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तूणीर : आतंकवाद का मायका पड़ोस में, गद्दार घर में

तूणीर : आतंकवाद का मायका पड़ोस में, गद्दार घर में

आज इस स्तंभ में कोई व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता। आज तो देश पर हुए आतंकी हमले की चर्चा ही होगी। राष्ट्रीय शोक , दुख और आक्रोश की घड़ी में, जबकि समूचा राष्ट्र( कुछ विदूषक जयचंदों को छोडक़र ) अपने वीर शहीदों की अकारण मृत्यु पर गमगीन होकर, एक स्वर से इस दुख के जन्मदाता पड़ोसी नापाक देश पाकिस्तान को कोस रहा है, तब हास्य - व्यंग्य लिखना, पढऩा या उसके बारे में सोचना भी असंभव - सा लगता है।

14 फरवरी को कश्मीर के पुलवामा में हमारी सीमा के प्रहरी, वीर रणबांकुरों को ले जा रही बसों के कारवां को निशाना बना कर, पाकिस्तान पोषित आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद

द्वारा किए गए कायराना आत्मघाती हमले में 40 वीर जवानों के शहीद हो जाने पर अंतर्राष्ट्रीय जगत में तहलका मच गया है । सभी छोटे - बड़े राष्ट्रों ने न केवल इसकी कड़ी निंदा की अपितु आतंकवाद के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर भारत के साथ खड़े रहने की पुष्टि की किंतु पड़ोस में विराजमान आतंक को पाल पोष रहे, आतंकवाद की नर्सरी, फैक्ट्री बने हुए , लंबे समय से खुले आम आतंकी सरगनाओं को पनाह देकर, पाल पोषकर बड़ा कर रहे पाकिस्तान की जुबान पांच दिन बाद खुलीं । वहाँ के प्रधानमंत्री ने उनकी सेना और खुफिया एजेंसी द्वारा लिखी गई तहरीर जिस तरह से मिमियाते हुए बांची और विलंब से मुंह खोलने का जो हास्यास्पद, बचकाना कारण - सऊदी अरब के किंग का वहाँ आना - बताया , उसे सुनकर तो लगता है कि पाकिस्तान की बागडोर किसी बिना रीढ़ वाले, मसखरे नेता के हाथ में आ गई है। उस मुल्क के नेतृत्व की विचारधारा पूरी तरह वहाँ की सेना और खुफिया एजेंसी आई एस आई के हाथों गिरवी है । जो आतंकवाद की फसल उगाकर पूरी दुनिया में अशांति, हिंसा और क्षुद्र संप्रदायवाद का जहर फैलाने पर आमदा है । ऐसा डरपोक नेतृत्व ना तो पाकिस्तान के लिए अच्छा है ना ही पड़ोसी राष्ट्रों के लिए।

लगता है कि यह पड़ोसी देश की जनता का दुर्भाग्य है कि उन्हें ऐसे अपरिपक्व , अदूरदर्शी और अव्यवहारिक नेता मिले हैं जो शायद विदेश नीति के व्यापक फलक के लिए आवश्यक परिपक्वता और मानवतावादी दृष्टिकोण का क ख ग भी नहीं जानते या फिर कुटिल, अमानवीय संस्कार ही उनकी पहचान हैं । जो भी हो, यह स्थिति उनके मानसिक दीवालियापन और अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी चलाने का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रतीत होती है।

विडंबना यह है कि भारत में भी ऐसे पाकिस्तान परस्त जयचंद, भारतीय विकासशील राजनीति के नासूर मौजूद हैं जो कश्मीर में अपने राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति और अस्तित्व की रक्षा की खातिर पाकिस्तान को एक मौका और देने की बात करते हैं।

किसी ने सही कहा है --

पाकिस्तान की सबसे बड़ी ताकत उसका परमाणु बम नहीं....... भारत में रह रहे गद्दार हैं, जो येन केन प्रकारेण उसका पक्ष पोषण कर उसे समर्थन देने की नापाक कोशिश करते रहते हैं।

लगभग पचास साल पहले के एक लोकप्रिय फिल्मी गाने की ये पंक्तियाँ भी इस संदर्भ में एकदम सटीक बैठती हैं।

कहना है एक बात हमें इस देश के पहरेदारों से

संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से

इसी में इसी रंग में रंगे पाक परस्त कुछ और नौटँकी बाजों का जिक्र करना आवश्यक है। हमारे यहाँ ऐसे भी ताली ठोकू, सीमा पार जाकर गलबहियों का खेल खेलने वाले, नितांत अवसरवादी नेता बने विदूषक हैं जो पाकिस्तान की प्रत्यक्ष सहभागिता दिखाई दे रही होने के बावजूद इस आतंकवादी घटना के लिए पाकिस्तान के विरोध में चंद शब्द बोलने में भी परहेज करते हैं। ऐसे लोग भी कम नहीं हैं जो राष्ट्रीय निष्ठा को पुष्ट करने वाले सात्विक रोष और वतनपरस्ती के इस माहौल में भी क्रिकेट के व्यामोह में जकड़े हुए, बातचीत के जरिये सारी समस्याओं का हल निकल आने का ख्याली पुलाव पका रहे हैं। ऐसे बेपेंदी के छद्म सेक्युलरवादियों की भी हमारे यहाँ कमी नहीं है जो हमारी परिपक्व विदेश नीति से भिन्न विचार प्रसारित कर स्वयं जनता के बीच हंसी व गुस्से का पात्र बनते हैं, बन रहे हैं। अफसोस तो तब होता है जब इस अवसरवादी विदूषक मंत्री - नेता पिद्दी जी के मुख्यमंत्री पाकिस्तान के विरो़ध में विधानसभा में भी खुलकर अपना बयान देते हैं, समूचे देश के गुस्से के साथ खड़े होते हैं । वहीं यह कम अक्ल क्रिकेटर , विदूषक पाकिस्तान के साथ बैठकर बात करने की दुहाई देते हुए नहीं थकता । इस पर भी तुर्रा यह है कि इस दल का राष्ट्रीय नेतृत्व इस विदूषक के सभी हास्यास्पद प्रहसनों को अनदेखा करते हुए इसके विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं करता ।

इतना ही नहीं टी वी के जिस कामेडी शो में यह श्रीमान् जी बेसिर पैर की तुकबंदी करके ताली ठुकवाते रहते हैं उसका प्रमुख किरदार कपिल शर्मा भी सिद्दू की ही भाषा बोल कर लोगों के गुस्से का पात्र बन गया है। मुझे लगता है कि आमजन को अब इस कामेडी शो को नहीं देखने का संकल्प लेकर इन दोनों पाकिस्तान परस्त विदूषकों को सबक सिखाना चाहिए। जब हमारी मजबूत इरादों वाली सरकार आमजन के स्वर को अपनी आवाज बना कर पाकिस्तान पर बंदिशें लगा कर उसे घुटने टेकने को मजबूर कर सकती है तो हम लोग ( अर्थात् आम जनता ) भी यहाँ रहकर पाकिस्तान परस्ती में आकंठ डूबे अपने वतन के इन चंद विदूषकों को इनका संपूर्ण बहिष्कार करके , इन्हें प्रोत्साहन देना बंद करके, कड़ा सबक सिखा सकते हैं। हमें इस बात पर विचार करना है कि राष्ट्र से बड़ा मनोरंजन नहीं है। इस समय राष्ट्रप्रेम और हमारी मजबूत इरादों वाली सरकार व सेना का हौसला बढ़ाना सबसे ज्यादा जरूरी है। तभी आतंकवाद का मायका बने पड़ोसी देश को भी अच्छा सबक मिल सकेगा।

-नवल गर्ग

Naveen ( 1696 )

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