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धार्मिक सांस्कृतिक संकल्पधर्मी भिण्ड

धार्मिक सांस्कृतिक संकल्पधर्मी भिण्ड

हमारा देश धर्म एवं संस्कृति से सना हुआ है। यहां धर्म और धर्मग्रंथों की बहुलता है तो साथ ही संस्कृति की भी व्यापक उपस्थिति है। इसके अंतर्गत देश का प्रत्येक कोना सामाजिक-धार्मिक एवं सांस्कृतिक सहभाव को धारण करता है। भारतीयता की आंचलिकता से साक्षात्कार का एक अनूठा अवसर बिना प्रयास के प्राप्त हुआ। नब्बे के दशक में जिला भिण्ड के कलेक्टर रहे आर.सी.सिन्हा के साथ चंबल के किनारे विचरण हुआ। उन्होंने बताया कि चंबल के बीहड़ों में डकैत समस्या जबरदस्त रही थी उस समय चंबल पर भिण्ड और इटावा को जोडऩे वाला पीपों का पुल हुआ करता था जहां पर आज सडक़ पुल और रेलवे पुल देखे जा सकते है। यह विकास की धारा है जिसे आज मैं देखकर हर्षित हूं। सडक़ों का जाल फैल गया है और नहरों के निर्माण से सरसों की पंक्तियों और खेती का विस्तार हुआ है। फलत: आज अपराधों में कमी आई है और चंबल की भूमि डाकुओं से वीरों की भूमि में परिवर्तित हो गयी है।

मध्यप्रदेश के इस अंचल में डकैत मोहर सिंह मेहगांव एवं लहार में, डकैत मलखान सिंह गोहद एवं रौन में, डकैत फूलनदेवी अटेर और इटावा तथा डकैत मानसिंह की सक्रियता मुरैना और शिवपुरी में रही थी। इन डकैतो को नियंत्रित करने के लिए ग्वालियर चंबल संभाग की पहली कार कलेक्टर भिण्ड को एमजेड-001 आवंटित की गयी।

इस अंचल में पुलिस द्वारा चलाए गए डकैत उन्मूलन में चंबल के घडियालों का योगदान भी कम नहीं है। जब उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की पुलिस डकैतों की घेराबंदी करती थी और उन्हें घेरती थी तब डकैत पुल से चंबल नदी में कूद जाते थे वहीं घडियालों द्वारा उनके जीवन का अंत कर दिया जाता था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश हितेंद्र द्विवेदी ने बतया कि सन् १९८१ के डकैती उन्मूलन अधिनियम ने डकैतों संबंधी प्रकरणों में त्वरित सजाएं दी गयी। इससे डकैतों का मनोबल टूटा। अब चंबल नदी खेतों के साथ-साथ जनजीवन की प्यास बुझा रही है। इससे आगे समय में ग्वालियर जिले को पेय जल प्रदाय किया जाएगा।

किलों की बात करें तो अटेर के किले के भग्नावशेष यहां की उन्नत पुरा संपदा नदी के किनारे हमारा ध्यान सहसा खींच लेते हैं। चंबल नदी के किनारे पर 1644 ईस्वी में वदन सिंह भदौरिया द्वारा इस किले की स्थापना की गयी। इसमें दीवाने आम दीवाने खास तथा रानी महल भारत के अन्य महत्वपूर्ण किलों की भांति निर्मित किए गए थे। सिंधिया के साथ युद्ध में तोपों की धमक से किले की दीवारे नेस्ताभूत हो गयी। किले के बिखरे हुए पुरावशेष इसकी समृद्धता से हमें परिचित करा देते हैं। अलंकृत प्रस्तर स्तंभ यहां के गौरव है।

गोहद का किला 1505 में भीमासिंह जार द्वारा निर्मित कराया गया। यह किला बैशाली नदी से जल प्राप्त करता था। किले में छतों पर की गयी नक्काशी फूल-पत्ती युक्त अनूठी है।

इस किले में सातभामर और रानीमहल महत्वपर्ण निर्मितियां है। रानीमहल में नहाने के लिए अलग से किए गए गर्म जल का सतत प्रवाह का प्रबंध हमारे मन में प्राचीन तकनीकी के प्रति श्रद्धा के भाव पैदा करता है। इसे पुरातन गीजर व्यवस्था कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। धन धान्य से संपन्न इस अंचल में पाकिस्तान से विस्थापित लोगों के बसने से उत्पादन में आधिकारिक वृद्धि हुई है। भिण्ड जिले की समग्र चर्चा दंदरौआ धाम के उल्लेख के बिना अधूरी सी लगती है। कुछ लोगों की मान्यता है कि दर्द हरौआ से ही दंदरौआ शब्द का निर्माण हुआ है और यहां के हनुमान को डा. हनुमान की उपाधि स्वत: प्राप्त है। यहां पर लगने वाले वार्षिंक बुड़वा मंगल मेले में लाखों श्रद्धालु न केवल अपनी मनौती पाते हैं बल्कि अपने कष्टों से मुक्त हो जाते हैं। इनका संसर्ग प्राप्त होते ही जीव जीवन में आनंद का अनुभव करने लगता है।

कलेक्टर भिण्ड छोटे सिंह के साथ उनके बंगले का अवलोकन का अवसर प्राप्त हुआ। कलेक्टर निवास में तरह-तरह की फूलों की मनोहारी क्यारियों के साथ-साथ जीवन उपयोगी पौधों की बहुलता देखी जा सकती हे। एक सहज भारतीय की भांति कलेक्टर बंगले में फूलगोभी और टमाटर के पौधे देख मन हर्षित हुआ। पीछे बंधी गाय भारतीय संस्कृति की पवित्रता और पयपान की ओर हमें खीच ले गयी। छोटे सिंह द्वारा बताया गया कि पहले गाय एक थी अब यहां दो गाएं हैं जो उनके गौसेवा के भाव के साथ-साथ भारतीय संस्कृति के विचारों का पोषक है।

गौरी तलैया के गौरी सरोवर में रूपांतरण की चर्चा भी आवश्यक लगती है। भिण्ड के समाज सेवियों द्वारा कलेक्टर भिण्ड की प्रेरणा से इस सरोवर एवं स्थल का पर्यटक स्थल के रूप मे विकास मन मोह लेता है। विहारी सरोवर के किनारे बनाया गया पार्क फूलों दूर्वाओं और बालक्रीड़ाओं के लिए विनोद स्थल बन गया है। समग्रता: भिण्ड से साक्षात्कार उससे बार-बार मिलने की इच्छा मन में पैदा करता है। जो यहां की माटी के प्रभाव को दिखाता है साथ ही लोगों की आत्मीयता को।

- डॉ. लोकेश तिवारी आबकारी उपनिरीक्षक एवं साहित्य सभा के प्रचार मंत्री

Naveen ( 1308 )

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