब जवाब देने लगा था।कभी भी कहीं भी किसी अडियल घोड़े की तरह खड़ा हो जाता और जब तक मैकेनिक को मोटी फीस नहीं दे दी जाती तब तक ठीक ही नही हो पाता।

आज भी सुबह जब स्कूल के लिये घर से निकलने वाले ही थे तभी पत्नी ने टोका था, सुनिये -- आज जल्दी घर आना है और कुछ मीठा भी लेते आना होगा।

उन्होने हैरानी से देखा था और कुछ पूछते कि पत्नी ने तत्काल ही कह दिया था, लो जी आज भी भूल गये।अरे- आज हमारी शादी की सालगिरह है।

वे खिसिया से गये थे।एक मीठी मुस्कराहट से स्कूटर को किक लगायी और कुछ ही समय बाद विद्यालय परिसर में अपने उत्तरदायित्व वहन करने लगे थे।

आज अचानक ही कुछ अधिकारियो के निरीक्षण की टीम आ गई थी और सीनियर होने के कारण प्रिंसिपल के आसपास रहना लाजिमी था। पूरा दिन कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला। शाम होते ही स्टाफ सदस्यों के साथ उन्होने भी स्कूटर को घर की ओर मोडा था।लेकिन आज ही स्कूटर को भी शायद अपना हिसाब किताब बराबर करना था, इसलिए कुछ दूर जाते ही किसी अडियल घोड़े की तरह बिदक गया था। अब स्कूटर को धकेलते हुए ले जाने के सिवाय कोई चारा ही नही था। आज सोचा था शाम को पत्नी के साथ मन्दिर जाएंगे और डिनर भी कर आएंगे ।

स्कूटर को धकियाते हुए अपने गुजरे दिनों को याद करते हुए किसी तरह अपने फ्लैट पहुंच गये थे। पत्नी की अनुभवी आंखो ने समझ लिया था कि आज स्कूटर ने उन्हें अच्छा खासा परेशान किया था। दोनों बेटे आज मल्टी नेशनल कंपनी में जॉब पर है , बस एकमात्र यही सुकून था और जीवन को जैसे बीतना था वो भी वैसे ही बीत ही रहा था।

आज स्कूटर ने शरद जी को व्यथित कर दिया था, आज शादी की सालगिरह पर वे स्वयं को लाचार पा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे जीवन के गणित का समीकरण गड़बड़ा गया हो,तभी घर की कालबेल बज उठी थी। पत्नी ने ही दरवाजा खोला था- मैडम क्या शरद मिश्रा जी यहीं रहते है?

एक अजनबी बाहर पूछ रहा था, जैसे ही उन्होंने अपना नाम सुना था, वे फौरन बाहर आ गये थे ।

जी हां कहिये, मैं ही हूँ शरद मिश्रा। आगंतुक ने साथ में लाये गुलदस्ता को सौंपते हुए कहा था सर आपको शादी की सालगिरह की शुभकामनाएं और साथ मे नयी गाड़ी की भी। अपना वाक्य पूरा करते करते उसने गाड़ी की चाभी सौपनी चाही थी।

नहीं-नहीं आपको कोई गलतफहमी हुई है। हमने कोई गाड़ी बुक नहीं करायी है। आप शायद किसी और को ढूढ रहे हैं। उन्होने प्रतिरोध किया था।

नहीं सर, आप एक बार नीचे चलकर आइये तो सही, आपका ये सर प्राईज गिफ्ट आपको आपके बेटों ने भेजा है। वे लोग एक महीने पूर्व ही गाड़ी बुक कर गये थे और आज के ही दिन शाम को गाड़ी घर पर पहुंचाने को कहा था। आगन्तुक कुछ और कहता - उसके पूर्व ही मोबाईल की रिंगटोन बज उठी थी, फोन पर बड़ा बेटा आशीष था पापा आपको पुराने स्कूटर से जाने की कोई आवश्यकता नहीं। आपको नयी स्विफ्ट कार मुबारक हो।

दोनों पति पत्नी ने नीचे आकर देखा - दूधिया सफेद रंग की कार खड़ी थी। जैसे ही कार को देखा शरद जी किसी मासूम बालक की तरह खुशी से बिलख पड़े थे। दीपा देखो, दीपा, हमारे बच्चे बहुत बडे हो गये। हे भगवान ऐसे बच्चे सभी को देना । कहते-कहते एक बार फिर से उनकी आंखे जल धार बहाने लगी थी।

बच्चों के लिये कर्ज लेकर शिक्षा दिलाते माता पिता तो हर घर में मिल जाते है, लेकिन आज के जमाने मे इतना असीम सुख पहुंचाने वाली संतानें शायद कहीं कहीं ही मिलती हैं। शरद जी को अब जीवन से कोई शिकायत नहीं थी, कुछ समय बाद दोनों पति पत्नी फ्लैट में पडोसियों को मिठाई बांटते नजर आ रहे थे। उनके उत्फुल्ल चेहरे को देखकर यही लग रहा था मानो आज शादी की सालगिरह नहीं बल्कि आज ही शादी हुई हो। उनके गुणी और मेधावी बेटों ने आज सरप्राइज भेजकर इस दिन को अविस्मरणीय बना दिया था।

-डॉ प्रतिभा त्रिवेदी

Naveen ( 1696 )

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