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कुंभ के बहाने, लोक संस्कृति के तराने

कुंभ के बहाने, लोक संस्कृति के तराने

युवा कुंभ का आयोजन सामान्य परिघटना नहीं है। युवाओं को अपनी संस्कृति और सभ्यता से जोडऩे का प्रयास है। जड़ों से कटा मनुष्य कहीं का नहीं रहता। डोर से कटी पतंग उड़ती नहीं, गिर जाती है। कहाँ गिरती है, यह पता भी नहीं चलता। देश को आगे ले जाना है तो युवाओं को सही मार्गदर्शन करना और उन्हें राष्ट्रहित में नियोजित करना जरूरी है। देश को आगे ले जाने का काम युवा ही करता है लेकिन संस्कारों के जल से उसका अभिसिंचन न किया गया तो वह प्रतिगामी कार्य भी करता है। युवा शक्ति है। शक्ति का सही दिशा में उपयोग हो तो क्रांति होती है। उसका दुरुपयोग हो तो अशांति होती है। धर्म ही देश को जोड़ सकता है। हिन्दू ही देश में धर्म निरपेक्षता सुनिश्चित कर सकता है। सभी भाषाओं और धर्मों को सम्मान दे पाने में सक्षम है। भाजपा और संघ परिवार ने इस बात को समझा है। अरसे बाद कुम्भ को स्नान-दान के सामान्य कर्मकांड के साथ ही उसे एक नई दिशा देने की कोशिश हुई है। जिस कुंभ के लिए कभी निमंत्रण नहीं दिए जाते थे, उस कुंभ के लिए देश के विभिन्न भागों में निमंत्रण दिए जा रहे हैं। 70 देशों के राजदूत प्रयाग राज आकर पहले ही यहां की व्यवस्था को देख चुके हैं, त्रिवेणी के संगम तट पर अपना राष्ट्रध्वज फहरा चुके हैं। यूं तो स्वत: स्फूर्त ढंग से पूरी दुनिया इस कुंभ में आती रही है और अपनी आस्था, मान्यता और भावनाओं के अनुरूप लाभ भी प्राप्त करती है।

युवा कुंभ देश के युवकों के प्रोत्साहन का माध्यम है। देश एक बार फिर विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर है। इस बात के संकेत मिलने भी लगे हैं। अरसे बाद कुंभ में पूर्व विचारों की श्रृंखला विकसित हुई है। उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में स्नान-दान के साथ विचार मंथन की जरूरत महसूस हुई थी लेकिन प्रयागराज के कुंभ के मद्देनजर इसकी व्यापकता देखते ही बन रही है। पांच विचार कुम्भों के आयोजन प्रसंग पर विचार करें तो विश्वगुरु बनने का प्रथम मार्ग यही है। चार विचार कुम्भों पर्यावरण कुंभ, नारी शक्ति कुंभ, सामाजिक समरसता कुंभ और युवा कुंभ के आयोजन को इसी रोशनी में देखना मुनासिब होगा। पांचवां विचार कुंभ संस्कृति पर होना है जो प्रयागराज कुंभ के दौरान होगा।

देश में ही कुछ लोग यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत का समूचा ज्ञान उधार का है। जबकि विदेशी ज्ञान में कुछ भी नया नहीं है। हमारे ऋषियों, मुनियों ने सब कुछ बहुत पहले लिख दिया था। जब कई धर्म जन्मे भी नहीं थे, तब भी इस देश के पास नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय हुआ करते थे। यहां कुटिया में बैठा ऋषि अपने शिष्यों को ज्ञान, सिद्धांत और जीवन व्यवहार की कई-कई विद्याएं सिखा दिया करता था। भारत में अगर किसी राजा को महान कहा जा सकता है तो वह राजा राम हैं या फिर राजा हरिश्चन्द्र हैं। भगवान राम ने सत्य और धर्म की स्थापना को ही अपना आदर्श माना। किसी भी तरह का प्रलोभन उन्हें सत्य मार्ग से डिगा नहीं पाया। वैद्यराज सुषेण को तो उन्होंने धर्म न छोडऩे की ही नसीहत दे डाली थी। उन्होंने कहा था कि जिस धर्म पर प्यारा राज्य गया,श्री पितृदेव का मरण हुआ,जिस धर्म पर भाई भरत छूटा, सीता प्यारी का हरण हुआ। उस धर्म सत्य पर लक्ष्मण भी यदि मर जाएं तो मर जाएं। आवाज यही होगी अपनी हां! धर्म नहीं जाने पाए। आज ऐसा कोई नहीं मिलेगा जो अपने भाई को मरता देखकर भी धर्म और सत्य की बात करे। हरिश्चन्द्र के बारे में कहा गया है कि चंद्र टरे सूरज टरे, टरे जगद् व्यवहार। पै दृढ़ हरिश्चन्द्र के टरे न सत्य विचार। आचार, विचार की शुचिता की वजह से ही भारत जगत वंद्य रहा है । पूरी दुनिया का मार्गदर्शन करता रहा है। 700-800 साल की गुलामी से आक्रांताओं ने भारतीय संस्कृति को किस तरह प्रभावित किया,यह किसी से छिपा नहीं है। भारत के ज्ञान विज्ञान पर कब्जा जमाने के षड्यंत्र हो रह हैं। विश्व संस्कृति दिखावे की है और भारतीय संस्कृति आत्म साक्षात्कार की है। यहां अप्प दीपो भव का संदेश गूंजता है। वैसे अब तक के विचार कुंभों का एक ही मंतव्य है,भूले भटके समाज को दिशा दिखाना।अंधेरे से लडऩे के लिए एक दिया जलाना। भारत को राष्ट्र मंदिर बनाने के यह प्रयोग तभी सार्थक होंगे,जब सौ में 99 बेईमान वाली अवधारणा बदले। बेईमानी और भ्रष्टाचार को पूरी तरह रोका नही जा सकता लेकिन अगर ईमानदारी का प्रतिशत बढ़ाया जा सके तो भी देश को तरक्की के पथ पर ले जाने में आसानी होगी। शरीर के सुख के लिए धन,मन की शुद्धि के लिए ज्ञान और आत्मा की शुद्धि के लिए धर्म जरूरी है। दुनिया को राह दिखा पाना हिंदुत्व के बलबूते ही संभव है।

लेखक : सियाराम पांडेय, हिन्दुस्थान समाचार

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स्वदेश वेब डेस्क www.swadeshnews.in


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