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रामचरित मानस सरोवर के समान है: चिन्मयानंद जी

रामचरित मानस सरोवर के समान है: चिन्मयानंद जी

राष्ट्रीय संत पूज्य चिन्मयानंद बापू जी ने कहा की रामचरितमानस एक सरोवर है। जैसे मानसरोवर हैं ऐसे ही यह मानस सरोवर है। पूज्य चिन्मयानंद बापू भागवत प्रेम परिवार द्वारा आयोजित श्री कैलादेवी महारानी एवं कुंवर बाबा मंदिर महलगांव सिटी सेंटर के मैदान पर चल रही श्री राम कथा के दूसरे दिन की कथा का श्रद्धालुओं को रसपान करा रहे थे। संत श्री ने कहा कि यह जीवन का परम सत्य है कि जीवन जब तक रहे कर्म बंधन हमारा पीछा नहीं छोड़ता। संत श्री ने कहा कि कर्म साथ-साथ चलता है, लेकिन कर्मों के साथ मनुष्य सुकर्म भी करें वह कर्म भी हमारा धर्म बन जाता है। संत श्री ने कहा कि यहां तो जन्म जन्मांतर का प्यासा चला आए तो उसकी भी प्यास बुझ जाती है। यह ऐसा अद्भुद सरोवर है यहां जो प्रेम भक्ति है मधुरता है वह मानस पक्ष भी है। भगवान का चरित्र कैसा दिव्य चरित्र है जैसे भगवान का अंत पाना मुश्किल है जिस प्रकार सागर की गहराई नापना मुश्किल है वैसे ही रामचरितमानस की गहराइयों को भी मापना मुश्किल कार्य है। संत श्री ने कहा कि जब भी हम किसी परमार्थी ऋषि से भगवत संबंधी प्रश्न पूछते हैं तो वह प्रसन्न नहीं होते हैं, इसलिए जब भी हम कोई परमार्थी संत के पास जाएं तो हमें भगवत प्राप्ति का ही प्रश्न पूछना चाहिए। संत श्री ने कहा कि यदि दिल में कथा के प्रति प्रेम हो तो कथा कहीं भी हो व्यक्ति अपने आप पहुंच ही जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि हमें प्यास लगी है तो पानी कितना भी दूर मिले हम पानी तक पहुंच ही जाते हैं । इसलिए कथा के प्रति हर व्यक्ति को प्रेम होना चाहिए। संत श्री ने कहा अगस्त ऋषि ने भगवान शिव और माता सती का स्वागत एवं वंदन किया जिसको देखकर भगवान शिव प्रसन्न हुए, लेकिन माता सती को थोड़ा सा अहंकार हुआ उनको लगा जो व्यक्ति हमें प्रणाम कर रहा है पहले ही हम से डर रहा है, वह हमें रामकथा क्या सुनाएगा। संत श्री ने कहा यदि कोई व्यक्ति हमें देख कर हमें प्रणाम कर रहा है अथवा हमें आदर और सम्मान दे रहा है तो ऐसा नहीं है कि वह हमसे डर रहा है बल्कि यह उसकी सरलता है इसलिए हमें जीवन में सरल होना चाहिए । संत श्री ने कहा कि हम जीवन में कोई भी भूल कर दें लेकिन हर भूल के बाद हमें पश्चाताप होता ही है, लेकिन जब कृषि सूखी जाए उसके बाद बारिश हो तो क्या मतलब। संत श्री ने कहा सती से नाराज होकर भगवान शिव समाधि में चले गए थे।


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