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बलिदान दिवस पर विशेष

११ मई 1857 का सैनिक विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ देश को आजाद कराने के लिये महान क्रांतिकारी महारानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में अंग्रेजों से स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी ।

बलिदान दिवस पर विशेष

- विष्णु अग्रवाल

भारतीय इतिहास का सूर्य महारानी लक्ष्मीबाई

११ मई 1857 का सैनिक विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ देश को आजाद कराने के लिये महान क्रांतिकारी महारानी लक्ष्मीबाई के नेतृत्व में अंग्रेजों से स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी। झांसी की रानी महारानी लक्ष्मीबाई का व्यक्तिगत आकर्षण दर्पण साबित होता है। प्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा था -

बुुन्देले हरबोलों के मँुह हमने सुनी कहानी थी।

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।

महारानी लक्ष्मीबाई का मूल नाम मणिकर्णिका था वह इतिहास में मनु के नाम से विख्यात हुई । मनु के पिता मोरोपंत तांबे मूलत: सतारा महाराष्ट्र के रहने वाले थे । वे बाजीराव पेशवा के बिठूर के दरबार में कार्य करते थे। उन्होंने अपनी पत्नी के देहान्त के बाद अपनी पुत्री का पालन पोषण बड़े ही प्यार से किया। उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाजी, अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा मँुहबोले भाई नाना साहब पेशवा के साथ प्राप्त की। अद्वितीय साहस वीरता एवं निर्भीकता के कारण उनकी शिक्षा दीक्षा राजकीय ढंग से हुई । झांसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर की पहली पत्नी का देहान्त होने तथा उसकी कोई संतान न होने के कारण झांसी का कोई उत्तराधिकारी नहीं था इसलिये झांसी के राजा को सभी दरबारियों ने सलाह देकर राजा गंगाधर राव को दूसरी शादी करने की सलाह दी 13 वर्ष की आयु में मनु का विवाह राजा गंगाधर राव से हो गया। झांसी में मनु का नाम बदलकर महारानी लक्ष्मीबाई हो गया । सन 1851 में लक्ष्मीबाई को एक पुत्र की प्राप्ति हुई पर दुर्भाग्य से 4 महीने की अल्प आयु में ही उसका निधन हो गया। इस सदमे से गंगाधर राव दु:खी रहने लगे । 21 नवम्बर 1853 को हृदयाघात से गंगाधर की मृत्यु हो गई। तब महारानी लक्ष्मीबाई ने झांसी का शासन का कार्य कुशलतापूर्वक सम्भाला। झांसी का कोई वैध उत्तराधिकारी नहीं था ।

लार्ड डलहौजी ने विलय नीति के अन्तर्गत झांसी पर अधिकार करने के लिये महारानी लक्ष्मीबाई पर दबाव डाला। 11 मई को किले पर घेराबंदी होने पर महारानी लक्ष्मीबाई को उनके दरबारियों ने सलाह दी कि अंग्रेजों का मुकाबला किले के अन्दर से नहीं बाहर से करना होगा । महारानी लक्ष्मीबाई अपने सैनिकों के साथ अपने गोद लिये पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधकर किले से बाहर निकली और उनके सैनिक अंग्रेज सैनिकों पर टूट पड़े। ग्वालियर पर पेशवा व महारानी लक्ष्मीबाई का अधिकार हो गया ।

1857 की क्रांति के समय महारानी लक्ष्मीबाई और उनके सेनानायक राव साहब,तात्या टोपे आदि क्रांतिवीर ग्वालियर के रणक्षेत्र में अंग्रेजों के विरूद्ध डटे हुये थे परन्तु लक्ष्मीबाई के सैनिकों को कई माह से वेतन नहीं मिला था न ही राशन पानी का समुचित प्रबंध हो पा रहा था। ग्वालियर के पास गर्वनर जनरल ह्यूरोज ने महारानी लक्ष्मीबाई से युद्ध किया जिसमें महारानी लक्ष्मीबाई गम्भीर रूप से घायल हो गई । अंग्रेजों की एक गोली महारानी लक्ष्मीबाई की गर्दन पर लगी जिससे वो युद्ध लड़ने में असमर्थ हो गई। बाबा गंगादास जी की कुटिया कुछ ही दूरी पर थी तभी क्रांतिकारी संन्यासियों ने अंग्रेजों से भाले तलवार से लड़ाई लड़ना चालू कर दिया तथा बाबा गंगादास के कहने पर महारानी लक्ष्मीबाई को बाबा गंगादास की कुटिया में घायल अवस्था में लाया गया बाबा गंगादास जी ने गंगाजल पिलाया और महारानी लक्ष्मीबाई ने 18 जून 1857 को अपने प्राण देश के लिये न्यौछावर कर दिये फिर संन्यासियों ने कुटिया की चिता बनाकर अंतिम संस्कार कर दिया जिससे उनका शरीर अग्रेजों के हाथ न लगे।


विष्णु अग्रवाल


Swadesh News ( 55 )

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