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भारत के लिए भारी हो सकती है चीन-रूस की दोस्ती

भारत के लिए भारी हो सकती है चीन-रूस की दोस्ती

-अनुराग साहू

वैश्विक राजनीति में अमेरिकी प्रभाव को देखते हुए रूस और चीन पिछले कुछ समय से काफी निकट आए हैं। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फ्रेंडशिप मेडल पहनाना इसी दिशा में बढ़ाया गया एक कदम है। फ्रेंडशिप मेडल चीन की तरफ से किसी विदेशी नागरिक को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। दरअसल, अमेरिका की तरफ से उत्पन्न कूटनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करने के लिए चीन और रूस एक दूसरे के काफी करीब आ रहे हैं। लेकिन इनकी गहरी होती दोस्ती आगे चलकर भारत के लिए परेशानी की बड़ी वजह बन सकती है।

शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन दोनों ही अपने-अपने देशों में सबसे शक्तिशाली नेता बनकर उभरे हैं और निकट भविष्य में इन दोनों का ही अपने अपने देश की सत्ता पर नियंत्रण बना रहना निश्चित लगता है। ऐसे में इन दोनों का एक साथ आना विश्व में शक्ति संतुलन के लिहाज से काफी अहम माना जा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से चीन और रूस दोनों ही नाराज हैं। उन्हें लगता है कि ट्रंप अपनी अमेरिका फर्स्ट की नीति की आड़ में अन्य सभी देशों को दोयम दर्जा देकर रखना चाहता है।

इसमें कोई शक नहीं है कि अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति है। लेकिन, चीन और भारत को वह आर्थिक क्षेत्र में अपने लिए सबसे बड़ी चुनौती मानता है। चीन ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी और दादागीरी के साथ अपने आर्थिक साम्राज्य का विस्तार किया है, उसकी वजह से अमेरिका उसे अपने लिए खतरनाक मानने लगा है। भारत के साथ मित्रवत संबंध होने की वजह से फिलहाल अमेरिका ने भारत को अपने लिए खतरा नहीं माना है। दूसरी ओर सोवियत संघ के विघटन के बाद लंबे समय तक दुनिया के एकमेव दादा बने रहे अमेरिका को अब रूस ने आंखें दिखानी शुरू कर दी है। यही कारण है कि ट्रंप को लगता है कि रूस और चीन मिलकर अमेरिका के आर्थिक हितों पर आने वाले दिनों में बुरा असर डाल सकते हैं।

चूंकि भारत को ट्रंप फिलहाल अपने लिए खतरा नहीं मानते, इसीलिए उनकी सारी नीतियां विश्व परिदृश्य में चीन और रूस को ध्यान में रखकर ही होती हैं। पिछले कुछ वर्षों में सीरिया और उत्तर कोरिया जैसे कई देशों के मामले भी सामने आए हैं, जहां रूस और चीन ने मिलकर अमेरिकी नीति की मुखालफत की है। इसीलिए जहां डोनाल्ड ट्रंप रूस और चीन को कूटनीतिक तरीकों से दबाने की कोशिश में लगे हैं, वही शी जिनपिंग और पुतिन अमेरिकी दबाव की आशंका को खारिज करने के लिए एक दूसरे से निकट संबंध बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

शी और पुतिन दोनों ही अच्छे कूटनीतिज्ञ माने जाते हैं और इन दोनों ही नेताओं को अमेरिका को लेकर कई आशंकाएं भी हैं। इन्हें इस बात का भी एहसास है कि अमेरिका लगातार दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। इसीलिए ये दोनों नेता मिलकर इस दबाव का सामना करने की तैयारी में जुट गए हैं। चीन अमेरिका के साथ ट्रेड वार की आशंका को खारिज करने के लिए कई दौर की वार्ता से गुजर चुका है, वहीं रूस भी अपने मित्र देशों पर पड़ रहे अमेरिकी दबाव को खत्म कराने की कोशिश में लगा हुआ है। दोनों ही देश अलग-अलग वजहों से अमेरिका के कृत्यों की वजह से कुछ हद तक तनाव में हैं।

इसमें कोई शक नहीं है कि रूस और चीन अगर एक साथ आ जाएं, तो वैश्विक मंच पर ये दोनों देश अमेरिका से अधिक प्रभावी हो सकते हैं। दोनों ही देश तकनीकी तौर पर भी पूर्ण सक्षम हैं तथा कच्चे माल की उपलब्धता के मामले में भी उन्हें किसी अन्य देश का मुंह देखने की ज्यादा जरूरत नहीं है। सीधे शब्दों में कहें तो इन्हें अपना कामकाज चलाने के लिए कोई विशेष अमेरिकी मदद की भी जरूरत नहीं है। चीन और रूस के बीच वामपंथी पृष्ठभूमि की वजह से भी एक पुरानी समझ बनी हुई है। यह ठीक है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस में अब साम्यवादी शासन नहीं है, लेकिन परस्पर समझ के लिहाज से दोनों देशों के संबंध बहुत पुराने हैं। इसलिए यदि चीन और रूस खुलकर एक दूसरे के साथ आ जाए तो इसमें कोई आश्चर्य की बात भी नहीं होगी। ऐसा होने पर अमेरिका के लिए अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर दादागीरी करने का रास्ता बंद भी हो सकता है।

हालांकि भारत के संदर्भ में देखा जाए तो रूस और चीन की दोस्ती भारत के लिए बहुत शुभ नहीं कही जा सकती। भारत के घोषित दुश्मनों में पहला नाम पाकिस्तान और दूसरा नाम चीन का है। चीन पाकिस्तान की खुलकर मदद करता है और खुद भी भारत के खिलाफ समय-समय पर मोर्चा लेता रहता है। दूसरी ओर रूस और भारत के संबंध दशकों पुराने हैं। लेकिन चीन के हस्तक्षेप की वजह से रूस ने पिछले दिनों पाकिस्तान की भी सीमित सैन्य मदद की है। ऐसे में यदि रूस चीन के कहने पर पाकिस्तान को भी अपने खेमे में शामिल कर लेता है, तो कूटनीतिक तौर पर ये भारत के लिए काफी भारी साबित हो सकता है।

यह ठीक है कि दुनिया में किसी एक देश की दादागीरी नहीं चलनी चाहिए, लेकिन किसी एक देश की दादागीरी का जवाब देने के लिए अगर कोई और दूसरा पक्ष तैयार हो जाता है, जिसमें भारत के शत्रु भी शामिल हों, तो ये बात कभी भी भारत के हित में नहीं होगी। इसलिए अभी जरूरी ये है कि भारत अपनी विदेश नीति तय करते वक्त चीन और रूस की बढ़ रही मित्रता पर भी पैनी नजर रखे और आगे उत्पन्न होने वाली स्थितियों को देखते हुए ही इन दोनों देशों के साथ अपने आगे के संबंधों पर विचार करे।


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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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