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अचलेश्वर मंदिर पर दूध और जल नालियों में बहने से दुखी हैं श्रद्धालु

ग्वालियर, न.सं.। शहर के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में शामिल अचलेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार पर 3.11 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। इसे विशेष नागरशैली में बनाया जा रहा है, किन्तु शिवलिंग पर श्रद्धालुओं द्वारा अभिषेक किए जाने वाले दूध को नाली के माध्यम से गटर में पहुंचाए जाने से सभी श्रद्धालु दुखी हैं, जबकि मंदिर निर्माण के पहले निर्माणकर्ता एवं न्यास ने यह भरोसा दिलाया था कि क्विंटलों दूध को यूं ही गटर में बहने से रोका जाएगा। उसका उपयोग श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में वितरित कर किया जाएगा।

श्री अचलेश्वर महादेव की पिण्डी आदि अनादिकाल से विराजमान है। दूध को एकत्रित करने की उचित व्यवस्था न होने के कारण इस पिंडी पर चढऩे वाला दूध मंदिर के पास बने गटर में जाता है। यह क्रम पिछले काफी समय से चल रहा है, जो कहीं न कहीं भक्तों की आस्था के साथ मजाक है। इस दूध के साथ जल, इत्र, फूल, बेलपत्र आदि भी गटर में चले जाते हैं। धर्म प्रेमियों का कहना है कि भगवान इस प्रकार से दूध की बर्बादी से नहीं, जरूरतमंद की मदद करने से खुश होते हैं। यह दूध जरूरतमंद लोगों तक पहुंचना चाहिए।

भगवान पर चढऩे वाले फूल भी गंदगी में पड़े रहते हैं:-

भगवान भोलेनाथ पर चढऩे वाले फूलों को एकत्रित कर नटराज भवन के पास एक स्थान पर ढेर लगा दिया जाता है। यहां से जानवर इन फूलों को या तो खा जाते हैं या फिर इनको इधर-उधर गंदगी में फैला देते हैं।

उड़द की दाल के पेस्ट की जगह केमिकलों से चिपका रहे पत्थरों को:-

श्री अचलेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण बेहद ही धीमी गति से हो रहा है। इस मंदिर का निर्माण एजेंसी सुदर्शन इंजीनियरिंग द्वारा किया जा रहा है। इस मंदिर में लगने वाले बड़े-बड़े पत्थरों को उड़द की दाल के पेस्ट से चिपकाया जाना था, लेकिन इसे केमिकल और सीमेंट से चिपकाया जा रहा है।

इनका कहना है:-

'कितना भी मना कर लो, लेकिन भक्त मानते ही नहीं हैं और दूध चढ़ाते हैं। इस दूध का उपयोग हम किसी दूसरे काम में नहीं कर सकते हैं क्योंकि इसमें चावल, इत्र, सिंदूर एवं धतूरा आदि मिला होता है। मंदिर निर्माण होने के बाद जमीन में चार टैंक बनाए जाएंगे, जिसमें दूध का एकत्रिकरण किया जाएगा, जिससे दूध गटर में नहीं बहेगा। यह काम शीघ्र ही होगा'

हरीदास अग्रवाल, अध्यक्ष, श्री अचलेश्वर महादेव सार्वजनिक न्यास

'यह दूध तो पिछले कई वर्षों से इसी तरह बह रहा है। दूध में कई चीजें मिली होने के कारण मजबूरन इस दूध को बहने देना होता है। भक्तों से मना करो तो वह मानते ही नहीं हैं। जल्द ही इस दिशा में जरूरी कदम उठाए जाएंगे।'

भुवनेश्वर वाजपेयी, सचिव, श्री अचलेश्वर महादेव सार्वजनिक न्यास

'इन पत्थरों को चिपकाने में सीमेंट और केमिकल का उपयोग किया जा रहा है। उड़द की दाल के पेस्ट का उपयोग नहीं हो रहा है।'

अमृत मीणा, कारीगर, राजस्थान

'मैं हर सोमवार को यहां भोलेनाथ की पूजा करने आता हूं। दूध का सदुपयोग होना चाहिए। इसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना चाहिए।'

आर.एस. मिश्रा, दीनदयाल नगर, भक्त

'मंदिर प्रबंधन ऐसी व्यवस्था करे कि दूध को एक पात्र में इकट्ठा कर लिया जाए और थोड़ा सा भगवान पर चढ़ाकर शेष दूध जरूरतमंद तक पहुंचा दिया जाए, जिससे भक्तों की आस्था को ठेस नहीं पहुंचेगी और दूध का ऐसे बहना भी बंद हो जाएगा।'

संजीव गुप्ता, कम्पू, भक्त

'दूध और जल को इस प्रकार से बहता देख दुख होता है। अगर हम अभी नहीं सुधरे तो दूध तो छोड़ो भगवान का अभिषेक करने के लिए भी हमारे पास जल नहीं होगा। दूध, दही, शक्कर एवं शहद का सदुपयोग होना चाहिए।'

भारत बजाज, हनुमान चौराहा, भक्त

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